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पांच ग़ज़लें (शरीफ़ अहमद  क़ादरी) अंक – 2

शरीफ़ अहमद  क़ादरी “हसरत”
पता  –  कंडेल  बाज़ार  श्योपुर  (म .प्र .)

संवाद  – शायरी  का शौक़  मुझे  शुरू  से रहा  लकिन सही  रहनुमाई नहीं  मिल पा रही थी फिर तकरीबन दो साल डॉ रफीक़ गिरधरपुरी की शागिर्दी में रहा| उसके बाद डॉ ज़ाकिर नश्तरी की रहनुमाई हासिल हुई इसके अलावा ओपन बुक्स ऑनलाइन मेरे लिए मशअल ए राह साबित हुई डॉ योगराज प्रभाकर जी ने मेरा काफी मार्गदर्शन किया ओपन बुक्स ऑनलाइन के तरही मुशायरों में हाजरी होती है इसी मंच के माध्यम से अंजुमन प्रकाशन से शाया हुए किताब “ग़ज़ल के फलक पर” में भी मेरी ग़ज़लें शाया हो चुकी हैं| 

1

करा के मुल्क में दंगे हुकूमत कौन करता है
पता सबको है नफरत की सियासत कौन करता है

इधर नफरत के सौदागर उधर सरहद के रखवाले
वतन तू ही बता तेरी हिफाज़त कौन करता है

पुराने हो गए किस्से सभी फ़रहाद शीरीं के
फ़कत जिस्मों की चाहत है मोहब्बत कौन करता है

यही हालात कहते हैं यही मंज़र बताते हैं
ग़रीबों की ज़माने में हिमायत कौन करता है

अदा हमने किये हैं साया ए तलवार में सजदे
ख़ुदा की इस तरह जग में इबादत कौन करता है

सभी मशरूफ़ हैं मक्कारियों की चालसाज़ी में
कहाँ अखलाक़ वाले हैं मुरव्वत  कौन करता है

सभी अहले वतन खुश हों रहे अमनो-अमां कायम
तमन्ना किसकी ऐसी है ये हसरत कौन करता है

2

इश्क़ करता है कौन दुनिया में
दिल से मरता है कौन दुनिया में

मुफ़्त शेखी बघारने वाले
तुझसे डरता है कौन दुनिया में

महवे हैरत है आसमां मुझ पर
आहें भरता है कौन दुनिया में

आईना बन गए हैं हम लेकिन
अब संवरता है कौन दुनिया में

दिल की गहराई से तुझे हसरत
याद करता है कौन दुनिया में
3

जाने  क्या सोच के उसने ये हिमाक़त की है
हो के दरिया जो समंदर से अदावत  की है

खींच लायी है तेरे दर पे ज़रुरत मुझको
हो के मजबूर उसूलों से  बग़ावत की है

हमने ख़ारों पे बिछाया हे बिछोना अपना
हमने तलवारों के साये में इबादद की है

अच्छे हमसाये की तालीम मिली है हमको
हमने जाँ दे के पड़ोसी की हिफाज़त की है

आज आमाल ही पस्ती का  सबब  हैं  वरना
हमने हर दौर में दुनिया पे हुकूमत की है

दम मेरा कूच -ए -सरकार  में जाकर निकले
इस तमन्ना के सिवा  कुछ भी न हसरत की है

4

सोचा था हमने फूल खिलेंगे बहार में
सींचा चमन लहू से इसी ऐतबार में

दिल भी नज़र भी ख़्वाब भी सब आपके हुए
कुछ भी नहीं  है अब तो मेरे  इख्तियार  में

होशो-हवास अक्लो-खिरद हसरतें तमाम
सब  कुछ  लुटा  दिया  है  तेरे  इंतज़ार में

कोशिश अदू की नीचा दिखाने की है मगर
हरगिज़  कमी  न  आएगी  मेरे  वक़ार में

आया  वफ़ा की  राह  में  कैसा मकाम  ये
अब  ज़िन्दगी  खड़ी है ग़मों की क़तार में

कोशिश के बावजूद भी कटती नहीं है शब
उठ  उठ  के बैठता  हूँ  तेरे  इंतज़ार  में

हसरत वफ़ा की राह में सब कुछ लुटा दिया
सपने  तमाम  बह  गए  अश्क़ों की धार में

5

चाहा था दिल ने जिसको वो दिलदार कब मिला
सब कुछ मिला जहाँ में मगर प्यार कब मिला

तनहा ही तय किये हैं ये पुरखार रास्ते
इस जीस्त के सफ़र में कोई यार कब मिला

बाज़ार से भी गुज़रे  हैं हाथों में दिल लिए
लेकिन हमारे दिल को खरीदार कब मिला

उल्फत में जां भी हंस के लुटा देते हम मगर
हम को वफ़ा का कोई तलबगार कब मिला

तनहा ही लड़ रहा हूँ मैं हालाते जीस्त से
हसरत को जिंदगी में मददगार कब मिला

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