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तुम्हारा शिष्य, हमारे पाले में आ गया है! – संस्मरण -ज़हीर कुरेशी – अंक -2

अब तो छंद-मुक्त और मुक्त-छंद कविता के सुपरिचित कवि पवन करण भी 51 वर्ष आयु की सीमा-रेखा पार कर चुके हैं। मेरे खयाल से वर्ष 1982 में पवन यही कोई अठारह साल के रहे होंगे। आकण्ठ किसी के प्यार में डूबे हुए। बाद की अपनी ”किस तरह मिलूँ तुम्हें” कविता की तरह अनेक कामनाएँ पाले हुए। 1982 में पवन करण ने अपनी रूमानी भावनाओं को कविता के रूप में आकार देना शुरू कर दिया था। लेकिन, उस समय उनकी कविता का फॉर्म था ग़ज़ल। रूमानी ग़ज़लें कहते थे। ग़ज़ल कहने का उनका कवि-कर्म संभवतः 1986 तक चला।

1986 तक दिल्ली के अलग-अलग प्रकाशनों से मेरे तीन ग़ज़ल-संग्रह प्रकाश में आ चुके थे। देश की यशस्वी पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से भी निरंतर मेरी ग़ज़लें और गीत प्रकाशित हो रहे थे। ग्वालियर में आ कर अच्छी तरह व्यवस्थित हुए भी मुझे सोलह साल हो चुके थे।

उस समय, युवा वर्ग में कोई भी नौजवान अगर ग़ज़ल या गीत लिखने की कोशिश करता था तो अपनी कविताएँ मुझे जरूर सुनाना या दिखाना चाहता था। उन दिनों मोबाइल जैसी सुविधाएँ तो थीं नहीं। लैण्ड लाइन टेलीफोन भी गिने-चुने लोगों के यहाँ हुआ करता था। इसलिए ”समीर कॉटेज” में रविवार के दिन अनिमंत्रित युवा कवियों की एक प्रकार से भीड़ रहती थी। दोपहर 3.00 बजे के बाद प्रायः कवि जुटना आरंभ होते थे। उनके बैठने, विमर्श और कविता-पाठ का यह साप्ताहिक कार्यक्रम कभी-कभी तो शाम 7.00 बजे तक भी चल जाता था। पत्नी चाय बना-बना कर परेशान थी और बच्चे (बेटा समीर और बेटी तबस्सुम) चाय-पानी ’सर्व’ कर-कर के। लेकिन, समीर कॉटेज में बरसों तक यह कार्यक्रम अविश्रांत चलता रहा।

…. तो मैं बता रहा था कि जवान होते ही पवन करण ने रूमानी कविता लिखना शुरू कर दिया था और वह भी पारंपरिक ग़ज़ल के फॉर्म में। उन्हीं दिनों, पवन की कुछेक रोमांटिक ग़ज़लें पूरी साज-सज्जा के साथ दिल्ली प्रेस की पत्रिकाओं (”सरिता” और ”मुक्ता”) में छप भी गई थीं- जिनकी मुझे खबर थी। उस समय का ग्वालियर कोई बहुत बड़ा शहर तो था नहीं। हम लोग मज़ाक में अपने शहर को महाग्राम भी कहा करते थे। कविता प्रकाशन से कवि गोष्ठी…. कवि-सम्मेलन तक की कोई भी स्थानीय गतिविधि ”माउथ टु माउथ” प्रचार माध्यम के द्वारा कमोबेश 200 स्थानीय साहित्यकारों तक पहुँच ही जाती थी। पवन करण किसी इतवार को समीर कॉटेज में हाज़िर हुए, जहाँ पहले से ही 7-8 युवा कवि जमे हुए थे। बैठक में घुसने के तुरंत बाद पवन ने मेरे पैर छुए। मैंने उसे किसी गोष्ठी में देखा था। हम लोग रू-ब-रू अब हो रहे थे। पहले से विराजे हुए किसी युवा कवि ने मुझे बताया- ”ये पवन करण हैं। स्वास्थ्य विभाग में नौकरी करते हैं। अभी इनकी एक शानदार ग़ज़ल मुक्ता में छपी हैं!

पवन करण ने मुक्ता का वह ताज़ा अंक मेरे हाथ में दिया। मैंने प्रशंसात्मक निगाहों से पत्रिका का वह अंक उलटा-पलटा और ”अभी देखते हैं” कह कर पवन को लौटा दिया। इतनी गतिविधि के बाद, युवा मित्रों की गोष्ठी फिर वहीं आ गई, जहाँ वो पहले से थी।

हम लोग साढ़े पाँच बजे तक बैठे रहे, लेकिन, उस दिन पवन करण की कविताई का नम्बर नहीं आ पाया। बैठक बरखास्त होने के बाद भी पवन बैठे रहे। सब मित्रों के जाने के बाद मैंने पवन की ओर प्रश्नवाचक निगाहों से देखा। पवन ने कहा- ”मैं ग़ज़ल लिखना चाहता हूँ।”

मैंने कहा- ”लिख तो रहे हो! अभी तक कहाँ-कहाँ प्रकाशित हुए?”

”मुक्ता” के अलावा ”सरिता” में भी।”

मैंने कहा- ”ऐसा करो, कल आ कर तुम ”सरिता”-”मुक्ता” के वे अंक मुझे दे जाओ, जिनमें तुम्हारी ग़ज़लें छपी हैं। मैं उन्हें पढ़ लूँगा। फिर तुम 5-6 दिन बाद आने वाले सेकण्ड सेटरडे को आ जाना। उस दिन कोई नहीं आता। तब तुम्हारी ग़ज़लों पर बात करेंगे।”

पुनः पैर छू कर पवन चले गए और अगले दिन ”सरिता”-”मुक्ता” की प्रतियाँ भी दे गए।

द्वितीय शनिवार की मेरी और पवन दोनों की छुट्टी थी। पवन शायद 3.30 बजे आए। पहले चाय पी गई, फिर ग़ज़लों पर बात।

मैंने बात शुरू करते हुए पवन से कहा- ”तुम्हारी ग़ज़लों का कथ्य वही है, जो तुम्हारी उम्र है। रूमान हमारी ज़िन्दगी का सबसे खूबसूरत हिस्सा है। अगर इस उम्र में कोई कवि संन्यास की बातें करता है, तो मेरे हिसाब से कहीं विचलन है। … जहाँ तक फन्नी एतबार से तुम्हारी ग़ज़लों को परखने का प्रश्न है तो उनमें बहुत खामियाँ हैं। वज़्न और बहर के अलावा भी उनमें तरह-तरह के दोष हैं।”

पवन ने प्रतिवाद-सा किया, ”तो ”सरिता”-”मुक्ता” वाले इन ग़ज़लों को कैसे छाप देते हैं?”

मैंने कहा- ”इसलिए, क्योंकि वे भी ग़ज़ल का ए, बी, सी, डी नहीं जानते। उन्हें तो साज-सज्जा के साथ रूमान को परोसना भर है।”

पवन बोले- ”तो भाई साहब, मैं ग़ज़ल के व्याकरण को सीख लूँगा। मैं आपके पास इसीलिए आया हूँ। मैं ग़ज़ल ही लिखना चाहता हूँ।”

”मैं तुमसे यह कब कह रहा हूँ कि ग़ज़ल मत लिखो। ग़ज़ल लिखो, लेकिन, साफ-सुथरी…. हर नज़रिए से चाक-चौबंद।”

पवन ने पूछा- ”तो भाई साहब, मैं क्या करूँ?”

मैंने कहा- ”कुछ नहीं। अभी तो तुम रविवार को जमने वाली इस विमर्श-गोष्ठी में आते रहो। जब मैं या कोई अन्य कवि शेर सुनाए तो उन्हें आत्म-सात करो।”

और यह क्रम चल निकला। ”समीर कॉटेज” की रविवारीय गोष्ठियों में पवन करण बिला नागा आते रहे। गोष्ठी में एकाधिक बार उन्होंने अपनी ग़ज़लें भी पेश कीं।

तब तक, पवन की सरलता के कारण मेरा भी उनसे लगाव हो रहा था। लगभग छः महीने बाद, आगामी सेकण्ड सेटरडे की तारीख देख कर मैंने कहा- ”पवन, सेकण्ड सेटरडे को आओ। अपनी ग़ज़लों की डायरी के अलावा, तुमने जो कुछ भी अब तक लिखा है… कहानी, गीत, दोहा, छन्द मुक्त या मुक्त छंद कविता… कुछ भी… उसे भी ले कर आओ।”

हस्बे-मामूल, पवन करण द्वितीय शनिवार को तीन बजे तक समीर कॉटेज पधार गए।

मैंने कहा- ”पवन, वज़्न और बहर के मैंने तुम्हें जो टिप्स दिए थे, पहले वे सब ग़ज़लें सुनाओ।”

संबद्ध ग़ज़लें सुनाई गईं। फिर कुछ ताज़ा ग़ज़लें सुनाईं।

मैंने कहा- ”बात बन नहीं रही। अभी तो तुम वज़्न और बहर में लगातार चूक कर रहे हो। फिर ग़ज़ल का मेनरिज़्म…. ग़ज़ल की बारीकियाँ सअमाने का क्या लाभ?”

तभी बैठक में चाय आ गई। हम लोग चुपचाप चाय पीते रहे। चाय का घूँट भरते हुए मैंने पवन से पूछा- ”तुमने ग़ज़लों के अलावा, कविता के किसी अन्य फॉर्म में कभी कुछ लिखा है?”

कुछ सोचते हुए पवन करण बोले, ”हाँ, छोटी-बड़ी लाइनों में लिखी जाने वाली एक कविता लिखी थी – जब पापा को जे.सी. मिल से निकाला गया था।”

मैंने पूछा- ”वो कविता तुम्हारे पास है अभी?”

बुझे स्वर में पवन बोले, ”ढूँढता हूँ रजिस्टर में!” फिर हस्तलिखित रजिस्टर के पन्ने उलट-पलट कर पवन ने वह अतुकान्त कविता ढूँढ ली।

युवा आक्रोश में पगी उस अनगढ़ कविता में व्यथा थी, परिवार की धुरी पिता को जे.सी. मिल से निकाले जाने की। हाँ, मिल से निकाले जाने के बाद, परिवार की करुण स्थिति की पड़ताल कविता में नहीं की गई थी।

कविता समाप्त होने के बाद, मैंने ताली बजाई और कहा- ”बहुत अच्छी कविता है यह। बीते सात महीनों में पहली बार तुमने कोई उल्लेखनीय कविता सुनाई है।”

अपनी कबाड़ में पड़ी हुई कविता की इतनी तारीफ सुन कर पवन करण भौंचक थे, बोले, ”लेकिन, भाई साहब, मैं तो ग़ज़ल लिखना चाहता हूँ!”

मैंने कहा- ”न ग़ज़ल-गीत लिखना बेहतर है, न छंद-मुक्त कविता कमतर। कविता के जिस फॉर्म में हम अपनी पूरी संवेदना के साथ अपनी पूरी बात को कह पायें, वही फॉर्म हमारे लिए सर्वश्रेष्ठ है। समकालीन कविता में मुझे तुम्हारा भविष्य दिखाई दे रहा है!”

यह कह कर मैं उठा और पुस्तकों की अलमारी से मैंने लीलाधर जगूड़ी का कविता-संग्रह निकाला- ”रात अब भी मौजूद है।”

पुस्तक को उलट-पुलट कर पवन करण ने कहा- ”ऐसी कविताएँ तो मैं दिन में दस लिख लूँ!”

मैंने कहा- ”नहीं लिख पाओगे! कहना सरल है, करना कठिन। नौ दिन बाद, इतवार को छोड़ कर अमुक छुट्टी पड़ रही है, तुम उस दिन आओ। केंचुआ छंद में दस कवितायें लिख कर भी लाना!”

इस प्रकार, मैं और पवन रविवार के अलावा पड़ने वाली किसी अन्य छुट्टी के एकान्त में मिलने लगे।

लीलाधर जगूड़ी की पुस्तक लौटाने के बाद एक-एक करके मैंने पवन को राजेश जोशी, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, मंगलेश डबराल के कविता-संग्रह पढ़ने को दिये। कविता-संग्रह लौटाते जाते थे, मैं उन्हें समकालीन कविता का अगला संग्रह थमा देता था।

समकालीन कविता में पवन करण को मज़ा आने लगा था। उनकी ग़ज़ल की लत छूट रही थी। वे हर मीटिंग में अपनी 2-3 ताज़ा छंद-मुक्त कविताएँ सुनाते रहते थे।

पवन में प्रतिभा तो थी लेकिन, उसका सदुपयोग नहीं हो पा रहा था। उनकी छंदम-ुक्त और मुक्त छंद कविताओं में सुधार के लिए मंै समुचित सलाह भी देता रहता था। सलाह के बाद, किए संशोधनों से कई बार कविता बहुत सुन्दर बन जाती थी। मैं पवन को यह भी बताता रहता था कि कविता के विषय कैसे चुने जायें…. कौन से चुने जायें। छोटे-छोटे ज़मीनी विषयों पर बड़ी कविता कैसे लिखी जा सकती है।”

उस समय तो पवन करण ने समकालीन कविता पर दी गई मेरी हर सलाह को माना। मैंने कहा कि यह कविता अमुक पत्रिका में भेज दो तो भेज दी। शीघ्र ही, ग्वालियर के अज्ञात पवन करण की कविताएँ देश की यशस्वी पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगीं।

उन दिनों, मैं ग्वालियर इकाई में जनवादी लेखक संघ का सचिव था। पवन ने पूछा, ”भाई साहब, मैं जलेस का सदस्य बन जाऊँ?”

मैंने कहा, ”नहीं! तुम जलेस के नहीं, प्रलेस के सदस्य बनो। प्रगतिशील लेखक संघ, ग्वालियर में प्रकाश दीक्षित, डॉ. जगदीश सलिल, महेश कटारे, ओम प्रकाश शर्मा आदि अनेक साहित्यकार हैं- जो छन्द मुक्त कविता में तुम्हें आगे बढ़ा सकते हैं!”

मेरी बात सुन कर पवन करण एक बार फिर निराश हुए। फिर भी, उन्होंने मेरी बात मानी और प्रगतिशील लेखक संघ की सदस्यता ले ली।

उनकी कविताएँ देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लगातार आ रही थीं। प्रलेस में जाने के बाद भी, उनका मुझसे मिलना, अपनी कविताओं पर सलाह-मशविरा करना बदस्तूर जारी था।

एक दिन, कला-वीथिका में होने वाली कथा-गोष्ठी में बतौर श्रोता शामिल होने के लिए जब मैं पहुँचा तो कथाकार महेश कटारे ने ज़ोर से नमस्कार की और लगभग उसी स्वर में कहा- ”तुम्हारा शिष्य, हमारे पाले में आ गया है!”

मैंने भी हँसते हुए उत्तर दिया-”दल-बदल तो चलता रहता है, सर!”

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