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ग़ज़ल – अब्बास क़मर (अंक-3)

अब्बास क़मर
ईमेल – abbasfreelancer02@gmail.com

1.

आज पाज़ेब की छनछन ने रुलाया हमको
आपका इश्क ये किस मोड़ पे लाया हमको

पहले उंचाइयां बख्शीं… मेरे हमदम ने मुझे
और फ़िर अपनी ही नज़रों में गिराया हमको

वक़्त की मार ने इस तर्ह बिगाड़ी सूरत
आईना देख के पहचान न पाया हमको

रौशनी जश्ने-चराग़ां में थी मसरूफ़ बहोत
रास्ता आज अँधेरों ने दिखाया हमको

ख़्वाहिशें मर गईं बेमौत हमारे अंदर
मुफ़लिसी ने अभी एहसास दिलाया हमको

जीत कांटों पे मिली हार गए फूलों से
आग खामोश थी पानी ने जलाया हमको

डूबते वक़्त हँसी आ गई कि़स्मत पे हमें
नाखु़दा पास था पर देख न पाया हमको

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