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पांच ग़ज़लें – रमा वर्मा – अंक 2

 

रमा वर्मा
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1.

कही बात से हम मुकरते नहीं हैं 
कभी कर्म करने से डरते नहीं हैं 

पड़ें स्वार्थ में और मतलब की खातिर
दगा हम किसी से भी करते नहीं हैं 

चलें झूठ की राह पर जो सदा ही
कभी भाग्य उनके सँवरते नहीं हैं 

बुजुर्गों का करते हैं जो मान दिल से
वो जीवन में ऐसे बिखरते नहीं हैं 

बड़ाई के भूखे दिखावे में पड़कर
गरजते हैं लेकिन बरसते नहीं है 

जिन्हें कर्म पर है भरोसा कभी वो
“रमा” जिंदगी में पिछड़ते नहीं है 


2.

वक्त बीता था आजमाने में
रूठने में कभी मनाने में 

आज फिर याद उसकी आई है
उम्र बीती जिसे भुलाने में 

रहगुजर यूँ कई मिले हमको
कोई उनसा नहीं जमाने में 

फासले दरमियां बढ़े ऐसे
मिट गए हम जिसे मिटाने में 

देख गहरा है प्यार का सागर
है मजा इसमें डूब जाने में 

नाम लिखकर उसी का हम अक्सर
गुनगुनाते रहें फ़साने में 

 
3.

ले गया अब दिल चुराकर कौन है
ढूँढती हूँ वो सितमगर कौन है 

सज गईं हैं खुबसूरत महफ़िलें
देख लेते हैं धुरंधर कौन है

कुछ न कुछ तो है कमी सब में यहाँ
इस जमाने में सिकंदर कौन है 

क्या अजब ये खेल है मेरे ख़ुदा
आप तो अंदर हैं बाहर कौन है 

अब तलक इतना समझ पाई नहीं
लिख गया मेरा मुकद्दर कौन है 

जो किसी के दर्द से पिघला नहीं
बोलिए वो दिल का पत्थर कौन है 

दिल की बातें दिल में ही रह जायेगी
आजकल कहता भी खुलकर कौन है 

सूरतें सीरत बता पाती कहाँ
क्या पता कि दिल के अंदर कौन है 

जिन्दगी मीठी नदी सी है "रमा" 
ये बता खारा समंदर कौन है 


4.

माँ का आंचल सर पर हो तो, दुनिया लगती स्वर्ग समान 
इस धरती पर माँ का रिश्ता, होता ईश्वर का वरदान 

इस दुनिया की ऊँच नीच से, जब हम थे बिलकुल अंजान 
माँ ने ही हमको सिखलाया, दुनिया का सारा विज्ञान 

हाथ पकड़ चलना सिखलाया, गिरने पर लेती थी थाम 
खुद का सुख तज कर रखती हैं, हम बच्चों का हरदम ध्यान 

लगा सकेंगे धन दौलत से, माँ की ममता का क्या मोल 
मोल चुकाना हो तो उसका, हरदम करना तुम सम्मान 

तिनका तिनका जोड़ हमारे, सपनों को देती आकार 
फिर भी हमको कभी नहीं वह, देखो जतलाती अहसान 

ममता से सींचा है तुमको, भूल न जाना ये उपकार
अपनी जननी का जीवन में, कभी नहीं करना अपमान 

 
5.

आज तन्हा जिंदगानी रह गई 
साथ बस यादें सुहानी रह गई 

जिन्दगी चलती रही रफ़्तार से 
पर कसक कोई पुरानी रह गई 

नज्म तो हमने सुनाई है बहुत 
दास्ताँ दिल की सुनानी रह गई 

पत्ते पत्ते आँधियों में उड़ गए 
पर महकती रात रानी रह गई 

बीज हमने प्यार के बोये मगर
इक फसल दिल में उगानी रह गई 

भूल बैठे हैं सनम दुनिया जहाँ 
अब हमें बस मौत आनी रह गई 

दिख रही है दूर तक रेगे रवां
कुछ नहीं बाकी निशानी रह गई

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