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पाँच कविताएँ – संजीव निगम – अंक 2

संजीव निगम 

कविता, कहानी, व्यंग्य लेख, नाटक आदि विधाओं में सक्रिय रूप  से  लेखन।  अनेक पत्रिकाओं-पत्रों में रचनाओं का लगातार प्रकाशन। 
मंचों, आकाशवाणी और दूरदर्शन से रचनाओं का नियमित प्रसारण. 
रचनाएं कई संकलनों में प्रकाशित हैं जैसे कि: 'नहीं अब और नहीं', 'काव्यांचल', 'अंधेरों के खिलाफ', 'मुंबई के चर्चित कवि' आदि.
एक व्यंग्य संग्रह प्रकाशित। शेक्सपीयर की 7 कहानियों का अनुवाद पुस्तक रूप में प्रकाशित।
कुछ टीवी धारावाहिकों का लेखन भी किया है. इसके अतिरिक्त 18  कॉर्पोरेट फिल्मों का लेखन भी.स्वाधीनता संग्राम और कांग्रेस के इतिहास पर ' एक लक्ष्य
एक अभियान' नाम से अभिनय-गीत- नाटक मय स्टेज शो का लेखन जिसका मुंबई में कई बार मंचन हुआ.
गीतों का एक एल्बम प्रेम रस नाम से जारी हुआ है.
आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रों से 16 नाटकों का प्रसारण.



1 - ज़िन्दगी

कुछ देर के लिए कुछ मत देखो,
कुछ मत कहो, कुछ मत सुनो,
बस गुम रहो अपने आप में,
ऐसे,
जैसे दुनिया में तुम्हारे सिवाय
और कोई  नहीं है।
कुछ देर के लिए भूल जाओ कि
तुम हो किसी के पिता, किसी के पुत्र,
किसी के पति।
या फिर हो
किसी की माँ, किसी की बेटी,
किसी की पत्नी।
कुछ देर के लिए
बस गुम रहो अपने आप में,
ऐसे,
जैसे दुनिया में तुम्हारे सिवाय
और कोई  नहीं है।
कुछ देर के लिए चुपचाप
निकल पडो, हरी भरी वादियों में ,
देखो फूलों का मुस्करा कर खिलना,
सुनो चिड़ियों का ख़ुशी भरा गाना,
और कहो अपने आप से,
'ज़िन्दगी सिर्फ एक अंधी दौड़ नहीं है।'


2 - कोई कोई दिन

कोई कोई दिन ऐसा होता है,
जब कुछ करने का मन नहीं होता है,
जब सुबह सुबह चिड़ियों का चहचहाना भी
कानों को खलने लगता है।
जब खिड़की से झांकती धूप को देख,
भगा  देने का मन करता है।
जब दरवाज़े पर कोई थपथपाहट सुन,
गाली देने को दिल करता है।
जब बिस्तर पर खामख्वाह पड़े रहना ही,
सार्थक लगने लगता है।
जब नींद खुली, पर  आँखें बंद होती हैं,
और दिमाग यूँ ही इधर उधर घूमता रहता है।
कोई कोई दिन ऐसा होता है,
जब तुम्हारी भी याद नहीं आती है,
और तब भी मन को न जाने क्यों,
अच्छा अच्छा सा लगता है।


3 - असीम अभिव्यक्ति 

क्या तुमने भी यह महसूस किया है कि
जब कभी हम एक दूसरे को बस
छू भर लेते हैं,
कितने ही संवादों को बोलने से बच जाते हैं.
बोलना तो एक ऐसी प्रक्रिया है
जिसमे भावों के धागों से सिलकर,
चाहे कितना ही सुन्दर परिधान तैयार करो,
फिर भी, उसमे कोई ना कोई झोल रह ही जाता है.
जबकि ठीक इसके विपरीत,
छू लेना किसी को आत्मीयता से भर कर
ऐसी क्रिया है जिसमे
एक तार के दूसरे तार से मिलते ही
सैकड़ों बल्बों की रंगीन झालर
जगमगा उठती है.
इसीलिए मैं कहता हूँ मेरे दोस्त कि
अपनी अभिव्यक्ति के सर्वोत्तम क्षणों में,
तुमको आगे बढ़ कर प्यार से छू लेने से
बेहतर शब्द मेरे पास नहीं हैं.


4 - संवेदनाएं अभी मरी नहीं हैं

हर दिन जब हम एक दूसरे के पास से
चुपचाप गुज़रते हैं,
परिचय अपरिचय का धूपछाँही आभास लिए,
मेरे मन के छोटे से गमले में
कितने ही सवालों की कोंपलें फूट पड़ती हैं.
कहीं ऐसे ही कुछ सवाल
तुम्हारे मन में भी तो नहीं?
हर दिन जब हम एक दूसरे की ओर
चले आ रहे होते हैं,
मुझे महसूस होता है कि
मैं अच्छा और अच्छा ,
सुन्दर और सुन्दर होता जा रहा हूँ,
इस विश्वास के साथ कि
मुझमे ऐसा बहुत कुछ है
जो मुझे तुमसे जोड़ सकता है.
कहीं इसी जुड़ाव का विश्वास
तुम्हारी कल्पनाओं में भी तो नहीं?
हर दिन जब घड़ी की सुस्त रफ़्तार सुईयां
बड़ी देर बाद,
तुम्हारे आने के सुखद क्षण संजोने लगती हैं,
मेरे शरीर के भीतर एक सुनहली कंपकंपी
रेशमी जाल  बुनने लगती है.
आँखों के आगे उगने लगता है तुम्हारा रूप,
अच्छा, और अच्छा,
सुन्दर, और सुन्दर,
पवित्र, और पवित्र बनकर.
कहीं ऐसे ही किसी मधुर आभास की
चमक तुम्हारी आँखों में भी तो नहीं?
हाँ, यदि सचमुच ऐसा है तो
यह मानना पड़ेगा कि
हमारी संवेदनाएं अभी जिंदा हैं.
हमारी कल्पनाओं में अभी चटख रंग बाकी हैं.
हमारे जिस्मों में जीवन की मीठी गर्मी की तपन
अभी शेष है.
और,
अविश्वास, अजनबीपन व अनैतिकता से भरे
इस बर्बर जंगल में रहते हुए भी,
हम अभी तक मनुष्य हैं.


5 - महानगर की धूप 

महानगरों के घरों में धूप नहीं आती,
दरवाज़े, खिड़कियाँ खुली हों
तब भी नहीं आती।
महानगरों में हर घर के हिस्से की
धूप रोके खड़ा है कोई दूसरा घर।
महानगरों में अकेले घूमती है धूप उन छतों पर
जिनके दरवाज़ों पर ताले लगे रहते हैं।
और महानगर की  तपती हुई ज़मीन पर भागते दौड़ते
जिस्म धूप के साये से भी बचते रहते हैं।
वे भुला देते हैं,
धूप का अस्तित्व, धूप की ऊर्जा, धूप का उजाला।
पर नहीं भूलती है धूप उन्हें,
ढूंढती है टुकड़ा टुकड़ा आकाश से
नीचे झांकते हुए।
और फिर एक दिन सीधे नसों  में
घुसती है धूप, विटामिन डी का
इंजेक्शन बन कर।

 

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