Kufr ki Raatein

यूँ तो तमाम किताबें इधर आपकी नज़र से गुज़र रही होंगी। हर किताब अपने में कुछ न कुछ ख़ासियत समेटे होती है। हर किताब में लेखक की वह साँसें गुँथी होती हैं, जिन्हें वह चाहता है, हमेशा जीवित रहें। किताब ‘कुफ़्र की रातें’ भी लेखक फ़ायक़ अतीक किदवई की वह साँसें हैं, जिन्हें हमेशा जीवित रहना चाहिए। फ़ायक़ के लिखने में फिलॉसफी का जो पुट है, वह आवारापन के साथ मिलकर पूरा एक दऱख्त बन जाता है। फ़ायक़ ने अवध के गली कूचे में बचपन से आजतक जो ज़माने को आहिस्ता-आहिस्ता बढ़ते देखा है, उसमें खुद की वह कल्पनाएँ भरकर एक सतरंगी आसमान बनाया है। यह आसमान उनका ख़ुद का है और वह इसी आसमान के बाशिन्दे भी हैं। फ़ाय़क का मानना है कि ‘लेखक से ज़ियादा लेखन को जानना चाहिए’ इसलिए वह अपने अंदर की तमाम परतें नहीं खोलते। उनके लिखे में ही वह हैं और जो लिखा हुआ है, वही सम्पूर्ण फ़ायक़ है। इतने अधिक और इतने विविध कोट्स शायद ही कहीं एक साथ मिलें। फ़ायक़ ने हर विषय को बेहद बारी़क ऩजर से देखा है और देखकर चंद अल़्फा़ज में सामने रख दिया है। यह न ही कहानियाँ हैं, न ही कविता हैं। यह एक आम इंसान की वह साँसें हैं, जो पल-पल चमत्कृत करती हैं। दिल को झकझोरती हैं, तो कभी सहलाती हैं। फ़ायक़ अती़क किदवई का लेखन इस दौर का बहुत अलग लेखन है, जिसका जोखिम अल्हड़, संवेदनशील, आवारा, दिलफेंक, झगड़ालू, मोहब्बती और दोस्तों के लिए सारी हदें तोड़ देने वाला दोस्त फ़ायक़ ही ले सकते हैं। उम्मीद है, यह किताब उम्मीदों को पंख देगी …