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पांच लघुकथा – ललित कुमार सोनी (अंक-3)

ललित कुमार मिश्रा ‘सोनी ललित’
78ए, अजय पार्क, गली नंबर 7, नया बाजार, नजफगढ़, नयी दिल्ली 110043 
ईमेल – sonylalit@gmail.com

मोबाइल – 9868429241

 

खौफ़

सोहन आज ही छेड़छाड़ के आरोप में छ: महीने की सजा काट बाहर आया था। बाहर आते ही ज्यों ही उसने मोहन को देखा अपने रंग में आ गया। ‘‘यार आज गाय टेस्ट करने का मन कर रहा है!’’
‘‘तेरा दिमाग ख़राब हो गया है क्या। इस गाय के चक्कर में सैकड़ों लोग कट गए पिछले महीने।’’
‘‘अबे मुझे भी पता है। मुझे भी कटने का शौक नहीं है।’’
‘‘तो फिर?’’
‘‘अबे पप्पू मैं इस चौपाये की नहीं, उस दोपाये की बात कर रहा हूँ।’’

मौन

नेहा ने जैसे ही दरवाजा खोला, शीतलहर से उसका रोम-रोम सिहर गया। वह तुरंत दरवाजा बंद करके बड़बड़ाती हुई अंदर आ गयी, ‘‘ये बुढ़िया आज भी बहाना करके पड़ी है। लगता है सूरज को स्कूल तक छोड़ने के लिए आज भी मुझे ही जाना पड़ेगा। अभी चाय के लिए आवाज़ लगाऊँगी तो बुढ़िया के सारे रोग दूर हो जायेंगे।’’ तभी नेहा को शरारत सूझी, ‘‘माँ जी…माँ जी, चाय तैयार हो गई गई है, उठिए ना!’’ माँ जी टस से मस न हुईं, वे अब भी मौन थीं। माँ जी के शरीर की तरह उनका मौन भी इस कड़कड़ाती ठण्ढ में जम चुका था।

चीटिंग

टीवी देखते समय अचानक टपके कामुक दृश्य को देखकर राहुल ने पिता से पूछा, ‘‘पापा, वो दोनों खेल रहे हैं ना?’’
अखिल जी ने हर बार की तरह पहले तो इसे अनसुना करने की कोशिश की, फिर नज़रें चुराकर विषय बदलने का प्रयास करने लगे किन्तु राहुल के बार-बार दोहराने से उनके मुँह से हड़बड़ाहट में ‘‘हाँ’’ निकल गया।
‘‘पर पापा, वो लड़की चीटिंग कर रही है।’’
‘चीटिंग?’
‘‘हाँ पापा! खेल के बाद लड़की लड़के को चॉकलेट देती है।’’
‘‘चॉकलेट? आपको कैसे पता बेटा?’’
‘‘वो पापा, हमारी ट्यूशन वाली मैम है ना, वो भी मुझे यही गेम खिलाती है और खेलने के बाद चॉकलेट भी देती है।’’

उबाल

‘‘तुमने वो पोस्ट देखी जो मैंने तुम्हे शेयर की थी सुबह?’’
‘‘कौन सी, वो रेप वाली जिसमें बारह साल की बच्ची का रेप करके मर्डर कर दिया।’’
‘‘हाँ, हाँ वही।’’
‘‘यार इस मामले में अरब कंट्री ही बढ़िया है। ऐसे ऐसे लोगों को बीच चौराहे पर लटकाकर मारते है वहाँ।’’
‘‘अच्छा, काम की बात सुन… उसी रेप का एम एम एस आया है।’’
‘‘अच्छा, तेरे पास है क्या? दिखाना प्लीज।’’

बदलते रिश्ते

गीता को घर में ना पाकर दोनों भाई आस-पड़ोस में पूछताछ के लिए निकल पड़े कि तभी रास्ते में संदीप की नज़र बिछिया पर पड़ी, ‘‘मनोज ज़रा देख तो, ये तुम्हारी भाभी की ही बिछिया है न?’’
‘‘पता नहीं भैया, मैंने कभी गौर नहीं किया।’’

दोनों थोड़ा और आगे बढ़े ही थे कि मनोज की नज़र कमरबंद पर पड़ी। वह उत्साहित होकर चिल्ला पड़ा, ‘‘भैया, वो देखिये, भाभी का कमरबंद!’’

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