jo dil ki tamanna hai

समीक्षा : ‘जो दिल की तमन्ना है’ – समीक्षक : प्रो0 मुकेश दुबे (अंक -3)

यूँ तो शीर्षक ही कह रहा है कि कुछ दिल ने कहा है, परन्तु दिल हमेशा कुछ कहता ही रहता है। हर धड़कन एक ख्वाहिश होती है। होना भी चाहिये, न हों आरजू तो कितनी बेमानी होगी ज़िंदगी। मगर यही हसरतें जब इंसानियत की हदों के उस पार जाने लगती हैं तब शुरू होती है समस्या।
संजय अग्निहोत्री जी की कलम ने ऐसे ही हालातों और तमन्नाओं को बेहद खूबसूरती से संजोया है इस किताब में जिसका जिक्र यहाँ हो रहा है।
दरअसल दूसरों से आगे बढ़ने की ललक को वर्तमान व्यस्तता ने स्वार्थ की हद तक बढ़ा दिया है। स्वार्थपरता ने दूसरों के प्रति तटस्थता बढ़ाई जिसे मानवता ने कुनैन को शक्कर में पागने की तरह नाम दे दिया सज्जनता का।
बस इसी सज्जनता ने जिसे आम आदमी शराफत के रूप में देखता है, अपनी आड़ में नैतिक, सामाजिक जिम्मेदारियों व मानवीय मूल्यों को जीवन से विलुप्त करना शुरू कर दिया।
यही ह्रास तमन्नाओं को विकृत करता गया। संजय जी ने उन्हें न सिर्फ महसूस किया अपितु बेहद संजीदगी से काग़ज़ पर उकेर दिया।
कहानी का प्रादुर्भाव होता है एक महान वैज्ञानिक और अनुसंधानकर्ता डॉ. प्रशांत कोठारी को उनकी उत्कृष्ट शोध के लिए मिलने वाले नोबल पुरस्कार से। यहीं पर दूसरा अहम पात्र जिसे इस सम्पूर्ण घटनाक्रम का सूत्रधार भी कह सकते हैं, अस्तित्व में आता है। ये है डॉ. प्रशांत का अभिन्न मित्र मदन प्रताप सिंह। पेशे से सुपरिंटेंडिग इंजीनियर परन्तु शोध में रुचि के चलते प्रशांत के सहायक की भूमिका में काम कर रहा मदन अपने दोस्त के इस मुकाम तक आने की स्मृतियों के फ्लैशबैक में वो सबकुछ देख रहा है जो इस पुस्तक में आया है या आने वाला है।
सम्पूर्ण घटनाक्रम किसी पहाड़ी नदी के प्रवाह सा गतिमान होकर बढ़ता जाता है जिसमें अन्य पात्र जुड़ते चले जाते हैं।
यहाँ गहरे रहस्य का बीज पाठक के जेहन में सुषुप्त अवस्था से निकल अंकुरित होता है और नवांकुर से फूटती हर कोंपल रहस्य को गहराती जाती है।
अब एक सीधी सी बात अनगिनत परतों में लिपट कर रहस्य, रोमांच व जिज्ञासा के किसी व्यूह में बदल जाती है जिसमें पाठक न चाहते हुए भी घिरता जाता है। आगे बढ़ते जाने के अतिरिक्त कोई अन्य राह नहीं सूझती।
अद्भुत तिलिस्म बुना है लेखक ने जिसमें कहीं किसी जासूसी उपन्यास सा रहस्य है तो कहीं रिश्तों की अकुलाहट है। दाम्पत्य जीवन की विषमताएँ भी हैं और मानवीय स्वभाव की कमजोरियाँ भी हैं। स्वार्थ है तो त्याग की अनुपम बानगी है।
एक और चरित्र की ऊँचाइयों कि हिमालयीन शिखर है तो दूसरी और नैतिक पतन का रसातल है।
मित्रता की पराकाष्ठा है जो मित्र की प्रगति के मार्ग में आने वाले हर शूल से दामन तार-तार करता जाता है। आत्मा को लहूलुहान करता अनगिनत प्रश्नों के उत्तर माँगता है।
डॉ. कोठारी की पत्नी प्रभा, साली कुमुद व मदन के त्रिकोणीय सम्बंधों का सच क्या है ?
क्या प्रभा वास्तव में पतिता है ?
मदन की कौनसी विवशता है जो उसको परिस्थितियों के समक्ष घुटने टेकने पर मजबूर कर रही हैं ?
ऐसे ही पेचीदा सवालों का तथ्यात्मक व विश्लेषण सहित हल आगे के पन्नों में दबा दिया है संजय जी ने।
डॉ. कोठारी का शोधकार्य अनेकों रुकावटों के बावजूद निर्बाध चलता है। यहाँ डॉ. अधीर अब्भयंकर की प्रविष्टि किसी खलपात्र के रूप में होती है। इस पात्र की लालसाएँ ही तमन्नाओं का विकृत स्वरूप हैं जिसने इस कथानक की जमीन तैयार की है।
यश, प्रतिष्ठा और प्रसिद्धि की चाह में एक वैज्ञानिक का नैतिक पतन उसे अपराधी बनाता जाता है और वो सभ्य समाज का प्रतिनिधि हर उस काम को अंजाम देने से नहीं चूकता जिसे समाज गलत कहता है और कानून में जिसके लिए दण्ड का प्रावधान है।
मुख्य कथानक के साथ ही यहाँ एक उप कथा को अत्यंत प्रभावी तरीके से पिरोया है लेखक ने। प्रो. समर सिंह व उसकी पत्नि नीता सिंह के दाम्पत्य जीवन की कठिनाइयों व समर सिंह की उच्चाकांक्षाओं की दुखद परिणति का सुन्दरतम प्रस्तुतीकरण किया गया है। यहाँ भी जबरदस्त रोमांच में सराबोर होता है पाठक।
क्या नीता की हत्या …… ?
कौन है हत्यारा या मुख्य आरोपी ?
एक प्रेमविवाह क्यों असफल रहा ?
एक बार पुनः कई प्रश्न खड़े हो जाते हैं।
अपराध विशेषकर हत्या का लेखन कभी सहज नहीं होता। जिस तरह से संजय जी ने उनकी नींव डाली व प्रस्तुतीकरण किया उससे तो भ्रम होता है कि लेखक तकनीकी क्षेत्र से है अथवा मनोविकार व अपराध विज्ञान का विशेषज्ञ है।
घटनाओं की प्रामाणिकता व सटीक विश्लेषण दाँतों तले उंगली दबाने पर विवश कर देता है।
हर घटना की तथ्यपरक विवेचना, पुलिस व खुफिया विभाग की कार्यशैली, अपराधियों की प्रवृत्ति सब ऐसे समाहित किये हैं कि मूल कथानक का प्रवाह लेशमात्र प्रभावित नहीं होता बल्कि उसे और अधिक पुष्ट करता जाता है।
एक शानदार संदेश लिए कथा अपनी पूर्णता पर पहुँचती है कि बुराई कभी नहीं जीतती और सत्य कभी पराजित नहीं होता।
हर शंका व पूर्व में उठे प्रश्नों के तार्किक समाधान के साथ कथा का सुखांत मन में हर्ष की तरंगे जगा देता है।
अपनी बात में संजय जी के द्वारा उद्धत परम आदरणीय दिनकर जी की निम्न पंक्तियाँ सजीव हो उठती हैं –
‘समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध,
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।,

कुल मिलाकर एक सफल व सार्थक लेखन जिसमें पाठक को वांछित हर पहलू मौजूद है। प्रवाह व भाषा शैली इतनी प्रभावी कि संप्रेषण में कोई रुकावट नहीं।
प्रत्येक मायने में बधाई के हकदार हैं संजय अग्निहोत्री जी अपनी लेखनी के साथ।
पुस्तक के सुन्दर आवरण, त्रुटि रहित टंकण व मुद्रण तथा स्तरीय सामग्री के कारण अंजुमन प्रकाशन, इलाहाबाद भी बधाई के पात्र हैं।
अंत में लेखक संजय अग्निहोत्री ‘क्षितिज’ को पुन:हार्दिक बधाई व अनन्त शुभकामनाएँ देना चाहूँगा कि उनकी स्वर्णिम लेखनी से अनवरत सृजन हो हिन्दी साहित्य के कोष को सुदृढ़ करता रहे।
तो देर किस बात की….. तुरंत अपनी प्रति सुरक्षित कीजिए और डूब जाइये एक अप्रतिम लेखन शैली की गहराइयों में “जो दिल की तमन्ना है” के साथ।
———————————————————–
पुस्तक का नाम : जो दिल की तमन्ना है
लेखक : संजय अग्निहोत्री’ क्षितिज’
प्रकाशक : अंजुमन प्रकाशन, इलाहाबाद
प्रकाशन वर्ष : 2016
पृष्ठ संख्या : 144
मूल्य : भारत में रुपये 130/-
: विदेश में $ 5
———————————————————–

समीक्षक का परिचय

प्रो0 मुकेश दुबे (प्रवक्ता-गवर्नमेंट सुभाष हायर सेकेन्डरी स्कूल फॉर एक्सिलेंस, भोपाल)

 

प्रो0 मुकेश दुबे जी भोपाल के प्रसिद्ध हिन्दी लेखक व समीक्षक हैं । इनके अब तक पाँच उपन्यास (फ़ैसला अभी बाकी है, रंग ज़िंदगी के, कड़ी धूप का सफर, क़तरा क़तरा ज़िंदगी और अन्नदाता) व एक कथा-संग्रह (सेफ़रीन) प्रकाशित हो ख्याति अर्जित कर रहे हैं ।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *