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दोहे – प्रताप नारायण सिंह – अंक – 2

प्रताप नारायण सिंह
एक खंड काव्य - "सीता :एक नारी" प्रेस में है और शीघ्र प्रकाशनार्थ है। 
कुछ कवितायें गर्भनाल और परिंदे पत्रिका में प्रकाशित हुयी हैं।  
इ पत्रिकाओं - अनुभूति, साहित्यकुंज इत्यादि में कई रचनाएँ प्रकाशित। अनुभूति और गर्भकाल में कहानियाँ भी प्रकाशित हैं।


देश बना बाज़ार अब, चारों ओर दुकान
राशन है मँहगा यहाँ, सस्ता है ईमान

राजा- रानी तो गए, गया न उनका मंत्र
मतपेटी तक ही सदा, रहा प्रजा का तंत्र

सर्वाहारी क्यों इसे, बना दिया भगवान?
ज़र, जमीन, पशु-खाद्य तक, खा जाता इंसान

गंगाएँ कितनी बहीं, 'बुधिया' रहा अतृप्त
जब जब है सूखा पड़ा, नेता सारे तृप्त

बापू, तुम लटके रहो, दीवारों को थाम
नमन तुम्हें कर नित्य हम, करते 'अपना काम'

रंग मंच पर नग्नता, नाचे भर हुंकार
छुपकर अब नेपथ्य में, सिसक रहा है प्यार

रुका नहीं जो अतिक्रमण, धरती देगी शाप
धिक्कारेंगी पीढ़ियाँ, रूह उठेगी काँप

ताकत तो है तोड़ती, पिघलाता है प्यार
लोहा जब पिघले तभी, ले नूतन अाकार

परिवर्तन शाश्वत रहा, कोई भी हो दौर
पर विरोध भी साथ में, होता है पुरजोर

जो माटी से तन बना, महता कम ना होत
बिन दीया कैसे भला, जलती कोई जोत

मिलन विरह दोनों सुखद, प्रेम करे यदि वास
कस्तूरी सा, हृदय में, फैले मधुर सुवास

मसिहा बनने की रही, सदा मनुज की चाह
पर सबसे बनती नहीं, पानी ऊपर राह

रात दिवस लड़ता मगर, पार कभी ना पाय
चक्रव्यूह गढ़ आप ही, ढूँढे  स्वयं उपाय

आधिपत्य, प्रतिदान, गुण, होते नहि आधार
इसीलिए सबसे अलग, होता माँ का प्यार

प्रीति हिया ऐसी जगी, भागा भेद-विवेक
हर अमूर्त औ' मूर्त में, रुप दृष्टिगत एक

रामायण, गीता तुम्हीं, तुम ही वेद, पुराण
पढूँ, गुनूँ आठों पहर, तुममें ही निर्वाण

नेह-सुधा की अब्धि तुम, सुख-माणिक भण्डार
डूब डूब चुनता रहूँ, भरूँ हृदय आगार

सुबह, तुम्हारी ही हँसी, दुपहर, मधुरी बैन
साँझ तुम्हारी प्रीति है, आलिंगन है रैन

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