tere nam ka leke aasara

समीक्षा : तेरे नाम का लिये आसरा – समीक्षक : शिज्जु शकूर (अंक -3)

अनुभव एवं काव्य प्रतिभा का संग्रहणीय संकलन

हमेशा से मेरा ये मानना है कि ज़िन्दगी मुसलसल हर सांस के साथ फ़ना होती है और हर सांस के साथ शुरू । किसी काम के करने का मुनासिब वक्त कौन सा है? मेरा जवाब है जब शुरू करो वही वक्त मुनासिब है। ठीक उसी प्रकार सीखने की उम्र क्या है?  बड़ा बेतुका सवाल है हर कोई जानता है कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती। श्री गिरिराज भंडारी जी उन लोगों में हैं जिनमें सीखने एवं समझने की प्रवृत्ति नैसर्गिक है, ऐसे लोग ये नहीं देखते कि सिखानेवाला कौन है बड़ा या छोटा। ये वही शख़्सियत है जिन्होने रिटायरमेंट की उम्र में ग़ज़ल सीखना शुरू किया।  ग़ज़ल की बारीकियाँ जहाँ से जिससे सीखने को मिली सीखी, उन्होंने एक विद्यार्थी की तरह हर पाठ को ग्रहण किया। उनके अनुभव एवं काव्य प्रतिभा को जब ग़ज़ल की शिल्प का साथ मिला तो एक के बाद एक खूबसूरत रचनायें सामने आईं हालाँकि उन्हें अब भी एक लम्बा सफर तय करना है। उनकी पहली किताब तेरे नाम का लिये आसरा से जब मैं गुज़रा तो ऐसा लगा मानो पल भर में मैंने एक उम्र जी ली हो। उम्र के साथ आने वाला सहज तज़्रिबा, परिस्थितियों को समझने की खूबी यह उनकी शख्सियत की कुछ विशेषतायें हैं। उनकी सबसे बड़ी ताकत उनकी सकारात्मकता है, उनकी आशावादिता इस किताब पहले शे’र से ही झलकती है

“प्यास में अब पानी न मिले शबनम ही सही

ख्वाब तो हो सच्चा न सही मुबहम ही सही

 

कभी कभी इनकी ग़ज़लें तपती धूप में सर्द फुहारों सी लगती है। बड़ी मुलायमियत से अपनी बात रखते हैं कि दिल बेसाख्ता वाह कर उठता है।  उनकी सादादिली, सकारात्मकता का एक उदाहरण ये दो अशआर हैं-

“ये कैसी रश्मियाँ हैं धूप की झुलसा रही हैं

मगर किस सिम्त से ठंडी हवायें आ रही हैं

 

“ज़िन्दगी तो रोज़ आँसू बाँटती है

हम चुराते हैं हँसी हर वाकिये से

 

उनके जीवन में संघर्ष तो बहुत था आसानी से उस दौर से निकल भी आये संभवतः यही वजह थी सकारात्मकता उनकी रचनाओं में उभर के आती है। उनका अनुभव कभी कभी दार्शनिकता का पुट लिये ग़ज़ल में, किसी शेर में सहज ही आ जाता है-

“ज़िन्दगी का हाल तुमको क्या बताऊँ दोस्तों

पहले गुज़री पाप करते बाकी अब धोते हुये

 

वे सीधी सच्ची बातें ही कहते हैं बहुधा ये हमारे दैनिक जीवन से जुड़े होते हैं। ये अपने आपको मजबूत करने के लिये तकलीफों से गुज़रने से भी गुरेज नहीं करते

“पैरों को मजबूतियाँ भी चाहिये कुछ

चल ज़रा काँटो पे चलके देखते हैं

 

काँटो पर चलना यानि मुसीबतों से वाबस्ता होना जो हर सूरत में एक इंसान को नापसंद होता है, शायद यही वजह है कि वे सच्चाई को मानते हुये हद में रहते हुये खुद को आजमाने की बात करते हैं।

नज़ाकत के साथ ज़रुरत के समय एक दृढ़ता भी उनके स्वभाव में झलकती है ये दृढ़ता कुछ आक्रामकता लिये हुये है-

“वो जिसने कल मेरे ख्वाबों को चीर डाला था

मैं उसके आज ही अरमान सब कुतर आया

 

वक्त के हिसाब से इंसान को थोड़ा तल्ख होना ही पड़ता है या कहूँ इंसान में स्वाभाविक रूप से तल्खी आ ही जाती है।

इनके कुछ और अशआर देखिये

“और भी हैं आसमाँ इस आसमाँ में

एक अपना भी जहाँ है इस जहाँ में”

 

“अबस उम्मीद में बैठे हो सूरज से कि ठंडक दे

तुम्हें ये जानना होगा जलाना उसकी फितरत है”

 

“फिर वही खत किताबें वही गुफ्तगू

वक्त ज्यूँ प्यार का फिर तराना हुआ”

 

कुछ इसी तरह अलग अलग रंगों से सजी हुई अलग अलग मिजाज़ की ग़ज़लों का संग्रह है तेरे नाम का लिये आसरा जिसे अंजुमन प्रकाशन ने साहित्य सुलभ संस्करण के तहत अत्यंत कम दाम में मुहैया कराया है । अंजुमन प्रकाशन ने रचनाकारों को प्रोत्साहित करने के लिये एक अच्छी पहल की है।

 

पुस्तक परिचय –
तेरे नाम का लिए आसरा (ग़ज़ल संग्रह – गिरिराज भंडारी)
प्रकाशक – अंजुमन प्रकाशन

मूल्य – १२० रुपये

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समीक्षक –

शिज्जु शकूर (कार्यकारिणी सदस्य ओपन बुक्स ऑनलाइन डॉट कॉम)

रायपुर (छग)

9303436440

ई मेल- Shijju.1977@gmail.com

 

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