Dr. Ashok Sharma 7 Books Combo Set

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Description

Radha Krishna Aur Samay Ke Padchinh / MRP: 200 / Pages: 138

Description: हमेशा और हर परिस्थिति में दृढ़ रहने वाले कृष्ण को जीवन में प्रथम बार अपने नेत्रों में जल उमड़ने का अनुभव हुआ। वे उस चित्र की सजीव हो उठी राधा को देख ही रहे थे कि अचानक उनके पास एक हवा का गोल गोल घूमता हुआ बवंडर आया और उस वस्त्र को कृष्ण के हाथों की ढीली पकड़ से छुड़ा कर उड़ा ले गया। कृष्ण कुछ देर तक उसे उड़ता हुआ देखते रहे और जब वह आँखों से ओझल हो गया तो वापस हो लिये।

 

Shurpanakha / MRP: 125 / Pages: 208

Description: वैदिक काल से ही नारी स्वातंत्र्य के उदाहरणों के साथ-साथ नारी को वस्तु मानने और उसके घुटन में जीने के उदाहरणों की कमी नहीं है। उस समय नारी विमर्श न रहा हो किन्तु पुरुष प्रधान व्यवस्था के विरुद्ध उठने वाले स्वर तब भी थे। शूर्पणखा की माँ कैकसी जहाँ स्त्री को वस्तु समझने और घुटन में जीने का उदाहरण है वहीं स्वयं शूर्पणखा इस व्यवस्था को नकारती खड़ी है। वह अपने महाशक्तिशाली भाई रावण के अत्याचार से पीड़ित होने पर, उसके दर्प को कुचलने के दुरूह और फिसलन भरे मार्ग पर एक लाठी के सहारे चलते हुये एक व्यूह की रचना करती है। यह लाठी कौन बना, स्वयं राम या कोई और यह निर्णय आप पर…

 

Krishna Antim Dino Me / MRP: 175 / Pages: 216

Description: अपने प्रयाण के निष्कर्ष पर पहुँचने के बाद कृष्ण को एक बार पुनः अपना बचपन याद आ गया। जब वे सुबह उठकर माता यशोदा और बाबा नन्द के चरण स्पर्श करते थे तो आशीष देते हुए उन लोगों की जिह्वा थकती नहीं थी। माँ उन्हें नहला धुला कर तैयार करतीं, फिर वे पास के शिव मन्दिर में जाकर पूजन करके आते तो माँ उन्हें मक्खन, दूध और फल का कलेवा करातीं। उन्हें अपने बचपन की शरारतें याद आने लगीं। माँ बहुत मेहनत से उनके लिए दूध से दही और मक्खन तैयार करती थीं और वे चोरी से उसे अपने मित्रों को बाँट देते थे, इस कार्य में उनसे बहुधा दही या मक्खन की मटकी फूट जाया करती थी। माँ को उनकी इस शरारत पर हँसी तो आती ही थी, वे परेशान भी हो जाया करती थीं।

 

Seeta Ke Jane Ke Baad Ram / MRP: 120 / Pages: 216

Description: सीता जा चुकी थीं, किन्तु सच तो यह था कि वे शरीर से भले ही नहीं थीं, किन्तु लोगों के हृदय में उनका साम्राज्य था। शाम हो चुकी थी। मन कुछ उदास सा हो रहा था। वे नित्य के विपरीत अपने कक्ष में जाने के स्थान पर, महल की सीढ़ियों की ओर बढ़ गये। छत पर पहुँचे तो हवा ठंढ़ी और कुछ तेज थी। उन्होंने खड़े हो कर आसमान की ओर ऐसे देखा जैसे कुछ खोज रहे हों। फिर उस ओर देखा जिधर वह स्थान था जिस तक प्रयाण से पूर्व सीता के पदचिन्ह मिले थे। कुछ देर तक वे अपलक उधर देखते रहे, फिर सिर झुकाकर धीमे कदमों से चलते हुये छत के उस किनारे पर आ गये जहाँ मिट्टी के पात्रों में फूलों के बहुत से पौधे लगे हुये थे। सीता जब थीं, तब उन्होंने इन पात्रों में फूलों के पौधे लगवाये थे। वे पौधों का बहुत ध्यान रखती थीं। उनके जाने के बाद राम अक्सर इन पौधों के पास आकर खड़े हो जाते और इनमें खिले फूलों को निहारते और छूते थे। यह उन्हें सीता की याद और एक सुखद सी अनुभूति कराता था। आज वे जब इस ओर आये तो कुछ देर तक खड़े इन्हें देखते रहे, फिर झुक कर इनमें से एक से एक फूल तोड़ा और बहुत धीरे से उसे अपनी दोनों हथेलियों के बीच कर उसके स्पर्श को महसूस करते हुये, छत पर बने कक्ष में आ गये। यह शेष भवन से थोड़ा अलग था और सीता के जाने के बाद से अक्सर जब सीता की स्मृतियाँ घेरने लगतीं, वे एकान्त खोजते हुये, इस कक्ष में आ जाते।

 

Seeta Sochti Thin / MRP: 175 / Pages: 224

Description: सीता जा चुकी थीं; किन्तु सच तो ये था कि वे शरीर से भले ही नहीं थीं, किन्तु लोगों के हृदय में उनका साम्राज्य था। दरबार लगा हुआ था। कैकेयी के मायके, केकय देश से आने वाले समाचार चिन्तित करने वाले थे। गन्धर्वों ने वहाँ बहुत उत्पात मचा रखा था, और वर्तमान नरेश; कैकेयी का भाई युधाजित, उनका उचित प्रतिकार नहीं कर पा रहा था। अयोध्या का राज्य केकय की सहायता करना चाहता था, किन्तु अभी तक वहाँ से कोई सहायता माँगी नहीं गयी थी, अत: दरबार ने इस सम्बन्ध में प्रतीक्षा की बात की। कुछ अन्य समाचार भी थे, उनकी समीक्षा भी हुई। सीता के प्रयाण के बाद से जनकपुरी और मिथिला के सम्बन्धों में वह ऊष्मा नहीं रह गयी थी। उन सम्बन्धों पर भी इस सभा में चर्चा हुई और स्वाभाविक ही अश्वमेध यज्ञ और सीता की बातें भी आयीं। सीता की बातें राम के हृदय में पीड़ा भर देती थीं। चर्चाएँ समाप्त हुर्इं तो राम उठ पड़े। बाहर आये तो शाम हो चुकी थी। मन कुछ उदास सा हो रहा था। वे नित्य के विपरीत, अपने कक्ष में जाने के स्थान पर, महल की सीढ़ियों की ओर बढ़ गये। छत पर पहुँचे तो हवा ठण्ढी और कुछ तेज थी। उन्होंने खड़े होकर आसमान की ओर ऐसे देखा, जैसे कुछ खोज रहे हों।

 

Shiv / MRP: 160 / Pages: 240

Description: अनुकूलता सुख देती है और प्रतिकूलता दुख। एक ही वस्तु किसी को सुख देती है और किसी को दुख, किन्तु सुन्दरता वस्तु-निष्ठ है। जो कल्याणकारी है, वही सुन्दर है। वह किसी के दुख का कारण नहीं हो सकती यद्यपि वह कष्ट-साध्य हो सकती है। तप, कष्ट-साध्य है किन्तु कल्याणकारी है अत: सुन्दर है। शिवत्व का अर्थ है, प्रगति या कल्याण। अशिक्षा से शिक्षा की ओर, दरिद्रता से समृद्धि की ओर, निस्तेज से तेजस्विता की ओर प्रगति है। यह शिव है और सुन्दर है। ईश्वरत्व को साकार करने के प्रयास में भारतीय मनीषा ने शिव की अवधारणा प्रस्तुत की। यह पराभौतिक ज्ञान की ओर बढ़ने का एक प्रयास था। यह कहती है, शिव का हेतु ही सत्य है। शिवत्व ,सत्य की ओर ले चलता है। यत सत्यं तत् शिवम, यत शिवम तत् सुन्दरम्। शिव सदैव सुखद रूप से शीतल है, शान्त है, सुन्दर है और पवित्र है।

 

Ek Kiran Ki Vapsi / MRP: 225 / Pages: 160

Description: एक उपन्यास

Book Details

Weight 1400 g
Pages

1404

Binding

Language

Hindi

Author

Ashok Sharma