rajat kumar final cover - Copy

पांच कविताएँ – रजत कुमार मिश्रा – अंक-1

मैं सर्वज्ञ

क्या लिखूँ जो ना लिखा हो,
क्या बताऊँ जो ना दिखा हो,
सब ने तो जग छान लिया है,
क्या दिखाऊँ जो ना बिका हो।
सूर्य शशि दो चक्षु सम थे,
रात दिन जग अवलोका,
मरू छनाई, वन उधेड़ा
पवन संग बन के झोंका।
सागरों की तह तलाशी,
पर्वत घाटियाँ तराशी,
मेघों में जल कण घनाए,
वायु घूर्णन चक्र बनाए।
खलिहानों में घास काटी,
खेतों में बिखरा दी माटी,
फूलों में महक डाली,
नवजात को मुस्कान बाँटी।
लहरों के जब जब हिंडोले,
समंदर में मोती टटोले,
वसंत में, बहार में,
रस भरी फुहार में,
बाग में, बगीचों में,
फलों के गलीचों में
मनमोहक कानन में,
शिशुओं के लालन में,
भोर की उजली रश्मि,
या निशा चढ़ती घनेरी,
कभी-कभी हर पग पर मैंने,
सुनहली सी मुस्कान बिखेरी।
नदियों में बहते पाया,
दिलों में रहते पाया,
बिना कहे अंतः में ही,
सभी गमों को सहते पाया।

दानवों का गर्व देखा,
मानवों का पर्व देखा,
देवत्व की महिमा सराही,
सूक्ष्म खोजा, सर्व देखा।

करुणा में आँखें भिगोई,
स्नेह की कलियाँ पिरोयीं,
चरम भी था, पतन भी था,
मानव ने जब इंसानियत खोई।

समय ने हँसकर सुनाए,
हर पल नये युग के तराने,
वृहद विशाल रियासतें सोईं,
खो गये अनगिन घराने।

पूरी पृथ्वी जी भर निहारी,
घटाओं का बना झरोखा
पक्षियों ने आश्रय दिया,
पर तारकों ने फिर भी टोका।
अति लघु तुम, जो तुम्हें
मिल पाए, कुछ नया कहने का मौका
पूर्वजों ने वर्णित किया सब,
फिर क्यूँ तुम्हें नूतन का धोखा।
बात अद्भुत जान कर,
मैंने अपना भ्रमण रोका,
कटु सत्य यह मान पाया,
जब पुरातन ज्ञान विलोका।
मैं सर्वज्ञ कुछ नया लिखूँगा,
सुनकर जैसे जग हँसा हो,
जान सकता है वही कुछ
जो घमण्ड में ना फँसा हो।
सभी तो हैं पूर्व चित्रित,
नहीं कुछ जो अब बसा हो,
सभी बंधन खुल चुके हैं,
है क्या जो बेड़ियों में कसा हो।
किसका वर्णन मैं उभारुँ,
जो अभी भी नीचे धँसा हो
अब भला मैं क्या सुनाऊँ,
तुम ही कह दो जो बचा हो।

 

पूस की रात

पूस की एक रात में,
अबोध बालक के साथ में,
बेहद थके माँदे कुली ने,
गरीबी के एक नए हमजोली ने,
टूटे हुए एक पुल के नीचे,
सरकार की भूल के नीचे,
रात काटने का विचार किया,
पर पुलिसिया डंडे ने उसके पैरों को सिया,
निर्धनता की क्रूर देवी भी तब शरमाई,
जब उसने फटी हुई भीगी चादर फुटपाथ पर बिछायी
हवायें भी मंद आती थीं,
जिंदगी की जंग लाती थीं,
सड़कों से गुजरते रहे कारवां,
ठण्ड से खेलती रहीं दो जान,
उनकी इस दयनीय दशा पर दया मृत्यु को ही आई,
जीवन से जो जीत सके ना मौत सदा ही उनको भाई,
पत्थर भी पिघल गया यह माहौल देखकर,
ईश्वर की प्यारी सृष्टि का हाल देखकर,
मृत्यु आज भी उस घटना पर हँसती है,
महलों में रहने वालों पर फब्तियाँ कसती है।

लेखा- जोखा

दिन दिन करके सूरज चलता,
गिन गिन करके चाँद।
उज्ज्वल चमके सूर्य एक सा,
घटता बढ़ता चाँद।

करो भलाई गिनो नहीं तुम,
तारीफों को चुनो नहीं तुम।
पर मंजिल जब वांछित हो तो,
पगबाधों की सुनो नहीं तुम।

दया गिनो मत, क्षमा गिनो ना,
गिनती का ये खेल घिनौना।

देना हो तो आँख मूँदकर,
धरती देती सिर नीचे कर।
देने में भ्रातृत्व जगाओ,
सौदागर को अब पीछे कर।

 

नाव चली

रिमझिम रिमझिम बूँदें बरसीं,
अहा खिलखिला उठी कली।
जल के अविरत प्रवाह में
देखो मेरी नाव चली।

तूफ़ानों से लड़ती है,
तेज धार में बढ़ती है।
किनारों से टकराकर,
लहर में यह कैसी मचली।
जल के अविरत प्रवाह में
देखो मेरी नाव चली।

जल बूँदें भीषण टकराती हैं,
बच बच कर यह इठलाती है।
बलखाती है, बढ़ जाती है,
डगमगाकर फिर से सँभली।
जल के अविरत प्रवाह में
देखो मेरी नाव चली।

सभी दिशाओं में है जाती,
हर तट के नाम एक पाती।
विश्व शांति संदेश लिए है,
साथ दे रहे मेढक मछली।
जल के अविरत प्रवाह में
देखो मेरी नाव चली।

अरे बारिश थम गयी है
जल धार भी जम गयी है।
रुक गयी है नाव कुछ पल,
पर देखो छाई फिर से बदली।
जल के अविरत प्रवाह में
देखो मेरी नाव चली।

 

सच पर लांछन

हवा को फूँक से उड़ाने की नादानी में
समंदर को डुबोने फेंके पानी में,
बहुत से खेल बसते हैं सच झूठ के पासों तले,
कहीं विश्वास खो ना जाए फिर किसी मनमानी में।

जब कर्तव्य का सच तड़पकर सज़ा पाने लगे,
एक नया अध्याय जोड़ें तब धर्म की कहानी में।

घिरकर झर रहे हैं आरोप के बादल घने,
कहीं संकल्प ना बह जाए बरसते पानी में।

गम तुझे क्या हँस ले थोड़ा राह में काँटे अगर,
क्या पता ये चिंगारी दे दें सो चुकी जवानी में।

देख तूने बस रखा संघर्ष का पहला कदम,
अभी कितने युद्ध बाकी, बची हुई जिंदगानी में।
और याद रखना तू यही, विश्वास गर खुद पे रहे,
खिल जाएगा कमल बन के पंक भरे पानी में।

 

 

One thought on “पांच कविताएँ – रजत कुमार मिश्रा – अंक-1

  1. रजत जी की कविता सुंदर व संदेश और प्रेरणा दे ने वाली है । पांचों कवितायों में सब कुछ है लेखा जोखा।
    बहुत सुंदर

    अनिल कुमार सोनी

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *