FB_IMG_1473741759318

पांच कविताएँ – मनोज कुमार गुप्ता (अंक -3)

परिचय

मनोज कुमार गुप्ता

आत्मकथ्य = जब मैं  मात्र 9 महीने का था तभी मेरे ऊपर पोलियो नामक भयंकर बीमारी का प्रहार हुआ जिससे मेरे शरीर का 90% हिस्सा प्रभावित हुआ । मेरे जीवन की आशा नहीं थी परंतु आप जैसे सुधी जनों का साथ जीवन में था और माता पिता का प्रयास था क़ि मैं आज आप सब के बीच हूँ । शिक्षा में बेहद कठिनाइयों का सामना करना पड़ा मेरी शारीरिक स्थिति की वजह से कोई हमें पढाने को तैयार नहीं था किसी तरह से पढ़ गया । पुरष्कार उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा विकलांगता के क्षेत्र में किये गए कार्य के लिए महामहिम राज्यपाल द्वारा प्रदेश स्तरीय सम्मान व स्वर्ण पदक| कल्याणम करोति मथुरा द्वारा ब्रज विभूति सम्मान एव पंकज स्पास्टिक केंद्र वृन्दावन द्वारा ब्रज महिमा सम्मान। बर्तमान में मैं एक शिक्षक के रूप में केंद्रीय विद्यालय क्र. 1 अर्मापुर कानपुर को अपनी सेवाए दे रहा हूं ।
ईमेल – guptamanoj076@gmail.com

 

 

1

माँ

शब्द एक

अहसास अनेक

ममता, करुणा, दुलार

प्यार, सहनशीलता का उफनता ज्वार

शीतल मंद मीठी बयार

स्नेह सिंधु अपरम्पार

कभी कभी

बिना गलती के

रोज़ रोज़ का डाँटना

फटकारना

हर बात पर टोंकना

मारना पीटना

फिर चुपके से कोने में खुद ही को कोसना

क्या बात है माँ?

मैं जागूं, तो भी तू जागे

मैं सो भी जाऊं, फिर भी तू जागे

अजीब है तू भी माँ

भूखी रहकर भी

हमको खिलाती है

मेरी चोट पर खुद ही रो जाती है

सोफे पर हमको लिटाकर

तू ज़मीन पर सो जाती है

क्या मिल जाता है माँ तुझे?

जो मेरे जैसे के लिए इतने कष्ट उठाती है

तेरे सारे ब्रत, पर्व, त्योहार

सभी में बस एक ही मनुहार

केवल और केवल मेरे लिए !

तेरी दुआओ में सिर्फ मेरा ही जीवन

तेरी पूजा में एक ही समर्पण

माँ, तुझको मैं क्या करू अर्पण?

सब कुछ बौना सा लगता है

तू तो प्रेम का वट बृक्ष है

तेरी हर बात निश्छल है, निष्पक्ष है

तेरी हस्ती, ज्यों दीपक देवालय का

तेरा प्रकाश, ज्यों सूरज हिमालय का

तेरी पूरी कहानी अनुपम है

माँ, तेरे लिए कुछ भी कहे कम है।

माँ, तेरे लिए कुछ भी कहे कम है।।

 

मानवता शर्मशार

जो दे न् सकी कंधे चार

क्या यही है विकसित सभ्यता?

ज़िंदा हो तो वहशी नज़र नोच खा जाती है

मृत, तो नज़रें हटाती है !

पर ये भेद कैसा ….?

शायद अमीरी और गरीबी का

या फिर बेबस बदनसीबी का

कंधे से ज्यादा बोझ

सीने में समेट कर बढ़ा जा रहा था

आंसुओं को घूंट घूंट पिए जा रहा था

जीवनसाथी का साथ निभाना था उसे

सकुशल मंजिल तक पहुंचाना था उसे

लोग तमाशबीन थे

कोई भी आगे न् आ सका

उस अभागे का भार न् बटा सका

वह तो चली गई

छोड़ गई हज़ारों अनुत्तरित सवाल

एम्बुलेंस, एयर एम्बुलेंस, फ़ास्ट एम्बुलेंस

ये सारे अविष्कार

सब बेकार

अच्छे है केवल विज्ञान की किताबों में

आंकड़ों में हिसाबों में

देखने की चीज़ें है

मेहरबानों के शौक का सामान है

अपना ही प्रयास काम आता है

जब पर्वत में रास्ता बनाता है

दशरथ मांझी !

या फिर जब लाश को ढोता है

दाना मांझी !!!

 

3

कौन हो तुम?

क्या है तुम्हारी वजह?

एक चुम्बकीय क्षेत्र की तरह

महसूस करता हूँ आसपास

जैसे मीठा एहसास

अनचाहे ही खिंचा चला जाता हूँ

एक स्पर्श के लिए

इस्पात के छोटे कण की मानिंद

भावनाओं का भयंकर प्रवाह

रोक नहीं पाता हूँ

ठहर जाता हूँ ! आकर तुम्हारे पास

एकदम निश्तेज ! निढाल !!

थके योद्धा जैसा

निःशक्त परिंदे जैसा

तुम्हारी बाहों में आनें को आतुर

व्याकुल रहता हूँ

बंध जानें को मधुर बंधन में

महसूस करूँ खुद को

तुम्हारी साँसों के स्पंदन में

आँखों के समंदर में डूब जाऊँ

भुलाकर अपनी पहचान

छोड़ दूँ अपना निशान

तुम्हारे श्वेत आवरण में

निखर जाऊँ थोडा तुम्हारी चाहत से

बदल लूँ खुद को मुहब्बत से

कर लूँ प्यारी सी उम्मीद

यद्यपि हूँ स्याह घटाटोप अँधेरा

आ जाओ तो हो जाए सबेरा

हो जाऊँ आलोकित

आनंदित ! प्रफुल्लित !!

संगत में तुम्हारी

तुम तो एक अलौकिक शमा हो

पहचान लिया है तुमको !

जान लिया है तुमको !

क्योंकि तुम ही मेरी

प्रियतमा हो !!

 

4

अक्सर देखा है ज़िन्दगी तुझे

रोते हुए ! चिल्लाते हुए !!

अस्पताल की देहरी पर

टूटती हुई साँसों के कदमों को

स्ट्रेचर पर लड़खड़ाते हुए

देखे हैं भावना शून्य चेहरे

लाचारी, बेचारगी से परिपूर्ण

मौत को पछाड़ने का असफल प्रयास

किसी को भी नहीं आभास

कब क्या हो जाए……??

कोई मुस्कराए ! कोई मुरझाए !!

यक्ष प्रश्न आज तक यही रहा

ज़िन्दगी ने क्यों इतना दर्द सहा ….??

पढ़ती रही है डॉक्टर के चेहरे के हाव भाव

जानने को उसके सुझाव

अपनों के शुभ समाचार के लिए

उलझी कश्ती की पतवार के लिए

उसका तिनका सा शब्द सहारा बन जाता है

जब जल जाता है हरा बल्ब

ज़िन्दगी की नॉव् का किनारा बन जाता है

फिर उठता है वही सवाल

आखिर ज़िन्दगी क्यों आती है अस्पताल??

 

5

आज ज़िन्दगी से दो बातें की

पूछा ! तुम क्यों इतनी चुनौती भरी हो?

क्यों नहीं कभी समस्याओं से डरी हो?

रोज़ रोज़ हर

कदम, दर कदम बस परेशानी

क्या यही है तुम्हारी कहानी?

हो जाती हो कभी एकदम निष्ठुर, कठोर

सामने आकर हो जाता हूँ

लाचार, निरीह, कमजोर

तुम्हारी असलियत ही है मजबूरों को सताना

बेवजह ही हर कदम पर आजमाना

कई बार तुमसे दूर होने का मन किया है

पर क्या करें? जीनें की लालसा !!

पल पल हमें तुम्हारी ओर खींचती है

अपनें सब्ज़बगों से सींचती है

हार जाता हूँ

जब भी सामनें आता हूँ

ठहरता हूँ ! सोचता हूँ !!

कुछ और वक़्त तुम्हारे साथ गुज़ार लूँ

बचे हुए कुछ और लम्हें सुधार लूँ

पूरी कर लूँ शेष और हसरतें

बदल के रख दूँ यह विचार

कि लोग कहते है ज़िन्दगी है बेकार

है चुनौती ! एक कड़क चुनौती !!

पर हसीं पैगाम है

तभी तो ज़िन्दगी ज़िन्दादिली का नाम है

 

 

 

2 thoughts on “पांच कविताएँ – मनोज कुमार गुप्ता (अंक -3)

  1. Manoj ji divyang jano ke liye preranashrot hai. Mujhe inke sath karya karne ka saubhagy prapt hai.

  2. giridhar gopal shukla October 4, 2016 at 11:26 am

    Waaah .. kya baat hai Manoj sir … uttam rachanaye hai aapki…

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *