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हैप्पी की शादी (कहानी – सन्देश नायक) अंक-1

सन्देश नायक

जन्म तिथि – 01 जुलाई,  1985
शिक्षा – स्नातक (मनोविज्ञान)
रूचि – लेखन, अध्ययन, संगीत
पता – अयोध्या बस्ती, लहचूरा रोड
हरपालपुर, जिला-छतरपुर (म.प्र.)
ई-मेल – sandesh.nayak04@gmail.com
संपर्क – 8376874779
ब्लॉग – swarn-sandesh.blogspot.com

 

10 फरवरी को रिंका के छोटे भाई की शादी थी। जब से ये समाचार मिला पंडित जी का दिल बा़ग-बा़ग हो गया। काफी अरसे बाद अपने खास मित्रों से मिलने का सुनहरा अवसर जो आया था। वैसे तो पंडित जी के सभी मित्र फ़ोन द्वारा एक दूसरे के संपर्क में रहते थे और समय निकालकर कभी-कभी मिल भी लेते थे। लेकिन सबका एक साथ मिलना नहीं हो पाता था क्योंकि सब अलग-अलग जगहों से थे। हालाँकि कई बार इकठ्ठा मिलने का प्लान बनाया था लेकिन किसी न किसी के साथ कोई समस्या खड़ी हो जाती और प्लान शीतनिद्रा में चला जाता। शादी-ब्याह जैसे सामाजिक आयोजनों का ये सबसे सुखद पहलू है कि एक ही जगह आप की अपने ़करीबी लोगों से मुला़कात हो जाती है। मिलने की संभावना इसलिए भी अधिक होती है क्योंकि लोग ऐसे अवसर पर समय निकाल ही लेते हैं। कुछ लोग प्रेमवश आते हैं कि अपने करीबी की ख़ुशी में शामिल हो सकें, कुछ संकोच में ये सोचकर आ जाते हैं कि नहीं गये तो कहीं सामने वाला खुन्नस न खा जाये। कुछ अपना व्यवहार चुकाने आ जाते हैं कि ये हमारे यहाँ आये थे तो अब इनके यहाँ उपस्थिति दर्ज कराना आवश्यक है। कुछ का उद्देश्य होता है मनोरंजन, सैर-सपाटा। बहरहाल मन की भावना जो भी हो लोग आ जाते हैं।
तो पंडित जी ने अपने अभिन्न मित्रों जैन साब और कांचा को फ़ोन किया और रिंका के यहाँ जाने की रूप-रेखा पर विचार विमर्श होने लगा। गहन मंत्रणा के बाद तय हुआ कि ९ तारीख को शाम तक रिंका के यहाँ पहुँच जाते हैं और 11 की शाम को वहां से वापसी कर लेंगे। आगे बढ़ने से पहले मैं आप सबको इन मित्रों से परिचित करा दूँ।
सबसे पहले रिंका से ही शुरू करता हूँ। आपका पूरा नाम था दलबीर सिंह रंधावा। रिंका आपके घर का नाम था। आप पंजाबी थे। 6 फुट के लंबे तगड़े जवान। आपकी हथेलियाँ बड़ी चौड़ी थीं। मित्र लोग अक्सर म़जाक में कहते कि लोगों को मिट्टी खोदने के लिए फावड़े की ज़रूरत पड़ती है, लेकिन रिंका तो अपने हाथों से ही मिट्टी खोद लेता होगा। रिंका अधिकतर जूड़ा बांधता था, कभी-कभी पगड़ी। इतवार को रिंका का बाल धोना मित्रों के लिए कुतूहल का विषय था। पहले तो आप करीब आधा शीशी सरसों के तेल से अपने बालों की चम्पी करते, फिर मग में शैम्पू के 3-4 शैसे घोलकर उस से बाल धुलते। सब को बड़ी हंसी आती क्योंकि बाकी सबका बाल धुलना तो आधे शैसे में ही हो जाता था। आपके घने बालों की लंबाई आस-पास की लड़कियों के लिए किसी रहस्य से कम नहीं थी। जब रिंका बाल धुलकर सुखाने के लिए बालकनी में खड़ा होता तो लड़कियों की प्रतिक्रिया देखने लायक होती। कुछ की नज़रों में सराहना के भाव रहते, तो कुछ के मन में जलन के। कुछ लड़कियां तो कुंठाग्रस्त रहतीं, कि हम तो तरह-तरह के प्रसाधन इस्तेमाल करके भी अपने बालों को टूटने-झड़ने से नहीं बचा पाते और इसके बाल देखो जैसे हमें चिढ़ाने के लिए ही खोल के खड़ा हो जाता है। आपकी सबसे खास बात थी आपका व्यवहार। आपको जैसे लोगों की समझ थी। इन्हें पता होता था कि किस से कैसी बात करनी है। इनका व्यवहार बच्चों से लेकर बूढ़ों तक था और सब उसकी व्यवहार कुशलता के मुरीद थे। आप ने होमियोपैथी की डिग्री की हुई थी और अब अपना क्लीनिक खोलने के विचार में थे। रिंका चूँकि सरदार था अतः सिगरेट तम्बाकू का सेवन नहीं करता था। हाँ, दारू का शौ़कीन था, लेकिन केवल मित्रों के साथ कभी-कभी।
दूसरे मित्र थे अखिल जैन। इन्हें सब प्यार से जैन साब कहते थे। औसत लंबाई, सामान्य शरीर। नज़र का चश्मा लगता था। जैन साब के पास इतनी डिग्री, डिप्लोमा और सर्टिफिकेट थे कि सब म़जाक में कहते- ‘जैन साब अब बस भी करो, कहीं शिक्षा-मंत्री शर्मिंदा होकर इस्ती़फा न दे दें। भई, उन्हें भी आश्चर्य होता होगा कि इतनी यूनिवर्सिटी तो मेरे अंडर में भी नहीं हैं जितनी ये डिग्रियां लेके बैठा है’’ और सब के साथ जैन साब भी ठहाका मारकर हंस पड़ते । मुख्य रूप से इन्होंने होमियोपैथी की डिग्री की हुई थी और अब अपने गांव में अपना क्लीनिक चला रहे थे। जैन साब का स्वभाव हम सब में सबसे सरल और सच्चा था। ये कहना गलत न होगा कि जैन साब अपने मित्रों के आदर्श थे। अब आदर्श का मतलब ये नहीं कि इनमें कोई व्यसन नहीं था। जैन साब भी दारू के शौ़कीन थे और वो भी केवल खास मित्रों के साथ। सामान्यता तो जैन साब सिगरेट नहीं पीते थे, लेकिन दारू पीते समय सिगरेट की उपस्थिति आपके लिए अनिवार्य थी। जैन साब का व्यवहार सब के साथ स्नेहमय रहता। जल्दी गुस्सा न आता था, लेकिन जब आ जाता तो अपना आपा खो बैठते। और आपको गुस्सा आता था अनुचित बातों पर, लोगों के गलत व्यवहार पर और सामाजिक अव्यवस्थाओं पर। कुछ लोग इन्हें सनकी मानते थे और यही अफवाह जैन साब के लिए फ़िल्टर का काम करती। इसी अफवाह का ही प्रताप था कि चालू किस्मत के लोग आपसे दूर ही रहते। उन्हें पता रहता कि यहाँ चिकनी-चुपड़ी बातों से दाल नहीं गलने वाली, उल्टा डर ही रहता कि कहीं जैन साब सनक गए तो लेने के देने न पड़ जाएं। यहाँ तक कि मित्रगण भी सोच-समझकर म़जाक करते। जैन साब के जीवन में दिखावे और बनावटीपन के लिए कोई जगह नहीं थी। जो बात मन में होती, वही जबान पर। आप धार्मिक व्यक्ति थे और धर्म के कार्याेंं में पूरे समर्पण से भाग लेते। आपको नई-नई जगहों पर घूमने का बहुत शौ़क था और अब तक देश के आधे भाग में आप भ्रमण कर चुके थे।
अगले मित्र थे प्रमेश सोनी। उम्मी इनके घर का नाम था और मित्र इन्हेंं कांचा के नाम से संबोधित करते। स्वभाव से सज्जन और चालाक। ‘सज्जन’ मित्रों के लिए और ‘चालाक’ दुनिया के लिए। इन्होने एम.कॉम. किया हुआ था और अब तक 6-7 नौकरियां बदल चुके थे। पहले पहल आप एक हीरा कंपनी में हीरे तराशने का काम करते रहे। ये कला पुश्तैनी थी और आप इसमें अपने पिता की तरह निपुण। लेकिन ज्यादा समय तक इसमें मन न लगा तो एक अख़बार में इन्होंने कुछ दिन पत्रकार के रूप में अपना अमूल्य योगदान दिया और कुछ ही समय में अख़बार अज्ञात कारणों से बंद हो गया। फिर कुछ समय एक संस्था में अकाउंटेंट के पद की गरिमा बढ़ाई। तदुपरांत अपने गाँव के विद्यालय में शिक्षक के तौर पर विद्यार्थियों के भविष्य में तब्दीलियाँ कीं। कुछ समय इन्होंने एक टेलिकॉम कंपनी में सिम विक्रेता के तौर पर भी अपनी सेवाएं दीं और अब वर्तमान में एक बैंक में अस्थाई रूप से कार्यरत थे। नौकरी इनके लिए रिमोट से चैनल बदलने से अधिक मश़व़äकत का काम न था। जब तक मन लगता नौकरी करते और जब जी उबने लगता तो दूसरी पकड़ लेते। लेकिन तारीफ की बात थी आपकी ़िकस्मत और प्रतिभा… कि कभी नौकरी मिलने में कोई परेशानी नहीं हुई। आप बहुत अच्छे तैराक थे। इनकी विशेषता थी ‘पानी में पद्मासन’। आप पानी में पद्मासन लगाकर लेट जाते और घंटों इस अवस्था में तैरते रहते। इन्हें पानी से बड़ा मोह था। जहाँ कोई नदी,तालाब या कुआँ देखते बस कपड़े उतारकर कूद पड़ते। आप भी दारू के शा़ैकीन थे लेकिन बहुत कम मात्रा में पीते, ताकि नशे का मजा बना रहे। सिगरेट से कोई मोह न था और गुटखे के बिना गुजर न होता। जेब में गुटखे की एक लड़ी हमेशा इनके साथ चलती जो इनके हर कार्य में स्टार्टर का काम करती।
अब रह गए पंडित जी। इनका मूल नाम सरस अरजरिया था लेकिन दोस्त प्यार से पंडित जी बुलाते। इनका स्वभाव पानी की तरह थोड़ा राजनीतिक था। जिससे मिलते उसके जैसे हो जाते। आप की मित्रता सज्जनों से भी थी और उचक्के ़िकस्म के लोगों से भी। नशे के मामले में पंडित जी कोई भेद-भाव न करते। सारे व्यसनों को बराबरी का अधिकार देते थे। कभी अराजक तत्वों के साथ दारू की महफ़िल जमती, तो कभी साधू संतों के साथ गांजा भी लगा आते। गुटखा, सिगरेट, बीड़ी जो भी उपलब्ध होती बड़े प्रेम से आप उसका सेवन करते। इनकी कमजोरी थी- खाना। जहाँ भी जाते इन्हें अपने खाने की चिंता पहले रहती। शादी जैसे आयोजनों पर आप मिठाई से अपना बैर निकालते। एकाध किलो मिठाई से इनका मुँह मीठा होता और अगर गलती से रसगुल्ले हों तो 30-40 तो आप यूँ ही गपक जाते। पंडित जी भोजन प्रेमी थे और 4-5 लोगों का खाना अकेले खाते, बिना डकार लिए। कभी-कभी इनके भोजन-प्रेम की कीमत मित्रों को खाली पेट रह कर चुकानी पड़ती। मित्रों के बीच पंडित जी सबको जोड़े रखने का काम करते। साहित्य और सिनेमा से आपको बेहद प्यार था और आप लेखन भी करते थे। अब तक न जाने कितनी ही पुस्तकें और फ़िल्में आपकी नज़रों के सामने से निकल चुकीं थीं। आप स्नातक थे और अब लेखक बनने के सपने देख रहे थे।
जैसे-जैसे शादी का समय ऩजदीक आ रहा था, वैसे-वैसे इन सब मित्रों की अधीरता बढ़ती जा रही थी। आखिरकार 9 तारी़ख आ गई। जैन साब और कांचा, दोनों दोपहर तक पंडित जी के घर आ गए। अब यहाँ से ट्रेन का सफ़र था। शाम को करीब 7 बजे तीनों लोग डबरा पहुंचे। अँधेरा होने लगा था और ठण्ड भी बढ़ने लगी थी। स्टेशन से बाहर आने के बाद सबसे पहला काम जो इन लोगों ने किया, वो था गरमागरम चाय के साथ सिगरेट का आनंद। रिंका का घर, जिसे उसकी भाषा में डेरा कहा जाता था, यहाँ से  12-15 कि.मी. दूर था। रिंका चूँकि शादी की तैयारियों में व्यस्त था इसलिए किसी ने उसे बुलाने की ज़रूरत न समझी। एक ऑटो तय किया गया। चलने से पहले सब ने अपने-अपने स्टार्टर खरीद लिए। 1 सिगरेट की डिब्बी,  15-20 गुटखे और  10 सनन-मुनक्का की गोलियां। मित्रों से लंबे अरसे बाद का मिलन था और अपने-अपने स्टार्टरों के बिना माहौल अधूरा रहता, इसलिए ये ला़िजमी था। हालाँकि आवश्यकता तो इस से अधिक की पड़नी थी क्योंकि सभी को इनकी ज़रूरत थी और उस हिसाब से इतनी मात्रा पर्याप्त न थी। लेकिन सोचा कि सामग्री समाप्त होने पर वहीं आस-पास से ़खरीद लेंगे।
ऑटो में बैठने से पहले जैन साब ने एक सिगरेट सुलगा ली। पंडित जी और कांचा ने 1-1 गुटखा दबा लिया और सब चल पड़े उस रोमांच की तरफ जिसके बारे में कल्पना करते हुए आये थे। इन में से कोई भी अभी तक किसी पंजाबी परिवार से नहीं मिला था, न ही उनकी किसी शादी में सम्मिलित हुआ था। बस कुछ सुनी सुनाई बातें थीं उनके रहन-सहन के बारे में, उनके रीति-रिवाजों के संबंध में। तो एक नयी संस्कृति को जानने-समझने की जिज्ञासा सब को रोमांचित किये हुए थी। रात का बढ़ता अँधेरा, ठंडी हवा, ऑटो में चल रहे रोमांटिक गाने और दोस्तों का साथ…एक जादू सा था।

करीब आधे पौन घंटे बाद ऊबड़-खाबड़ रास्तों को पार करते हुए ऑटो अपनी मंज़िल पर पहुंचा। सबने अपना सामान उतारा, ऑटो का किराया अदा किया और तब चारों तरफ इत्मीनान से नि़गाह डाली। चारों तरफ बस अँधेरे में लिपटे हुए लहलहाते खेत-खलिहान थे और अँधेरे से अपनी छरहरी काया को ढंकने की कोशिश करतीं हुर्इं, ल़जीली पगडंडियाँ। कुछ ही दूरी पर जगमगाती शामियाने की रौशनी दिख रही थी। दिलों तक महसूस होती डी.जे. की धमक और तेज़ बजते हुए पंजाबी गाने रिंका के घर के रूप में अपना परिचय देते प्रतीत हो रहे थे। घर के बाहर पहुंचकर जैन साब ने रिंका को फ़ोन किया ताकि अगवानी के लिए कोई तो हाजिर हो। फ़ोन काटने से पहले ही रिंका मुस्कुराता हुआ सामने आ गया। अपने मित्रों के आने की ख़ुशी रिंका के चेहरे पर गर्व के साथ बिराजमान थी। अपनी किसी ख़ुशी में जब मित्र सम्मिलित हो जाएं तो आनंद असीमित हो जाता है और दुःख नगण्य।
रिंका सबको अन्दर ले गया। इन सब के लिए एक अलग कमरे का इंतजाम कर दिया गया था। रिंका ने कहा- ‘भाई जल्दी मुँह-हाथ धुल लो, फ्रेश हो लो, कपड़े बदलने हों तो कपड़े बदल लो और चलो क्योंकि खाने का आ़िखरी दौर चल रहा है। कभी भी ख़त्म हो जायेगा फिर वही गिने-चुने आइटम ही बचेंगे।’ ‘खाने का अ़िखरी दौर चल रहा है’, इस वाक्य से पंडित जी के कान खड़े हो गए। बोले ‘भाई- हम सब तो तैयार ही हैं, चलो कहाँ चलना है?’ पंडित जी की बात से सब सहमत थे इसलिए बिना देर किये रिंका के साथ हो लिए। रिंका सबको साथ लेकर पंडाल के अन्दर ले चला।
आज रिंका के इंग्लैंड वाले भैया की शादी का रिसेप्शन चल रहा था। दूल्हा-दुल्हन स्टेज पे बैठे थे। स्टेज की दाहिनी ओर किनारे से डी.जे. लगा हुआ था जहाँ कुछ महिलाएं, पुरुष, बच्चे जोश में नाच रहे थे। स्टेज के सामने लोगों के लिए कुर्सियां लगीं हुर्इं थीं। ये सब तो सामान्य दृश्य थे, जो कांचा लोग कईयों शादियों में देख चुके थे, इसमें कुछ नया नहीं था। लेकिन जब इनकी नि़गाह स्टेज के बाएं तरफ गई तो जैसे ये सब चौंक पड़े। ये दृश्य ही कुछ ऐसा था। यहाँ बा़कायदा कतार से टेबल-कुर्सियां लगीं हुर्इं थीं, जैसे किसी रेस्टोरेंट में रहतीं हैं। उन पर कुछ बुजुर्ग, कुछ नौजवान बे़िफक्री से बैठे हुए थे- दारू-बियर की बोतलों और चखने के साथ ! इस से पहले इन सब ने किसी शादी में ऐसा विहंगम दृश्य नहीं देखा था। ऐसा नहीं कि इनके यहाँ की शादियों में लोग दारू नहीं पीते थे। बिलकुल पीते थे लेकिन छुप- छुपाके, चोरी से।
इन लोगों के समाज में दारू बड़ी बदनामी वाली वस्तु समझी जाती थी और पीने वाले निकृष्ट। इसलिए ये काम बड़ी सफाई और सावधानी से किया जाता था। दारू पीने वालीं 3-4 टोलियों का सबसे सक्रिय सदस्य दूल्हे से दारू के पैसे की व्यवस्था करता था। इस मामले में दूल्हे को इतनी सहूलियत दे दी जाती थी कि बस तुम्हें पैसे देने हैं बाकी दारू तो हम ले आयेंगे कहीं से भी। दारू का इंतजाम होने के बाद, ये सारे सदस्य सामान का बंटवारा करके 3-3, 4-4 के समूह में बंट जाते और जनवासे के पास ही अपनी सुविधानुसार जगह ढूँढ़ लेते। कुछ सज्जन किसी गाड़ी के पीछे ओट में अपने पैग बनाते, कुछ सज्जन अँधेरी गलियों में अपना मय ़खाना बना लेते… तो कुछ सड़क के किनारे झाड़ियों में अपनी महफ़िल सजा लेते। इन सब ने तो हमेशा ही दारू को बड़े-बुजुर्गाेंं के सामने किसी बहू की तरह डरा सहमा घूँघट में ही देखा था, लेकिन यहाँ तो दारू किसी आधुनिक वधु के समान घूँघट का त्याग कर बेबाकी से मु़खातिब थी।
पंडाल के पीछे घर से लगी हुई खाली जगह थी जहाँ रिंका इन लोगों को ले आया। यहाँ एक सफारी खड़ी हुई थी। रिंका ने डिक्की खोली और सब के लिए बियर निकालने लगा। पूरी डिक्की बियर और दारू की बोतलों से भरी हुई थी। सब के चेहरे खिल उठे। वैसे तो सब कम ही पीते थे लेकिन जब  जरुरत से ज्यादा दारू हो और वो भी फ्री में, तो कौन रुकने वाला था? सब ऐसे टूट पड़े जैसे रेगिस्तान में भटकता प्यासा राही पानी मिलने पर टूट पड़ता होगा। कांचा पंडाल के अन्दर जाकर 3-4 प्लेट में मूंगफली, सलाद और नमकीन ले आया। बोतलें खुलीं, चियर्स हुआ और जाम होंठों से मुला़कात करने लगे। जब सब का कोटा पूरा हो गया, तो भूख के आमंत्रण पर खाने का लुत्फ़ लिया जाने लगा। रात काफी हो गई थी। अब इक्का दुक्का लोग ही बाहर पंडाल में दिख रहे थे। रिंका से कहकर जैन साब लोगों ने यहीं पंडाल में ही चारपाईयाँ लगवा लीं। सोचा यहाँ स्वतंत्रता से बातें करेंगे ,हंसी ठिठोली करते पड़े रहेंगे। देर रात तक बातों का सिलसिला चलता रहा। 2 चारपाइयों पे ये 4 लोग रजाइयों में दुबके एक-दूसरे के सुख-दुःख साझा करते कब सो गए पता ही नहीं चला।
सुबह सवेरे आस पास से आती आवाजों से पंडित जी की नींद टूटी। जब रजाई से सर बाहर निकाल के देखा तो ऊपर उजला आसमान इन्हें ताक रहा था। पंडित जी चौंक गए ! रात में तो ऊपर पंडाल था और सुबह आसमान? मन में खटका हुआ कि दारू के नशे में कहीं और तो नहीं आ गए? लेकिन जब आस-पास नज़र डाली तो आश्वस्त हुए कि जगह वही है, बस पंडाल ही गायब है। तभी देखते हैं कि जिस चारपाई पर जैन साब और कांचा सोये हुए थे, उस पर एक भीमकाय कुत्ता इनकी रजाई के ऊपर बैठा हुआ है। और ताज़्जुब की बात कि जैन साब और कांचा अभी भी इस सबसे बे़खबर रजाई के अन्दर सो रहे थे। पंडित जी ने आवा़ज देकर इनको जगाया। जैन साब और कांचा ने जब कुनमुनाते हुए रजाई से बाहर सर निकाला, तो सामने अपने ऊपर बैठे हुए उस भीमकाय कुत्ते की मौजूदगी ने इनके नशे और नींद को मीलों दूर खदेड़ दिया। अनजान कुत्तों को पुचकारने में भी खतरा होता है, सो किसी ने उस कुत्ते से गु़फ्तगू करने की कोशिश न की। इसी समय रिंका आप लोगों की तरफ आता दिखाई दिया। ये लोग उस से इस कुत्ते के विषय में कुछ कहते उस से पहले ही ये महाशय जाकर रिंका के पैरों का रसास्वादन करने लगे। अब जाकर जैन साब और कांचा के जी में जी आया। जैन साब रिंका से बोले- ‘‘भाई क्या है ये? कौन सी दुश्मनी निकाल रहे हो जो सुबह-सुबह ऐसे वीभत्स दृश्य दिखाने लगे।’’ ‘वीभत्स दृश्य’ इस उपमा पर सबकी हंसी छूट गई।
रिंका ने सब के लिए यहीं चाय का बंदोबस्त कर दिया और कहा कि भाई तैयार होना शुरू करो… बारात जल्दी निकलेगी। अभी तो ढंग से ये लोग चैतन्य भी न हो पाए थे कि चलने की बात होने लगी। नित्य कर्माेंं से निवृत्त होने के लिए घर के अन्दर के शौचालयों का उपयोग करने में सब को संकोच हो रहा था।
जैन साब बोले- इतनी चहल-पहल के बीच कहाँ हो पायेगा ये सब?
कांचा-हाँ भाई वहां मन ही नहीं लगेगा। एक खटका बना रहेगा कि कोई अब आया की तब आया।
कोई भी घर के अन्दर बने शौचालयों का इस्तेमाल करने में सहज नहीं था। अतः सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि मैदानों का रु़ख करते हैं। शौच के लिए बाहर खुले मैदानों में जाना इनके लिए कोई अटपटी बात न थी। ये सब इन परिस्थितियों से गुजरे थे क्योंकि ग्रामीण पृष्ठभूमि से ताल्लु़क था और वहां ये आम बात होती थी।
पंडित जी बोले – हाँ भाई चलो अब देर न करो एक ़जमाना हो गया खुले आसमान के नीचे बैठे हुए। रिंका सबकी अगवानी करता हुआ चल दिया। रात के अँधेरे में इन लोगों को इस क्षेत्र का मुआयना करने का अवसर ही न मिला था। अब उजाले में ये अधूरा काम पूरा होने लगा। चारों तरफ हरी-भरी लहलहाती फसल खड़ी थी और मेंढ़ पर दोनों ओर बहता लबालब पानी। रिंका ने बताया आज़ादी के समय उसके दादाजी यहाँ आये थे। तब उनके पास कुछ भी नहीं था। अपनी मेहनत और लगन से ये सारी ़जमीन खड़ी की। रिंका के पिताजी लोग ३ भाई थे और तीनों का परिवार साथ-साथ रहता था। जिसकी पढ़ने की इच्छा हुई उसे बाहर पढ़ने भेजा गया, जिसका मन पढ़ाई में नहीं लगता वो खेती में सहायक हो जाता।
करीब १ घंटे में सब लोग नित्य कर्माेंं से निवृत्त हो कर वापस लौट आये। इनमें से किसी ने भी नहाया न था। एक तो ठण्ड और ऊपर से खुले में नहाकर अपने अंग प्रदर्शन का संकोच। बस वहीं हैंडपंप पर सबने अपने चेहरे और बाल धो लिए ,क्यूंकि इन्हीं की चमक आपकी स्वच्छता को प्रदर्शित करती है। आकर कपड़े बदले, नाश्ता किया। बारात ले जाने के लिए गाड़ियाँ लग गई थीं। रिंका के सब दोस्तों के लिए 1 गाड़ी अलग से थी। सब अपनी-अपनी सुविधानुसार जाकर अपनी सीटों पर बैठ गए और बारात रवाना हो चली। गुटखे-सिगरेट तो चूँकि रात में ही समाप्त हो गए थे अतः आप सब सुबह से ही अपने स्टार्टरों के बिना बड़े बैचैन थे। यहाँ तो जहाँ तक नज़र जाती थी बस खेत ही खेत दिखाई देते थे। किसी दुकान का तो नामोनिशान न था कि कुछ इंतजाम हो पाता। इसलिए जब सब मेन रोड पर आ गए तब १ गुमटी के सामने गाड़ी रुकवाई गई, ताकि सब अपने-अपने स्टार्टर ले सकें। इनकी गाड़ी सबसे पीछे थी इसलिए किसी को कोई खबर भी न होनी थी। कांचा ने उतरकर सारी सामग्री ली और फिर पूरे जोश से आप सब अपनी सामग्रियों का सेवन करते हुए चल दिए। रास्ते भर गाने और चुटकुलों की महफ़िल सजी रही।
2 घंटे की यात्रा के बाद हैप्पी की ससुराल आ गई। इस यात्रा के दौरान आप सब फिर से अपनी सामग्री से रिक्त हो चुके थे। गाड़ियाँ एक तरफ खड़ी कर दी गयीं और ढोल नगाड़ों के साथ बारात लड़की के घर की ओर बढ़ चली। द्वार पर स्वागत सत्कार के बाद सब पंडाल के अंदर प्रवेश करने लगे। इनसे कहा गया कि सबसे पहले कुछ खा-पी लो, फिर बा़की रस्म रिवाज होंगें। दोपहर हो गई थी, भूख भी लग आई थी तो सबने बिना कोई सवाल किये भोजन स्थल में प्रवेश किया। तरह तरह के आइटम थे, जैसे प्रायः शादियों में रहते हैं- छोले भटूरे, डोसा, इडली, चाउमीन, चाट-फुलकी से लेकर जूस, आइसक्रीम इत्यादि। सबने छक कर भोजन किया जैसे दोबारा पता नहीं कब मिलेगा? भोजन करके जब आप सब बाहर आये तब रिंका बोला ‘भाई नाश्ता कर लिया न?’’
जैन साब- हाँ भाई डट के भोजन हो गए।
रिंका -अरे तो फिर खाना कैसे खाओगे, जब इतना नाश्ता कर लिया?
कांचा-भाई ये खाना ही तो था!
रिंका – अरे ये तो बस नाश्ता था यार, खाना अभी 2 घंटे बाद होगा।
जैन साब- क्या बात करते हो भाई? हम सबने तो यही सोच कर कि ये खाना है, धांस के खा लिया।
रिंका हंसने लगा। बोला- भाई बस अभी फेरे होने वाले हैं, फिर थोड़े से कार्यक्रम के बाद खाना होगा और तुम सब की पीने की भी तो व्यवस्था है ! तब खाना खाना।
अब सब को अफ़सोस होने लगा कि इतना खा चुके हैं तो पियेंगे कैसे? और वो तो नितांत आवश्यक है।
कांचा-कोई बात नहीं… जब तक हम खाना पचा लेंगे, अभी काफी समय है।
लगभग सबका नाश्ता हो चुका था, तो दूल्हा-दुल्हन को लेकर सब गुरूद्वारे की ओर फेरों के लिए चल दिए। आप लोग पीछे-पीछे सबसे आ़िखर में चल रहे थे, ताकि मौ़का देख कर गायब हो सकें। अब आा़fखर इस कार्यक्रम में इनकी उपस्थिति अनिवार्य भी नहीं थी। गुरूद्वारे तक तो आप सब बारात के साथ ही रहे लेकिन जैसे ही सारे लोग गुरूद्वारे के अन्दर गए, ये लोग वहां से खिसक लिए।
जैन साब- तो भाइयों अब क्या प्लान है?
कांचा- सबसे पहले तो कोई दुकान ढूंढ़ते हैं जहाँ अपनी सामग्री मिल सके।
पंडित जी- हाँ भाई बिलकुल ठीक, पहले अपनी व्यवस्था करते हैं… फिर पेट खाली करने की जगह ढूँढेंगे।
इस क्षेत्र का हाल भी रिंका के क्षेत्र जैसा ही था। दूर-दूर तक बस खेत खलिहान और आबादी के नाम पर गिने चुने घर। रास्ते से गुजरते 1-2 लोगों से जब पूछा कि यहाँ आस-पास कोई सिगरेट-गुटखे की दुकान है क्या? तो पता चला कि सिगरेट गुटखे की तो छोड़ो, कोई दुकान ही नहीं है। अलबत्ता इन्हें पास के गाँव का रास्ता अवश्य बता दिया गया कि वहां जाकर देख लो शायद कुछ मिल जाये। ये लोग बताये हुए रास्ते पर खेतों के किनारे-किनारे मेंढ़ से होते हुए चल दिए।
करीब पौना घंटे बाद इस गाँव में पहुंचे। ये गाँव कोई 2 किलोमीटर की दूरी पर था। यहाँ भी कुछ गिने चुने घर ही बने हुए थे। काफी देर भटकने और पूछताछ के बाद पता चला कि हाँ एक दुकान है तो, लेकिन आपका सामान मिलेगा या नहीं ये नहीं कह सकते।
कांचा बोला- भाई इन लोगों की बस्तियां तो नशा-मुक्ति केंद्र हैं। किसी नशेड़ी को यहाँ लाकर छोड़ दो…अपने आप उसका नशा छूट जायेगा, दूर-दूर तक नशे की कोई व्यवस्था ही नहीं है। आदमी जायेगा कहाँ इन खेतों खलियानों में?
कांचा की इस बात पर कहकहे लगाते सब दुकान की ओर चल दिए। ये एक
बहुत ही छोटी सी दुकान थी- शुरू होते ही ख़त्म। पंडित जी ने दुकान वाले से बड़ी आशा भरे स्वर में कहा- भैया गुटखा सिगरेट मिल जायेगा क्या?
दुकानवाला- सिगरेट तो है, लेकिन गुटखा नहीं।
कांचा को सिगरेट से उतना सरोकार न था जितना गुटखे से। बड़ी अधीरता से बोला- तम्बाकू तो रखते होगे?
दुकानवाला- हाँ-हाँ तम्बाकू तो है।
अब कांचा को थोड़ी राहत मिली कि चलो गुटखा न सही तम्बाकू से ही काम चला लेंगे।
जैन साब- तो भैया एक पैकेट गोल्ड फ्लैक सिगरेट और तम्बाकू चूना दे दो।
दुकानवाले ने सिगरेट की डिब्बी निकाली और बताया कि दो ही सिगरेट हैं, वो भी फोर स्क्वायर ब्रांड कीं।
जैन साब- हद हो गई भाई ! बस दो ही हैं और कोई दूसरी डिब्बी नहीं है?
दुकानवाला- नहीं भैया जो भी है यही है।
पंडित जी – ठीक है भैया यही दे दो और पानी भी पिला दो।
तो दो फोर स्क्वायर और एक तम्बाकू-चूने की पुड़िया ली, पानी पिया और वापस शादी में शामिल होने चल दिए। इन लोगों को उधर से निकले हुए काफी वक़्त भी हो रहा था इसलिए समय पर पहुंचना भी जरुरी था, ताकि पीने के दौर से वंचित न हो पायें। खेतों से वापस गु़जरते समय ही पेट खाली करने की जरुरत महसूस होने लगी। एक तो खाना भी पच चुका था क्यूंकि खाना खाने के बाद से काफी चलना हो गया था और फिर पीने के लिए पेट खाली करना भी ला़िजमी था।
मेंढ़ के किनारे क्यारियों में बहते पानी की ओर इशारा करते कांचा बोला- यहीं खेतों में फुर्सत हो लेते हैं। पानी की भी व्यवस्था है और यहाँ किसी की टेंशन भी नहीं लगती। जैन साब ने पानी पर नज़र डाली और बोले- यार पानी गंदा सा है, कचड़ा सा भी है। यहाँ मजा नहीं आएगा, कहीं और देखते हैं। सबने जैन साब की बात का अनुमोदन किया और आगे बढ़ चले। गुरूद्वारे पहुँच कर पता चला कि सारे लोग तो फेरे करा के वापस घर चले गए, जहाँ शादी चल रही थी। उस वक़्त यहाँ बस एक बूढ़े दादा थे जो शायद यहाँ का रख रखाव करते थे, उन्होंने ही ये जानकारी दी। गुरूद्वारे के बाहर ही प्रांगण में जैन साब और कांचा टहलते हुए आगे की रणनीति पर विचार कर रहे थे कि तभी पंडित जी कुटिल मुस्कान बिखेरते हुए इनकी तरफ आए।
पंडित जी- यार यहाँ शौचालय बना है, क्यूँ न यहीं फुरसत हो लें?
जैन साब- अरे यहाँ कोई करने देगा क्या?
कांचा- भाई अगर शौचालय बना है तो इस्तेमाल के लिए ही होगा न?
पंडित जी- इन बूढ़े दादा से पूछ लेते है?
जैन साब- नहीं किसी से पूछो मत। क्यूंकि अभी तो चोरी छिपे पुâरसत होने का अवसर है भी, लेकिन अगर किसी कारण वश दादा ने मना कर दिया तो ये रास्ता भी नहीं बचेगा।
तय हुआ कि एक आदमी चुपके से फुरसत हो ले, जब तक बाकी सब दादा को बातों में लगाये रखते हैं। इस तरह बारी-बारी से सब फुरसत हो लो। जैन साब और कांचा दादा से बातें करने लगे और पंडित जी फुरसत होने चले गए। इस तरह एक एक कर सभी ने दीर्घ शंका से मुक्ति पा ली। दादा को अपनी ज़िन्दगी के अनुभव बताने और इतने स्नेहमय व्यवहार के लिए धन्यवाद देकर आप सब शादी वाली जगह पहुँच गए।
रिंका इन लोगों को बहुत देर से ढूंढ रहा था। उसने इन लोगों के पीने-खाने का इंतजाम करके रखा था और बस इनका ही इंतज़ार कर रहा था। बोला- ‘‘भाई कहाँ गायब हो गए थे? यहाँ सब इंतजाम कर रखा है तुम लोगों का।’’ जैन साब ने सारी बात बताई और कहा कि बस पीने से पहले की ही तैयारियों में लगे थे। अब तैयार हैं। रिंका ने इशारे से एक लड़के को बुलाया, उसके कान में कुछ कहा और वो लड़का जी कह के चला गया। रिंका बोला- ये गप्पी है… हैप्पी का साला। अब यही तुम लोगों को देखेगा। जो भी चाहिए हो बेझिझक मँगवा लेना, मैं अन्दर हो के आता हूँ। इतना बोल के रिंका चला गया और कुछ ही देर में गप्पी 2-3 लड़कों के साथ इनके सामने हाजिर हो गया। कांचा ने रिंका से कह दिया था कि पीने की व्यवस्था पंडाल के बाहर ही कहीं करा देना ताकि बड़े बूढ़ों का सामना भी न हो और सब यहाँ आराम से बैठे पीते भी रहें। तो पंडाल से बाहर ही जहाँ प्रवेश द्वार था, उसी के किनारे से थोड़ी दूर, टेबल कुर्सियां लगा दीं गई। इन्हें बैठने के लिए बोला गया और दारू की बोतलें चखने के साथ टेबल पर जमा दी गर्इं। सोडा और कोल्ड ड्रिंक्स भी रखी हुई थीं। जिसको जैसा पीना पसंद हो, वैसे पिए। यहाँ दो वेटर इनकी सेवा में लगा दिए गए ताकि किसी चीज़ की कोई कमी न होने पाए।
जीवन में पहली बार ऐसा हुआ था कि ये सब इतने खुले में लोगों की आवक-जावक के बीच बैठे, दारू पी रहे थे और कोई इन्हें आँखे फाड़ के देखता हुआ नाक भौं नहीं सिकोड़ रहा था। आश्चर्य की बात तो ये थी कि यहाँ से गु़जरने वाले लोग इन पर ध्यान भी नहीं दे रहे थे। उन सब के लिए ये बड़ी सामान्य सी बात थी। अगर ऐसी स्थिति में इनके यहाँ किसी परिचित ने इन्हें देख लिया होता, तो अब तक इन्हें दारुखोर की उपाधि प्रदान कर पूरे इलाके में इनका यशोगान हो जाता और घरवाले हाथ में चप्पल-डंडे लेकर इनकी खोज में निकल पड़े होते।
अंदर खाना चल रहा था और बाहर इनकी दारू। समय की कमी को देखते हुए सबने आख़िरी कुछ पेग जल्दी-जल्दी लगाये और खाने के आख़िरी दौर में शामिल हो गए। शाम हो गई थी और रात ने अपने पर फ़ैलाने शुरू कर दिए थे। विदा हुई और सब अपनी अपनी गाड़ियों में वापसी के लिए जा बैठे। अँधेरे के साथ-साथ बारात भी अपने घर की ओर बढ़ने लगी। जैन साब, कांचा और पंडित जी पर अब नशे की खुमारी थी। खिड़कियों से आती ठंडी हवा इनके नशे को सहला रही थी।
अगले दिन तीनों मित्र रिंका से विदा लेकर अपने घर की ओर रवाना हुए। रिंका के यहाँ आना इनके जीवन का एक अनूठा अनुभव था। एक नई संस्कृति से परिचित होने का अवसर मिला। उनकी सादगी और दरियादिली ने मन मोह लिया था। यहाँ परिवार अब भी संयुक्त थे जो आजकल बहुत कम देखने को मिलते हैं। महिलाओं के लिए पहनावे और परदे की कोई बंदिशें नहीं थीं। सब एक दूसरे से खुल के बात करते, बिना किसी मर्यादा को भंग किये। यहाँ रूढ़िवादिता के लिए स्थान कम था। कड़ी मेहनत और जीवन के प्रति अल्हड़ रवैया इनके स्वभाव में था। जैन साब, कांचा और पंडित जी एक दूसरे को मुस्कुरा के देख रहे थे और ट्रेन इनकी मंजिल की ओर बढ़ी चली जा रही थी।

2 thoughts on “हैप्पी की शादी (कहानी – सन्देश नायक) अंक-1

  1. अनिल कुमार सोनी August 27, 2016 at 12:30 am

    अति उत्तम

  2. Very good

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