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पांच नवगीत – यश मालवीय – अंक-1

यश मालवीय

जन्म : 18 जुलाई  1962 
शिक्षा : इलाहबाद विश्वविद्यालय से स्नातक
सम्प्रति : ए.जी. ऑफ़िस इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश में कार्यरत
पिता : उमाकांत मालवीय
सम्पर्क : ‘रामेश्वरम’, ए-111, मेंहदौरी कॉलोनी, इलाहाबाद 211004
मो.- (+91)9839792402

प्रकाशित कृतियां :
नवगीत संग्रह – कहो सदाशिव, उड़ान से पहले, एक चिड़िया अलगनी पर एक मन में, बुद्ध मुस्कुराए, एक आग आदिम, कुछ बोलो चिड़िया, रोशनी देती बीड़ियाँ, नींद कागज की तरह
दोहा संग्रह – चिनगारी के बीज
व्यंग्य संग्रह – इण्टरनेट पर लड्डू, कृपया लाइन में आएँ, सर्वर डाउन है
बालगीत संग्रह – रेनी डे, ताकधिनाधिन

पुरस्कार :
दो बार उ.प्र. हिन्दी संस्थान का निराला सम्मान, संस्थान का ही उमाकांत मालवीय पुरस्कार और सर्जना सम्मान, मुंबई का मोदी कला भारती सम्मान, नई दिल्ली से परम्परा ऋतुराज सम्मान, शकुंतला सिरोठिया बाल साहित्य पुरस्कार।

विशेष :
भारत रंग महोत्सव, नई दिल्ली में नाटक ‘मैं कठपुतली अलबेली’ का मंचन।
उदय प्रकाश की कहानी पर बनी फ़िल्म ‘मोहनदास’ के लिए गीत लेखन।
पिछले साढ़े तीन दशकों से दूरदर्शन एवं आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रों से रचनाओं का प्रसारण
राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशन। स्तम्भ लेखन।
नवगीत के प्रमुख कवि।

 

समय लकड़हारा

हर दिन है फिसल रहा
जैसे हो पारा
हाथ नहीं आता है
समय लकड़हारा

छा जाती मौसम पर
साँवली उदासी
पाँव पटकती पत्थर पर
पूरनमासी
रात गए लगता है
हर दिन बेचारा

पेड़ों पर चढ़-चढ़कर
उतरती गिलहरी
धू-धू कर जलती है
धूप में दुपहरी
कितना भी जले
मगर बुझता अंगारा

बा़जारों में आती
ते़जी या मंदी
हो जाती है, कमी़ज की
कॉलर गंदी
होता अनमोल रतन
बस आँसू खारा

 

हर बाबा भभूत देता है

हर बाबा भभूत देता है
गंगा की रेती पर जाकर
नाव भक्ति वाली खेता है

दण्ड कमण्डल पोथी पतरा
चिमटा झाँझ मजीरा
स्याह सफ़ेद भला क्या जानें
श्यामल गौर शरीरा
हर बाबा भभूत दता है
उस ईश्वर को चूना देता
जिसका नाम सदा लेता है

दिन दिन भर वाणिज्य महोत्सव
बा़जारों के चर्चे
मन्दिर चढ़े निशान,
म़जारों पर चादर के खर्चे
हर बाबा भभूत देता है
सारा लेखा जोखा रखता
किसका गला, कहाँ रेता है?

मान मनौती जंतर-मंतर
पीला काला धागा
एक मोम जामे में बंदी
खुद ही भाग्य अभागा
हर बाबा भभूत देता है
मोटा सा ताबीज पहनकर
भक्तों के सपने सेता है

 

सड़कों के घर जाते हैं

आँखों के खाली पैमाने
दृश्यों से भर जाते हैं
घर से उबियाते हैं तो फिर
सड़कों के घर जाते हैं

पतंग बेचते मौलाना से
जी भर बातें होती हैं
सि़र्पâ हमारे उड़ने से ही
शामें रातें होती हैं
चुप्पी के होठों पर कोई
नगमा सा धर जाते हैं

इलेक्ट्रॉन प्रोटान बताते
चुटिया वाले पंडित जी
बंदर जैसे बच्चे दिखते
हँसते खिलते खी खी खी
रस्सी वाला साँप देखकर
जान बूझ डर जाते हैं

जुड़ जाते म़जदूर किसानों
के पैरों के छालों से
मेहनत की परिभाषा करते
बूढ़े रिक्शे वालों से
बिना नहाए गंगा जमुना
जीते जी तर जाते हैं

एक अकेला फूल

ढूँढ रहे थे और…..
और कुछ मिलता चला गया
धीरे-धीरे दिन साँसों में
खिलता चला गया

 

नीला काग़ज नहीं मिला
पर मिली गुलाबी कॉपी
पल भर को स्थगित हो गयी
सारी आपाधापी
एक अकेला फूल
हवा में हिलता चला गया

 

पल छिन ठहरा
मूँगफली सी ़खुशी टूँगने में
वही न पाए, मिला बहुत कुछ
मगर ढूँढने में
बातों का था धनी
होंठ को सिलता चला गया

 

हरे ताल में छुपे अनछुपे
हरियाली के आखर
परदे में ही रहा मगर
सब कुछ कर दिया उजागर
रेशम से रेशम का धागा
छिलता चला गया

 

भोपाल आया है

ओढ़ने को
इन्द्रधनुषी शाल आया है
धूप में बरखा सरीखा ख्याल आया है

दूर तक बौछार में
किरनें पिरोयी हैं
शो़ख ऩजरें, दूध में
धोयी-बिलोयी हैं
शुभ लगन में
रोशनी का थाल आया है

दही अक्षत
फूल पत्तों ने सजाए हैं
डाकिए ने, दोपहर के
दो बजाए हैं
एक चिठ्ठी और नैनीताल आया है

फोन या ईमेल
चिट्ठी की जगह क्या लें
अनकहा कुछ कहे जाने की
वजह क्या दें
इसलिए ही
पश्चिमी बंगाल आया है
नील सा परिधान
नीला सा गगन होगा
उसी मनु का,उसी श्रद्धा से
मिलन होगा
आ गयी कामायनी,
भोपाल आया है

 

2 thoughts on “पांच नवगीत – यश मालवीय – अंक-1

  1. सत्यनारायण जीनगर August 29, 2016 at 8:36 am

    बहुत ही सजीवता के साथ व्यक्त यशजी की कवितायेँ व्यवस्था पर भी प्रहार करती है और मजदूरों के श्रम के अवमूल्यन पर सवाल करती है l सामाजिक व्यवस्था के ताने-बाने को लेकर अपना चिंतन दर्शाती हैं…..साधुवाद

  2. शुभम् श्रीवास्तव ओम September 1, 2016 at 1:57 am

    अनुकरणीय शैली,शिल्प एवं भाषा के नवगीत।

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