zahir

पांच ग़ज़लें – ज़हीर क़ुरेशी – अंक -1

ज़हीर कुरेशी

जन्म : ५ अगस्त १९५० ई.
जन्म स्थान : चन्देरी, जिला-अशोक नगर, (म.प्र.)
रचनाकाल : १९६५ से अब तक … निरंतर
सृजन की मूल विधा : हिन्दी ग़ज़ल
प्रकाशित ग़ज़ल-संग्रह :
१. लेखनी के स्वप्न (१९७५), २. एक टुकड़ा धूप (१९७९), ३. चाँदनी का दु:ख (१९८६)
४. समंदर ब्याहने आया नहीं है (१९९२), ५. भीड़ में सबसे अलग (२००३)
६ . पेड़ तन कर भी नहीं टूटा (२०१०), ७. बोलता है बीज भी (२०१३)

सम्पर्क :
१०८, त्रिलोचन टावर, संगम सिनेमा के सामने,
गुरुबक्श की तलैया, स्टेशन रोड, भोपाल- ४६२००१ (म.प्र.)
चलित वार्ता : ०९४२५७९०५६५, अचल फोन : ०७५५-२७४००८१

 

लड़ते-लड़ते भी हारे नहीं।
युद्ध बिन भी गु़जारे नहीं।

मैंने चख कर बताए हैं, यार,
आपके अश्रु खारे नहीं!

झील के मन में कुछ रो़ज से,
चाँद, सूरज, सितारे नहीं।

ये गरीबों का आक्रोश है,
ये किसी दल के नारे नहीं!

आप तन तक ही सीमित रहे,
आप मन में पधारे नहीं।

अब तो मुश्किल से दो-चार हैं,
दोस्त भी ढेर सारे नहीं।

पूरी उसकी दुआ हो गई,
शब्द जिसने उचारे नहीं।

हम अनुभवों के कई रत्न ले के घर लौटे।
जिन्हें सिखाने गए, उनसे सीख कर लौटे!

ये बात और, वो लौटे हैं तीस साल के बाद,
प्रवासी यादों के मेहमान रात भर लौटे।

लहर ने वादा किया था कि फिर छुएगी ़जरूर,
है तट प्रतीक्षा में कब से कि वो लहर लौटे।

लड़ाके, युद्ध की धरती से लौट आए हैं,
हैं कम ही लोग, जो रण-भूमि से निडर लौटे!

जो अपने स्वप्न निराकार छोड़ आए थे,
उन्हीं के स्वप्न, हमेशा इधर-उधर लौटे।

छुड़ा के जान, अधिक उम्र के समंदर से,
मैं सोचता हूँ-नदी काश अपने घर लौटे!

शिखर को छू के, उतरना पड़ा जमीन की ओर,
हैं कम ही लोग, उतर कर, जो शीर्ष पर लौटे।

न कोई आम लगे और न कोई खास लगे।
उदास होते ही, दुनिया बहुत उदास लगे!

सुखों के पेड़ तो उगते हैं पर्वतों पे कहीं,
दु:खों के पेड़ हमारे ही घर के पास लगे।

बुझाई प्यास नदी ने असंख्य लोगों की,
बुझाए कौन भला, जब नदी को प्यास लगे?

नई सदी में हुआ प्यार देह तक सीमित,
हैं कम ही लोग जो ‘मजनूँ’ या ‘देवदास’ लगे!

शहर में दंगे या विस्फोट की खबर सुनकर,
शहर के लोग अचानक ही बदहवास लगे।

हमेशा भाग्य को रोने से कुछ नहीं होगा,
मुझे तो उसके सफलता से कम प्रयास लगे।

लगेगा वक्त अभी उसका मन बदलने में,
नवीन रुत को भी आने में चार मास लगे!

 

जो नदिया है, उसे पानी ही पानी मान लेते हैं।
अधिकतर लोग, जीवन को कहानी मान लेते हैं।

अगर खुशबू ने घर-आँगन को सारी रात महकाया,
तो उसके श्रोत को हम ‘रातरानी’ मान लेते हैं।

हैं ‘इन्टरनेट’ पर उपलब्ध लाखों आँकड़े… उन पर,
उन्हें, कुछ लोग, इस कारण भी ज्ञानी मान लेते हैं।

छिपाने से भी जब छिपती नहीं बातें सियासत में,
समर्थक, उनको ‘दल’ की सच-बयानी मान लेते हैं!

कमाया किस तरह, इस पर विचारा ही नहीं जाता,
जो धन देने लगा, उसको ही दानी मान लेते हैं।

है उनके साथ फंतासी तरह की ़िजन्दगी का सुख,
हम ऐसे सोच को ही ‘लंतरानी’ मान लेते हैं!

बहुत-से लोग, दुर्घटना से साबुत बच निकलने के,
करिश्मे को, स्वयं की सावधानी मान लेते हैं।

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तुम्हारे दु:ख में, हमारी भी पीर शामिल है।
ये आत्मा, ये समूचा शरीर शामिल है।

हमारी आँखों से बरसी हैं सैकड़ों बूँदें,
बरसती बूँदों में सागर का नीर शामिल है।

वो जिसके बाद, लगी उसकी शक्ल उस जैसी,
कई लकीरों में वो भी लकीर शामिल है।

मैं अपनी माँ को भला कौन-सा ‘विशेषण’ दूँ,
वो जिसके मन में धरित्री का धीर शामिल है।

जो चलते-चलते अनायास साथ छोड़ गया,
सफर की यादों में वो राहगीर शामिल है।

न चाहते हुए, लड़ना है युद्ध जीवन का,
हरेक व्यक्ति में कायर व वीर शामिल है।

 

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