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कविता क्या है? (आलेख – सौरभ पाण्डेय) अंक-1

जन्मतिथि 3 दिसम्बर 1963
जन्म स्थान देवघर, झारखण्ड
कृतियाँ इकड़ियाँ जेबी से (काव्य संग्रह)
परों को खोलते हुए – १ (संपादन)
संपर्क, मो- 9919889911

सौरभ पाण्डेय का मूल पैत्रिक स्थान उत्तर प्रदेश के बलिया जनपद का द्वाबा परिक्षेत्र है तथा परिवार विगत पच्चीस वर्षों से इलाहाबाद में है. आप उन अध्येताओं में से हैं जिनके लिए साहित्य-कर्म मात्र संप्रेषण नहीं, बल्कि विचार-मंथन एवं सतत मनन का पर्याय है. रचना-कर्म में ‘क्या’ के साथ ‘क्यों’ और ‘कैसे’ को भी आप उसी तीव्रता से अहमियत देने का आग्रह रखते हैं. आपकी पहचान एक गंभीर साहित्यकार के रूप में होती है. विभिन्न छंदों पर रचनाकर्म करने को आपने गंभीरता से लिया है. ई-पत्रिका ओपन बुक्स ऑनलाइन डॉट कॉम में प्रबन्धन समिति में आपका मनोनयन आपकी इस लगन को रेखांकित करता है. त्रैमासिक पत्रिका विश्वगाथा के परामर्शदात्री समूह के सदस्य के तौर पर आप सम्मानित हैं.

लगभग इक्कीस वर्षों से आप राष्ट्रीय स्तर की विभिन्न कॉर्पोरेट इकाइयों में कार्यरत हैं, सम्प्रति, नेशनल स्किल डेवेलपमेंट कॉर्पोरेशन की परियोजनाओं को संचालित करने के क्रम में कोलकाता स्थित एक कॉर्पोरेट इकाई में प्रशिक्षण तथा ऑपरेशन विभाग के आप प्रमुख हैं. आप गणित से स्नातक होने के साथ सॉ़फ्टवेयर तथा निर्यात-प्रबन्धन में डिप्लोमा प्राप्त हैं. तथा प्रबन्धन की डिग्री ली है. स्वामी विवेकानन्द के विचारों का आप पर बहुत अधिक प्रभाव है.

 

कविता क्या है?

मानवीय विकासगाथा में काव्य का प्रादुर्भाव मानव के लगातार सांस्कारिक होते जाने और संप्रेषणीयता के क्रम में गहन से गहनतर तथा सुगठित होते जाने का परिणाम है. मानवीय संवेदनाओं को सार्थक अभिव्यक्ति नाट्यशास्त्र और इसकी विधाओं से मिली जहाँ से काव्यशास्त्र ने अपने लिए आवश्यक अवयव ग्रहण किये. इन अवयवों के कारण ही प्रस्तुतियाँ क्लिष्ट से क्लिष्टतर होती गयीं और निवेदन गहन से गहनतर होते चले गये. अर्थात, प्रस्तुतियाँ जो सहज शब्दों और सरल वाक्यों में सीधे अर्थों को अभिव्यक्त करती थीं, यानि, शब्द अभिधात्मक हुआ करते थे, धीरे-धीरे भावाभिव्यक्तियाँ बिम्बात्मक होने के साथ-साथ अभिव्यंजनात्मक होने लगीं. यानि, उनके इशारे (इंगित) गहन होने लगे. भावाभिव्यक्ति का इससे भी क्लिष्ट स्वरूप गद्य हुआ, जो भावों को व्यक्त करने का माध्यम बना. यह मानसिक विकास का ही अगला पड़ाव समझा जाता है.
मूलभूत शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति के बाद मनुष्य के लिए यह कभी संभव नहीं रहा कि वह केवल उन आगामी क्षणों की प्रतीक्षा करता रहे जब उसे पुन: अपने और अपने आश्रितों के शरीर के संकेतों को संतुष्ट करना भर उसके जीवन का उद्येश्य हो जाय. उसके लिए पेट की अस्मिता के आगे वैचारिकता स्थान लेती रही है. यही वैचारिकता मनुष्य की संप्रेषणीयता को समृद्ध करने का कार्य करती है. अनादिकाल से! काव्यशास्त्र के यही आधारभूत अवयव कविता को समझने और कविता के माध्यम से वैचारिक संप्रेषणीयता को समझाने के भी मूल रहे हैं.
क्यों न आज हम यही समझने का प्रयास करें कि कविता वस्तुत: है क्या. भाव संप्रेषण की वह शाब्दिक दशा जो मानवीय बुद्धि के परिप्रेक्ष्य में मानवीय संवेदना को तथ्यात्मक रूप से अभिव्यक्त करे, कविता होती है. सपाट भावाभिव्यक्ति सहज और सुगम भले ही हो तथ्यात्मकता को संवेदनाओं का साहचर्य और संबल नहीं दे सकती. इसीकारण भावुकता का अर्थवान स्वरूप जहाँ कविकर्म है वहीं उसकी शाब्दिक परिणति कविता.
इसका अर्थ यह हुआ कि कविता शब्द-व्यवहार के कारण भाषायी-संस्कार को भी जीती है. इसी कारण भाषा-व्यवहार और शब्द-अनुशासन कविता के अभिन्न अंग माने जाते हैं. अर्थात, भावुक शाब्दिक उच्छृंखलता कभी कविता नहीं हो सकती. जबकि यह भी उतना ही सत्य है कि भावुकता ही कविता का मूल है. यानि, मात्र एक तार्किक शब्द अपने होने मात्र से कविता का निरुपण कर सकता है. क्योंकि शब्द मात्र इंगित न होकर भाव-भावना-अर्थ का भौतिक समुच्चय होते हैं. शब्द वृत्तियों के भौतिक निरुपण की भौतिक इकाई हैं. वृत्तियों के निर्वहन में शब्द एक बडी भूमिका निभाते हैं. अत: चित्त का विवेक, यानि बुद्धि, कविता की उत्पत्ति और समझ दोनों के लिए अनिवार्य है.
कविता संप्रेषण के कई साधन हो सकते हैं तथा इन साधनों की कितनी ही प्रासंगिक, अप्रासंगिक विधायें हो सकती हैं! छन्द-बद्धता, छन्द-उन्मुक्तता कविता के मुख्य साधन हैं और मात्रिकता, गण निर्धारण, तुकान्तता, गति, अलंकार, संप्रेष्य तथ्य आदि उन साधनों के अवयव हैं.
वर्तमान में व्यावहारिकता के लिहाज से कविता के दो रूप हो सकते हैं –
पहला, कविता, जो भाव-विस्फोट को शब्दों की ऐसी काया दे जो गेय अथवा वाच्य हो.
दूसरा, कविता, जो प्राणिगत भावोद्गारों को शब्दों का ऐसा प्रारूप दे जिसे बुद्धि द्वारा साधा जा सके. इस तरह से कविता सुनने-गाने के साथ-साथ पढ़ने-गुनने और उसके आगे मनन-मंथन की भी चीज हो जाती है.
इस लिहाज से हम भाव-प्रवण कवि के उर्वर मनस से उपजने वाली कविता की उत्पत्ति के दो रूप मान सकते हैं
पहला, मानसिक एकाग्रता, जिसके कारण संप्रेषण हेतु निरीक्षण संभव हो पाता है
दूसरा, सतत शाब्दिक अभ्यास ताकि कथ्य सार्थक रूप से संप्रेष्य का निर्वहन कर सके.
कहने का अर्थ यह है कि यदि कवि स्वयं भाव-प्रवण नहीं होगा, तो सतत अभ्यास द्वारा विधानात्मक कौतुक भले ही कर ले, संवेदना के स्तर पर पाठक या श्रोता को संतुष्ट नहीं कर पायेगा. विधाओं की कसौटी पर उसका कर्म ‘कविता’ भले घोषित हो जाये, समाज को कोई भावनात्मक संबल नहीं दे सकेगा, जो कि ऐसे कर्म का हेतु है. रचनाकार का, विशेष रूप से कविता का, मुख्य कार्य श्रोता-पाठक की भावदशा को संवेदित करना है. इस आधार पर हम यह कहने की स्वतंत्रता ले सकते हैं कि जिस शब्द-व्यवहार से मानवीय संवेदनाएँ प्रभावित हो जायें वही कविता है. इसी कारण ऊपर कहा गया है कि एक सान्द्र शब्द अपने आप में एक समृद्ध कविता की भावदशा को जी सकता है, इस निवेदन के साथ, कि इस उच्च अवस्था की अनुभूति के पहले किसी रचनाकार को भाव-साधना तथा शब्द-साधना के घोर तप से गुजरना होता है. कविता का कोई रूप क्यों न हो उसका हेतु और उसकी प्रासंगिकता मानवीय संवेदना को संतुष्ट और प्रभावित करना है. कविता चाहे गेय हो, वाच्य हो या मननीय ही क्यों न हो.
पुराने मनीषियों की आवश्यकता और समझ के अनुसार कविता श्रव्य थी. इसी कारण, कविता और छन्दों में शाब्दिक चमत्कार को निरुपित करने के लिए अलंकारों की आवश्यकता होती थी. उससे पूर्व नाट्यशास्त्र के नवरसों के माध्यम से कविता को श्रेणीबद्ध करने का साग्रह प्रयास किया गया ताकि कोई शाब्दिक संप्रेषण मानवीय मनोदशा की आवश्यकता के अनुसार हुए शाब्दिक-निवेदन को प्रतिस्थापित कर सके. आज कविता पठनीय हो गयी है. इसके प्रारूपों में मात्र शब्द ही नहीं, बल्कि गणित शास्त्र के मान्य और स्वीकृत गणितीय-चिह्न भी कविता का मुख्य भाग बन गये हैं, जिनको ध्वनियों के माध्यम से अभिव्यक्त किया ही नहीं जा सकता. अत: कविता श्रव्य मात्र नहीं रह गयी है. अपितु, यह विचारों की अति गहन इकाई हो चुकी है. तो प्रश्न उठना सहज ही है कि क्या ऐसा कोई संप्रेषण कविता है? उत्तर में प्रतिप्रश्न होगा, कि क्या ऐसा कोई संप्रेषण व्यवहार में समेकित रूप से मानवीय संवेदना को प्रभावित कर पाता है? यदि वास्तव में एक बड़ा वर्ग ऐसे संप्रेषण को समझता है और प्रभावित होता है तो वह कविता है. और, यह कविकर्म की मानसिक सम्पन्नता श्रोता-पाठक की मानसिक व्यवस्था के संयमित मेल पर निर्भर करता है कि कोई संप्रेषण मानवीय मर्म की किस गहराई तक अपनी पहुँच बना पाता है.
यानि, एक स्तर से नीचे की कविता प्रबुद्ध श्रोता-पाठकों को जहाँ संवेदित या संतुष्ट नहीं कर सकती तो एक स्तर से आगे की कविता कतिपय श्रोता-पाठकों के लिये दुरूह हुई उनसे अस्वीकृत हो जाती है. इस के लिए जहाँ तक संभव हो, दोनों इकाइयों का उत्तरोत्तर मानसिक विकास आवश्यक है. अन्यथा, एक विन्दु के बाद कविता अपने कर्तव्य से गिरती दिखती है, तो श्रोता-पाठक अपने मानसिक, वैचारिक, भावप्रधान विकास से वंचित रह जाते हैं.

3 thoughts on “कविता क्या है? (आलेख – सौरभ पाण्डेय) अंक-1

  1. ” कविता की उत्पत्ति के दो रूप मान सकते हैं
    पहला, मानसिक एकाग्रता, जिसके कारण संप्रेषण हेतु निरीक्षण संभव हो पाता है”
    ये है कविता का मूल मंत्र
    आलेख अलख जगायेगा ।

  2. आलेख को पत्रिका के नवीन अंक में स्थान देने के लिए हार्दिक धन्यवाद.
    शुभ-शुभ

    एक बात:
    आलेख के बेहतर वाचन के लिए पॉराग्राफ का ’डेलिमिनेटर’ रहने देना था.

  3. Thank you

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