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दुनिया के दरीचे से (नज़्म – प्रतिमा त्रिपाठी) अंक-1

प्रतिमा त्रिपाठी की ऩज्मों को पढ़ना अपने आप में एक उत्सव है। गर्दिश की स्याह सुरंगों में उम्मीदों के जुगनुओं की बरामदगी है ये ऩज्में। कहन में हवाओं का लोच, लहरों की रवानी, दरिया की जवानी और ह़जारहा पूâलों की शो़खी एक साथ ऱक्स करती सी दिखाई देती है। एक तिलिस्म तारी हो जाए दिलो-दिमाग में, एक बेकाबू बगावत के साथ, ऐसा है इन ऩज्मों का असर।

जन्म – 13 जुलाई 1977 
शिक्षा – परास्नातक संस्कृत व अंग्रेजी
प्रतिमा त्रिपाठी गंगा-जमुनी तहज़ीब में पली-बढ़ी, प्रयाग की संस्कृति विरासत में लिए हुए, हिंदी और उर्दू दोनों भाषाओं पर समान अधिकार रखती हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में इनकी कविताएँ और नज्में छपती रही हैं। इसके अलावा आकाशवाणी से भी नज्मों का प्रसारण होता रहा है। प्रतिमा त्रिपाठी की नज्मों में जीवन के हर रंग देखने को मिलतें हैं।

 

ज़िन्दगी के मदरसे में

बड़ी उम्र हुई
तब जा के मिला दा़िखला
ज़िन्दगी के मदरसे में।
पहले तहज़ीबें सीखीं
फिर किताबी इल्म हुआ
उसके बाद रिवायतें।
अब जा के आया है शऊर
गुज़रते हर लम्हात पढ़ने का
माना कि बड़ी देर हुई पर
ऐ ज़िन्दगी।
देख मुझे आ ही गया
सीखना और सीखते ही जाना।
बदल देंगे

अब के मस्जिद में नए इमाम आये हैं
जो कहते हैं के वो खुदा बदल देंगे।
मेरे दिल की ज़मीं बदल देंगे
आँखों का आसमाँ बदल देंगे।
ये धूप, ये बादल, ये चाँदनी क्या है
वो सारे के सारे मौसम बदल देंगे।
वो नए म़कसद भी देंगे औ राह भी बदल देंगे
ज़िन्दगी गर अज़ाब है तो अज़ाब भी बदल देंगे।
कोई तो कह दे इन कानून के निगहबानों से
गर हमें बदलना न आया
तो क्या वो हमें भी बदल देंगे?
और इतना कुछ बदलते हैं गर आका
तो इक मासूम सी कोशिश क्यूँ नहीं करते खुद को ही बदलने के लिए।

 

बचपन

शाम ढलते ही
कितनी नटखट
किलकती आवा़जें
घरों से निकल रही हैं।
गली में छोटी-छोटी
गुस्ता़िखयाँ खेल रही हैं।
नन्हे-नन्हे टिकोरे
पेड़ों पे झूले झूल रहे हैं।
पाजी दो थैलों में
कंचे भर लाया है।
शैतानियाँ बदमाशियों से
झगड़ रही हैं।
और ज़िन्दगी
पेड़ से टिकी खड़ी
सब देख हौले-हौले
मुस्करा रही है।

ग़म

इक चट्टान बर्फ की
पिघलती है सीने में
धीरे-धीरे।
इक क़तरा समन्दर का
ढुलक जाता है आँखों से
बिना आवाज़।
इक ज़ख़्म हरा रहता है
हर मौसम
सावन की तरह।
रिश्तों में नमी

कभी-कभी रिश्तों में भी
नमी सी आ जाती है
कितने भी पुराने हों
कुछ कमी सी आ जाती है
सोचती हूँ के अगले मौसम में
इन्हें भी धूप दिखा दूँ
इससे पहले कि ये बिगड़ें
इन्हें बचा लूँ।

 

चुपचाप गली

बातों के मुहल्ले में
एक चुपचाप गली रहती है
जब बातें थक जाती हैं
जब सन्नाटा हो जाता है
तो वो बहुत बड़बड़ाती है,
वही चुपचाप गली।
सुन चनाब

तू सिर्फ़ बहता दरिया होती
तेरे रंग में लहू न होता
तेरी लहर में द़फ्न
जुदा-जुदा मिट्टी न होती
मिट्टी में मोहब्बत की
पुख्त: निशानियाँ न होतीं
तो चनाब.. तेरी कहानियाँ
कभी इतनी सौंधी न होतीं।

 

बु़जुर्ग मकाँ

(१)

नुक्कड़ के आ़िखरी कोने पे ऊँघता सा इक मकान।
दरवा़जे ने जैसे बरसों से कोई दस्तक न सुनी हो
दरीचे पे अपनी आखिरी साँसें गिनता हुआ कुछ झुका
बाँस की महीन सलाइयों का ़जर्द-गर्द पर्दा।
सर्द दीवारों के उâपर तनी एक झुलसी हुई छत
उâपर के नन्हे कोटरों में कबूतरों की आवाजाही
बाहरी आँगन में अपनी घनी छाँव से
राहत देता बूढ़ा नीम।
भीतर किसी के होने का एहसास तभी जगता जब
रात के पसर जाने पे इक ढिबरी झिलमिलाती है।
जाने क्यूँ ऐसा लगता है कि रोज खाँसता हुआ
ये मकाँ शायद अपने पेंशन के दिन काट रहा है।
(२)

इक ख़याल रह-रह के कौंध जाता है अक्सर
कि बीमार औ बुज़ुर्ग ये मकाँ क्या कभी
ऊपर की सीढ़ियों से यादों के तहखानों में उतरता होगा?
क्या कोई ब्लैक एंड व्हाइट पिक्चर
इसके ज़हन में भी रोल होती होगी?
अगवानी के लिए दरवा़जे पे झरता
हरसिंगार का महकता गलीचा।
बात-बात पे हवा की छेड़खानी से
दस्तक देती झिझकती हुई कुण्डी।
लेटेस्ट डिज़ाइन के सीं़खचे खिड़कियों पे
उसपे झूमता-इठलाता रेशमी पर्दा।
ताज़ी सफ़ेदी की गंध में डूबी दीवारें,
छत पे सजी गमकते फूलों की कतारें।
अपनी तरुनाई पे इतराता नीम,
उसकी लचकती शाख़ों के झूलते झूले।
घर के भीतर से आते कुछ हँसी के छींटे
और कोई नाम पुकारती आवाज़।
चिलचिलाते मौसम को मुँह चिढ़ाता,
जाड़ों में धूप भरता छत पे अधलेटा,
बारिशों में भीगता, इन्द्रधनुष के रंग चूमता
नुक्कड़ के आा़fखरी कोने पे खुशनुमा वो मकाँ।

 

मेरे घर की छत

मेरी छत के एक कोने में
पड़ी हैं दो बेंत की कुर्सियां,
कुछ अधलेटी सी जैसे
समन्दर किनारे धूप सेंक रही हों।
बैठी रहती हैं दोनों करीब ऐसे
पुरानी यादें ताज़ा करती हुर्इं
गुपचुप बातें करती हों
रा़जदारी की दो सखियाँ जैसे।
कभी पास पड़े होते हैं दो चाय के प्याले
कभी भरे तो कभी खाली और
कभी चुस्कियां लेते हौले-हौले
वहीं दूसरे कोने में पड़ा झूला
जो अकेले ही झूलता है अक्सर
जैसे कोने में खड़ा बु़जुर्ग कोई
मुस्कराता है बच्चों के खेल पर
इनसे रौऩक है घर में मेरे,
घर उदास नहीं होता
कभी अकेले में भी।

 

One thought on “दुनिया के दरीचे से (नज़्म – प्रतिमा त्रिपाठी) अंक-1

  1. badri dutt mishra December 10, 2016 at 5:32 pm

    Wah..bahut saleeke se kahi gai baat..

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