prtima

अनकहे अ़फसाने – कहानी – अंक 2

प्रतिमा त्रिपाठी
गणेशपुरम, इलाहाबाद
ईमेल – pratima.pra13@gmail.com

 

चिलचिलाती धूप में अब और चलने को जी नहीं चाहता था पर दूर तक किसी टैक्सी का निशान नहीं था, जो गुजरी भी वो या तो भरी हुई थी या रुकी नहीं। सोच ही रही थी थोड़ा और अपने को खींच सकूँ तो मेट्रो तक पहुँच सकती हूँ पर धूप राख करने पे आमादा थी, ऐसे में एक सफ़ेद कार सामने रुकी।
बंदे ने कहा- ‘टैक्सी?’
मैंने कहा – ‘‘पर ये तो टैक्सी नहीं है!!’
उसने बोला- ‘‘जी! होटल की है इसलिए लिखा नहीं, पर यहाँ गाड़ी रोकना मना है इसलिए अगर आप को जरूरत हो तो बैठ जाएँ।’
मैंने फट से टैक्सी में बैठना ही बेहतर समझा!
मैंने अभी पानी के दो घूँट ही भरे थे तब तक एक सवाल आया मेरी तरफ ‘‘हान्जी, तो आप पंजाबी हो!’’
पानी गटकते हुए मैंने कहा- ‘‘नहीं, मैं पंजाबी नहीं हूँ!’’ और साथ ही उसे अपना एड्रेस बताया। उसके बाद उसके सवालों का सिलसिला सा शुरू हो गया।
उसने कहा- ‘‘जी लग तो पंजाबी ही रहे हो, मैं जी मुस्लिम पंजाबी हूँ, पाकिस्तान से, आप कहाँ से हो?’’
‘‘मैं हिंदुस्तान से हूँ!’’
‘‘हिंदुस्तान में कहाँ से?’’
(मन ही मन मैंने सोचा हमारे यहाँ बिटिया ब्याहेगा क्या) फिर भी खीजते हुए जवाब दिया मैंने – ‘‘हिन्दुस्तान में उत्तर-प्रदेश से, जानते हैं आप?’’
पानी पीने के बाद मैंने उसपे निगाह डाली छोटे कद का, अच्छे चेहरे-मोहरे का मालिक, लगभग३०-३२ साल का और बहुत बातूनी भी!
उसने कहा- ‘‘हाँ जी! बिल्कुल जानते हैं, हमारे बाप-दादा वहीं से थे। ओ जी, क्या नाम था शहर का… हाँ, नैनीताल हमारे लोग वहीं रहते थे, बँटवारे के बाद हम सब पाकिस्तान आ गए।’’
‘‘हाँ, तो आप सकूल में पढ़ाते हो, टीचिंग जॉब?’’
‘‘नहीं! मैं सकूल में नहीं पढ़ाती, यहाँ मेरे बच्चे पढ़ते हैं, पेरेंट्स मीटिंग के लिए आई थी।’’
‘‘ओहो चंगा जी चंगा! ओ जी आप तो हमारे जैसे ही बोल रहे हो, मुझे तो लग रहा है के आप पंजाबी हो, खैर तो आप के काम करदे हो?’’
‘‘मैं कुछ नहीं करती हूँ!’’
‘‘ये तो हो ही नहीं सकदा, कुछ तो जरूर काम करदे होगे आप! आपको देख के लगदा है के आप कुछ तो करदे ही हो।’’
(उफ़….) ‘‘मैं कविताएँ लिखती हूँ!’’
‘‘हाँ! वही तो मैं जांदा था, जुरूर लिखते होगे आप! माशाल्लाह बहुत ही खूबसूरत काम करदे हो आप! मैं मजबूरी में ड्राइवरी करदा हूँ, मैं भी पढ़ा-लिखा हूँ! आप देख रही हैं न न्यूज़पेपर, जब भी फुर्सत मिलती है तो जरूर पढ़ता हूँ! अच्छा आप बुल्लेशाह को जानती हैं?’’
‘‘हाँ! जानती हूँ! सूफी कवि, बहुत से काफिये पढ़े हैं उनके!’’
‘‘जी! बुल्लेशाह कहंदा है-
‘‘आ मिल यारा सार ले मेरी, मेरी जान दुख ने घेरी
अन्दर ख़्वाब विछोड़ा होया, ख़बर न पैंदी तेरी,
सुज्जी बन विच लुट्टी साइयाँ, चोर-शंग ने घेरी।’’
आप समझे जी मैम?’’
‘‘वाह! हाँ समझी कुछ-कुछ, और आपका टेस्ट अच्छा है।’’
‘‘जी! मैं कभी-कभार पढ़ता हूँ ये सब वो हमेशा ये सब पढ़ती रहती है, वो मुझसे ज्यादा पढ़ी-लिखी है, होशियार है!’’
‘‘वो कौन?’’
‘‘वो… मेरी बेगम, पाकिस्तान में है, कई बार बुलाया मगर आती ही नहीं, आना ही नहीं चाहती, मैं ही जब कभी साल भर में जाता हूँ तो मुलाक़ात हो जाती है! उसके दिल में क्या है रब जाणे, शादी को चार साल हो गए मगर हम दोनों में कोई बात-चीत नहीं है। कई बार पूछ्या पे कुछ दसदी णा। घरवाले भी परीशां हो गए, मुझसे कहंदे हैं दूजा निकाह कर ले, वो भी कहदी है। मैं कित्तो बार पुंच्या उसनू के तेरे दिल विच कौन वसदा, कुछ दस् ते! मगर कुछ बोल्दी ही नई याँ!’’
उसकी बातें सुनते हुए अनायास ही मेरे मुंह से निकल गया –‘दिलचस्प!’
उसने कहा-‘‘जी, दिलचस्प ही है।’’
मैंने कहा- ‘‘हाँ! मेरे लिए दिलचस्प कहानी है मगर आपकी तो ़िजन्दगी है ये। अच्छा एक बात बताइए अगर उन्होंने बताया कि उनके दिल में क्या है तो क्या करेंगे आप?’’
‘‘मैं? मैं जान से मार दूँगा उसे!’’ उसने जवाब दिया।
उसकी इस बात पे मुझे जोर से हँसी आई – ‘‘हाहा आह्हा! आपको लगता है कि आप मार सकते हैं उन्हें; आपने शायद कभी किसी पे हाथ भी न उठाया होगा!’’
‘‘ओ सच कह रहे हो मैडम जी! मैं नहीं मार सकता उसको, मगर उसने अगर किसी गैर मर्द का नाम लिया तो उसके खुद के घर वाले उसे मार देंगे, हमारे यहाँ का रिवाज़ ही है जी, लड़की अपने दिल की बात नहीं कह सकदी। हमारे यहाँ शादियाँ आज भी माँ-बाप ही तय करते हैं और आप इनकार नहीं कर सकते!’’
‘‘ओह! फिर! तो क्या ऐसे ही गुजारने वाले हैं आप दोनों जिन्दगी?’’
‘‘जी! शायद ऐसे ही!’’
‘‘पत्तियाँ लिखाँ मैं शाम नूं मैनूँ पिया नज़र न आवे
आँगन बना डरावना कित विधि रैण विहारे।’’
‘‘वो ज्यादा किसी से बात नहीं करती, न कहीं आती-जाती है, ज्यादा वक्त किताबों में डूबी रहती है। इक वारी मैंने उससे पाणी माँगा, वो किताब पढ़ रही थी, बोली कुछ देर में देती हूँ; थोड़ी देर बाद मैंने खुद ही उठ के ले लिया। वो दिन के बाद मैंने आज तक उससे कुछ कहा नहीं। हाँ इस बार थोड़ा अलग महसूस हुआ। मैं बाहर जाने को हुआ तो देखा मेरी शर्ट प्रेस नहीं थी, मैंने शर्ट उठाई और बाहर प्रेस कराने जाने लगा तो उसने आवाज दे के रोका और हाथ से शर्ट ले के प्रेस करने चली गई। फिर मैं बाहर चला गया जब लौट के आया तो उसने मेरे पसंद का खाणा बनाया था… वो आप के यहाँ क्या कहंदे हैं उसे, पता नहीं, वो मुझे बहुत पसांद है ओ जी बैंगन को भून के मसल के बनाते हैं!’’
मैंने तपाक से कहा- ‘‘बैंगन का भरता!’’
‘‘हाँ जी वही.. वही.. और इतना कह के वो हँसने लगा!’’
इसी के साथ लम्बे अफसानों में एक छोटा सा सफर खत्म हुआ। मैं अपनी मंजिल पे थी लेकिन वो अब भी सफर पे था और नामालूम कब तक रहने वाला था। मैंने उसको किराया दिया और कहा- ‘‘आपसे मिल के अच्छा लगा, ़खुदा आपको सुकून अता करे और रिश्ते को भी राहत दे!’’
उसने कहा – ‘‘मुझे भी अपना दिल हल्का कर के अच्छा लगा,वड्डी ख़ुशी हुई जी आप से मिल के। दुआ के वक्त याद रखियेगा, क्या मालूम आपकी दुआएं ही लग जाएँ, बाकी खुदा की मर्जी , अल्लाह हाफ़िज़!’’
वो चला गया। मैं भी लौट आई, मगर एक अजनबी की बातों के साथ और जब दुआ में बैठी तो हाथ उठे तो पर कुछ कह न पाई। समझ में नहीं आया दुआ किसके लिए करूँ? उसके लिए जो राह में मिले अजनबी से भी दिल की बात कर के अपना मन हल्का कर लेता है या उस गुमसुम सी खोई लड़की के लिए जो अपने सगों से भी इक ल़फ़्ज कह नहीं सकती; जिसका दिल बोझ से दबा हुआ और न जाने किस गम में डूबा हुआ है। किस के लिए दुआ करूँ? किस के लिए?

2 thoughts on “अनकहे अ़फसाने – कहानी – अंक 2

  1. सिद्धार्थ September 18, 2016 at 9:34 am

    नएपन से सराबोर….होठों पे ग़म और ख़ुशी का मीठा सा नमक छोड़ गई ये कहानी….बेहतरीन

  2. Very Exhilarating and sentimental story, Really Appreciable.

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *