Mythology Novels Combo 1 (5 Hindi Books set)

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Description

Devaldevi / Author: Sudheer Maurya /MRP: 150 / Pages: 144

Description: इस उपन्यास की नायिका अन्हिलवाड़ की राजकुमारी देवलदेवी है, पर इसका कथानक खुसरोशाह के बिना पूरा नहीं हो सकता। देवलदेवी और खुसरोशाह भारतीय इतिहास के वो रोशन सितारे हैं जिन्हें हमेशा बादलों या कुहासे के पीछे रहना पड़ा। खुसरोशाह अन्हिलवाड का वो युवा था जिसने अपने पराक्रम से खिल़जी वंश को समूल उखाड़ फेंका और अन्हिलवाड़ विध्वंस का प्रतिशोध लिया। देवलदेवी, जिसकी देह बार-बार विडम्बना की शिकार हुई, सुअवसर की प्रतीक्षा में यह विषपान करती रही, और उन्हें वो सुअवसर उपलब्ध करवाया महान सम्राट श्री धर्मदेव (नसरुद्दीन खुसरोशाह) ने। देवलदेवी का शौर्य किसी तरह पद्मनी, दुर्गावती और लक्ष्मीबाई से कम नहीं है; और न ही खुसरोशाह का राणा प्रताप और शिवाजी से, परन्तु इतिहास ने इन महान विभूतियों को भुला दिया। यह उपन्यास महान खुसरोशाह और देवलदेवी की स्मृतियों को पुन: स्थापित करने का सफल प्रयास है। आशा है कि इतिहास इन महान विभूतियों के साथ न्याय करेगा।

 

Mahabharat Ke Baad / Author: Bhuvneshwar Upadhyay / MRP: 120 / Pages: 120

Description: कहते हैं कि ‘जो महाभारत में नहीं है वो भारत में नहीं है।’ क्योंकि महाभारत का वैचारिक, सामाजिक और पारिवारिक फलक इतना व्यापक और अक्षुण्य है कि हर बार कुछ शेष रह ही जाता है। इसी धारणा से प्रभावित होकर लेखक ने महाभारत को एक अलग ही दृष्टिकोण से देखा, समझा और महसूस किया है। किताब में महाभारत के युद्ध के बाद उपजे हालात को कारण, कार्य और परिणाम के एक आत्मविश्लेषणीय शाब्दिक धागे से बाँधा है। साथ ही युद्ध के बाद बचे पांडुपुत्रों के अतिरिक्त धृतराष्ट्र, गांधारी, भीष्म, कुंती, द्रौपदी, विदुर आदि के मनःस्ताप और आत्ममंथन को प्रेम, घृणा, महत्वाकांक्षा, स्वार्थ, त्याग, प्रतिशोध आदि के सभी रूपों में चित्रित करते हुए उस धार्मिक जड़ता पर भी प्रश्नचिन्ह लगाया है, जिसे तोड़ते हुए युद्ध के कारणों को मिटाया जा सकता था। शिल्प और भाषायी सामर्थ्य से इसके भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक पक्षों को उभारने के साथ-साथ रचना को पठनीयता और संप्रेषणीयता प्रदान करने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई है।

 

Bolo Ganga Putra / Author:  Dr. Pawan Vijay / MRP: 110 / Pages: 112

Description: ‘अंत में धर्म की विजय होती है।’, ऐसा इसलिए कहा जाता है ताकि अन्तिम परिणाम को न्यायोचित ठहराया जा सके। वस्तुत: राजनीति में ‘विजय ही धर्म’ है। राजकुल में सत्ता ही सत्य, धर्म और नैतिकता है। जब हम इसका अवलोकन, महाभारत के सन्दर्भ में देखते हैं, तो सत्ता के कुचाल स्पष्ट हो जाते हैं। धर्म के नाम पर, वचन के नाम पर, और राज्य की सुरक्षा के नाम पर जितने अधर्म कुरुवंश में किये गये, उसका अन्यत्र उदाहरण मिलना दुष्कर है। गंगापुत्र भीष्म – जिनके संरक्षण में द्रौपदी को परिवारी जनों के सामने नग्न करने का प्रयास किया गया, एकलव्य का अँगूठा कटवा लिया जाता है, दुर्योधन को एक उद्दण्ड, हठी चरित्र बनाकर घृणा का पात्र बना दिया जाता है, इतना बड़ा नरसंहार होता है, और कुरु कुल का विनाश हो जाता है, वह गंगापुत्र, काल के प्रश्नों सामने अधीर हैं, किन्तु काल के प्रश्न उनके शरीर में बाणों की तरह धँसे हैं, जिनका उत्तर उन्हें देना ही है, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ जान सकें, कि धर्म की ओर कौन सा पक्ष था। दरबारी इतिहासकारों द्वारा जो लिखा होता है, वह मात्र सत्ता का महिमामण्डन होता है, इसके अतिरिक्त कुछ नहीं। सत्ता के इतर लिखने वालों को सत्ता समाप्त कर देती है, नहीं तो यह कैसे हो सकता है कि जयसंहिता में जो कुछ आठ हजार आठ सौ श्लोकों में लिखा गया, उसे बढ़ाकर, एक लाख श्लोक का महाभारत बना दिया जाता है। सत्ता द्वारा धर्म और सत्य को, जाने कितने क्षेपकों की दीवारों में चुनवा दिया गया। कुलप्रमुख धृतराष्ट्र और भीष्म के पूर्वाग्रहों में आश्चर्यजनक एकरूपता है| एक का दुर्योधन के प्रति, तथा दूसरे का पाण्डवों के लिए आग्रह है। ‘बोलो गंगापुत्र!’ में काल, अपने कपाल पर लिखे सत्य का साक्षात्कार भीष्म से कराता है। अबकी बार कुरुक्षेत्र में अर्जुन नहीं, बल्कि मृत्युजयी गंगापुत्र भीष्म दुविधाग्रस्त हैं, सवालों के घेरे में हैं। पुस्तक, संवाद के क्रम में है, जिसके द्वारा लेखक ने सामान्य लौकिक मानवीय प्रश्नों को अत्यंत सहजता से उठाया है, और उसके सरलतम उत्तर भी पात्रों के माध्यम से देने का प्रयास किया है।

 

Shiv / Author: Dr. Ashok Sharma / MRP: 160 / Pages: 240

Description: अनुकूलता सुख देती है और प्रतिकूलता दुख। एक ही वस्तु किसी को सुख देती है और किसी को दुख, किन्तु सुन्दरता वस्तु-निष्ठ है। जो कल्याणकारी है, वही सुन्दर है। वह किसी के दुख का कारण नहीं हो सकती यद्यपि वह कष्ट-साध्य हो सकती है। तप, कष्ट-साध्य है किन्तु कल्याणकारी है अत: सुन्दर है। शिवत्व का अर्थ है, प्रगति या कल्याण। अशिक्षा से शिक्षा की ओर, दरिद्रता से समृद्धि की ओर, निस्तेज से तेजस्विता की ओर प्रगति है। यह शिव है और सुन्दर है। ईश्वरत्व को साकार करने के प्रयास में भारतीय मनीषा ने शिव की अवधारणा प्रस्तुत की। यह पराभौतिक ज्ञान की ओर बढ़ने का एक प्रयास था। यह कहती है, शिव का हेतु ही सत्य है। शिवत्व ,सत्य की ओर ले चलता है। यत सत्यं तत् शिवम, यत शिवम तत् सुन्दरम्। शिव सदैव सुखद रूप से शीतल है, शान्त है, सुन्दर है और पवित्र है।

 

Rudragatha / Author: Sahitya Sagar Pandey / MRP: 175 / Pages: 240

Description: यह कथा है उस समय की, जब भारतवर्ष कई छोटे–छोटे राज्यों मे बँटा हुआ था। कई क्षत्रिय राजा, उन राज्यों पर शासन करते थे, और उन सबका अगुआ था, सबसे बड़े राज्य ‘वीरभूमि’ का अन्यायी सम्राट, कर्णध्वज। यह कथा है वीरभूमि राज्य की निर्वासित बस्ती में अपने काका के साथ रहने वाले एक ब्राह्मण पुत्र रुद्र की – एक योद्धा, जो पहले अपनी बस्ती का अधिपति बना है, और फिर पड़ोसी राज्य, राजनगर पर आक्रमण करके अपने अद्भुत पराक्रम एवं साथी योद्धाओं के सहयोग से उसने युद्ध में विजय प्राप्त की। इसके बाद अपने मित्रों, विप्लव, विनायक और कौस्तुभ के सहयोग से रुद्र ने वो युद्ध अभियान शुरू किया जो, अगले पाँच वर्षों तक अनवरत चलता रहा, जिसमें उसने बीस क्षत्रिय राज्यों को जीता। रुद्र, प्रतिशोध की आग में जलता हुआ आगे बढ़ता रहा, और एक दिन भारतवर्ष का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति बना। परन्तु उसका निरंतर आगे बढ़ने वाला विजयरथ, देवगढ़ विजय के बाद ठहर जाता है, और इस ठहराव का कारण है देवगढ़ की राजकुमारी पूर्णिमा। रुद्र का विजय अभियान पूरा हो चुका था, परन्तु परिस्थितियों ने रुद्र को, वीरभूमि राज्य के सम्राट कर्णध्वज के विरुद्ध एक अंतिम युद्ध लड़ने के लिए विवश कर दिया। क्या था उस अंतिम युद्ध का कारण? क्या सिर्फ बस्ती के निर्वासित लोगों के लिये ही रुद्र इतने कठिन एवं भयंकर युद्ध लड़ रहा था, या रूद्र के प्रतिशोध का कोई अन्य कारण भी था?

Book Details

Weight 768 g
Binding

Language

Hindi

Pages

768