Sanyasi Yoddha & Chandravanshi

इस किताब में उत्तराखंड के लोक-जननायक, न्याय के देवता गोलू की जीवनगाथा को दर्ज किया गया है। इसमें उनके जन्म से लेकर उनके एक साहसी योद्धा बनने की कहानी को बहुत ही खूबसूरत अंदाज में पेश किया गया है। – नवभारत टाइम्स यह उपन्यास समाज के दमित वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है। – हिन्दुस्तान, लखनऊ संस्करण लेखक ने नायक के सिंहासनारूढ़ होने की कथा को गाथा से हटकर यथार्थ का जामा पहनाया है। साथ ही राजधर्म, साधुधर्म और वर्तमान विसंगतियों का उपन्यास में सटीक चित्रण किया है। वस्तुत: गोलूज्य का नायकत्व समतावादी समाज के पोषण और गीता के कर्मवाक्य प्रस्थापक के रूप में हुआ है। कहीं जहाँ यथार्थ से हट कर चित्रण हुआ है वहाँ अतिमानवीय तत्वों का वर्णन भी आ गया है। लेखक ने उपन्यास के माध्यम से समाज की आधुनिक समस्या को उठाया है। – देव सिंह पोखरिया

कुर्मांचल के चन्द्रवंशी राजाओं का स्वर्णिम युग राजा बाजबहादुर सन् 1638-1678 को माना जाता है। धीरे-धीरे इस राजवंश में सत्ता संघर्ष होने लगा तथा अन्य जातियों के प्रभाव एवं नियंत्रण में दुर्बल राजा आने लगे। अंतत: विधर्मी रुहेले पठानों ने कुर्मांचल पर आक्रमण कर कब्जा कर लिया। चन्द्रवंशीय राजा कल्याण चंद (सन् 1729-1748) एक अनुभवहीन राजा बना और अपने परामर्शदाताओं के नियंत्रण में रहा। इन परामर्शदाताओं ने इस माटी के माधो राजा के हाथों हजारों हत्याएँ करवाईं, सैकड़ों की आँखें निकलवाकर उन्हें मरने के लिए छोड़ दिया। कुर्मांचल के चन्द्रवंशीय राजाओं के कालखण्ड का सबसे काला पृष्ठ था जब सदैव से स्वतंत्र रहे कुर्मांचल देश पर विधर्मी रुहेले पठानों द्वारा अधिकार किया गया। धर्म व संस्कृति पर संकट था। बड़ी कठिनाइयों और राजा गढ़वाल के सहयोग से कुर्मांचल राज्य की पुन:स्थापना हो सकी। इस दौरान कुर्मांचलीय इतिहास किस तरह की त्रासदी से गुजरा और राजाओं की क्षमता, अक्षमता व प्रजा की पीड़ा व संवेदनाओं पर भावपूर्ण विश्लेषण करता है यह उपन्यास ‘चन्द्रवंशी’।