कृष्ण सुकुमार

पाँच कविताएँ (कृष्ण सुकुमार) अंक – 2

कृष्ण सुकुमार
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(1)

मिटते चले गये
वे तमाम रास्ते
जिनसे हो कर पहुँचा
इस पानी तक!

स्पर्श करूँ तो आँसू हैं!
प्यास को क्या जवाब दूँ?

इसमें उतर जाऊं तो
उफनता दरया है!
क्या जवाब दूँ कश्ती को?

झाँकूं तो शांत निर्मल दर्पण है!
क्या जवाब दूँ अपने इस पराये हो चुके चेहरे को?

खड़ा हूँ एक मृगतृष्णा के किनारे!
कैसे लौटेगी मेरी तृषित आवाज़
मिट चुके रास्तों से हो कर वापस
तुम्हारी वर्जनाओं तक
जिन्हें तोड़ना नहीं चाहा कभी मैंने!

करता हूँ इंतज़ार
अब...
इस पानी के
पानी हो जाने का !

(2)

मुझे ऐसा क्यों लगता है
जैसे
ठहरे हुए हों मुझ मे
बहुत सारे अफ़सोस,
नहीं कर सका जिनकी
अगुआनी कभी!
कि... नहीं उड़ सका कभी
आकाश में उड़ती
चिड़ियों के साथ!
कि... नहीं गुनगनुना सका
वो गीत जिसे ख़ामोश हवाओं ने
अक्सर मुझे गा कर सुनाया!

ऐसा क्यों लगता है
जैसे ख़ुद से उकता कर
फेंक आऊँ ख़ुद को
किसी ख़ाली डस्टबिन में!
कि... ख़ुद से बाहर निकल कर
बिखर जाऊँ आँधियों में!
कि... ख़ुद को तोड़ लूँ
असंख्य टुकड़ों में
और फिर से बनाऊँ कुछ नया!

ऐसा क्यों लगता है
जैसे रह गया कोई
मुझ तक आते-आते
आहटों में गुम हो कर!
कि...लौट आया मुझमें
कहीं से फिर कोई
अयाचित भविष्य!
कि... अपने भीतर बीतता हुआ
अकेला मैं नहीं
मेरा अतीत भी है!

(3)
घर से चला था
तुम्हें छू कर !

फिर तुम तो सपने में ही छूट गये !

लौट आयी मेरी उन्मत्त नींदों से
तुम्हारी उदात्त छुअन
मेरी पराजित साँसों को थामे हुए !

अब नहीं लौटना मुझे
नींदों की तरफ़ कभी !

तुम दोबारा आ सको न आ सको
मैं दोबारा छू सकूँ न छू सकूँ
और फिर क्या पता छीन लो तुम ही
और छिटक जाये मेरे हाथों से
बचा हुआ तुम्हारा स्पर्श !
और ठीक तभी
अचानक खुल जाये नींद !

(4)
चलो
फूलों के बीच महकें
वे हमारी इंतज़ार में हैं !

आओ
बारिशों को ओढ़ लें
बादलों को ज़रूरत है
हमारी रूह के ताप की !

और हवाओं से भी पूछ लें
उनका मिज़ाज
उन में भर दें प्रेम के घनीभूत स्पंदन!

आहटों से टूटता है
आँखों में ठहरा सूनापन
सूनी कलाइयों को चूड़ियाँ
और सूने रास्तों को चाहिए यात्री!

बस
और क्या चाहिए तुम से
इस लड़खड़ाती ज़िंदगी को!

(5)
बहुत दिनों बाद खिली
भीतर पसरे बंजर पर
नर्म हरी दूब!
बहुत दिनों बाद उतरी
अँधेरे की तहों में
उजली चाँदनी!
बहुत दिनों बाद जागे
अलकसाये सपनों के
सोये हुए दृश्य!
बहुत दिनों बाद मुस्कुरायी
ओस के घुंघरुओं की
दमकती खनक!
बहुत दिनों बाद टूटे
मनगढंत रंगों के
अश्वेत भ्रम!
तब कहीं जा कर
आश्वस्त हुआ
कि मैं नहीं हूँ अनुपस्थित
अपने भविष्य से
न भूत से, न वर्तमान से!

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