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पांच ग़ज़लें – राकेश कुमार “दिलबर” – अंक-1

27 जुलाई 1972 को उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर ज़िले में कादीपुर तहसील के एक गाँव विजेथुआ, राजापुर में पैदाइश। माँ बाप ने नाम राकेश दूबे रखा, इब्तदायी तालीम गाँव के स्कूल में ही हासिल की और इण्टरमीडिएट पास करने के बाद तालीम को खैरबाद कह दिया।
तब तक तबीयत में सा़जो-आहंग का जादू अपना असर घोल चुका था और संगीत सीखने की तरफ माइल हुए। त़करीबन पाँच-छ: साल में ही कव्वाली और ग़ज़ल गायकी के हवाले से हिन्दुस्तान के मु़ख्तलि़फ शहरों का स़फर करना शुरू किया और वहाँ के प्रोग्रामों में शिरकत की।

ग़ज़ल गायकी के शौ़क ने आपको उर्दू शेरो-शायरी के करीब किया और जबान-ए-तालिब-इल्मी ने, तुकबन्दी के शौ़क ने शेर कहने का सली़का सिखा दिया।

1

दिल को हमारे चाहने वाला नहीं मिला।
इस आइने को एक भी चेहरा नहीं मिला।

ये काम दोस्तो ने किया देखो बार-बार,
दुश्मन से आज तक मुझे धोका नहीं मिला।

उसके बग़ैर भी उसे जी कर दिखा दिया,
उससे जुदा हुआ तो दुबारा नहीं मिला।

बर्ताव मुझसे करते हैं सब ग़ैर की तरह,
रिश्तों की भीड़ में कोई अपना नहीं मिला।

ये देखिये जो कैस से लैला नहीं मिली,
फिर यूँ हुआ कि मजनूँ से सहरा नहीं मिला।

सब आके बैठते थे इसी पेड़ पे मगर,
आँधी चली तो कोई परिन्दा नहीं मिला।

ईमानदार अपने को कहते हैंं जितने लोग,
लगता है के उन्हें अभी मौ़का नहीं मिला।

2

ऐसा दोनों का मु़कद्दर हो जाय।
मैं ज़जीरा वो समुन्दर हो जाय।

देख ऐसा भी तो हो सकता है,
तेरा सर हो मिरा पत्थर हो जाय।

ख़ाली हाथों उसे जाना ही पड़ा,
चाहता था वो सिकन्दर हो जाय।

ऐसा वो श़ख्स न चाहेगा कभी,
मेरा कद उसके बराबर हो जाय।

उनके जाने से उदासी है बहुत,
वो जो आयें तो ये घर-घर हो जाय।

ख़ैर म़क्दम हो अब ऐसे उनका,
मेरा दिल जिस्म से बाहर हो जाय।

 

3

कभी-कभी वो मुझे यूँ डराने लगता है।
अँधेरा जैसे उजाले को खाने लगता है।

मैं उससे जब भी व़फा का सवाल करता हूँ,
जवाब देता नहीं मुस्कुराने लगता है।

़िजयादा देर वो मुझसे अलग नहीं रहता,
मै रूठ जाऊँ तो मुझको मनाने लगता है।

मिरे बदन में तवानाई दौड़ जाती है,
वो श़ख्स जब मिरे ऩजदीक आने लगता है।

हमारे दिल से ये तन्हाइयों में दर्द तिरा,
निकल के आँख से दामन पे आने लगता है।

मै जब भी करता हूँ कोशिश उसे भुलाने की,
उसी घड़ी वो बहुत याद आने लगता है।

हमारे सामने आता है जब भी वो ‘दिलबर’,
हमारे शेर हमीं को सुनाने लगता है।

 

4

बड़े ख़ुलूस बड़ी सादगी से हार गये।
हम अब के प्यार की बा़जी ख़ुशी से हार गये।

लुटाये जाता है ये दिल व़फा का सरमाया,
हम इस फ़कीर की दरिया दिली से हार गये।

किया था तुमने जो वादा अब उसका क्या होगा,
स़फर तवील है तुम तो अभी से हार गये।

ये दुश्मनों ने नहीं दोस्तों ने मारा हमें
बचे जो मौत से तो ज़िन्दगी से हार गये।

सुबूत और गवाही से जीत जाते मगर,
मु़कद्दमा वो ग़लत पैरवी से हार गये।

जहाँ भी देखिये है मेरी प्यास का चर्चा,
तमाम दरिया मेरी तश्नगी से हार गये।

5

चाहा था टूटकर जिसे आख़िर चला गया।
दिल से मुहब्बतों का मुसा़िफर चला गया।

बेरंग आज तक है ये तस्वीर प्यार की,
पूरा किये बग़ैर मुसव्विर१ चला गया।

कहता था दिल से शह्रे-व़फा कत्लगाह है,
इस को मना किया था मगर फिर चला गया।

बा़जारे-दिल को देखिये घाटे में छोड़कर,
बरबाद मुझको करके वो ताजिर चला गया।

हर शब गु़जर रही है तहज्जुद में आजकल,
मोमिन बना के मुझको वो का़िफर चला गया।

‘दिलबर’ से अब तो कीजिए खुल के हर एक बात,
था अपने दरमियान जो मुख़बिर चला गया।

 

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