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तुम ज्योति शिखा पथ प्रेरक सी – (दुर्मिल सवैया – केवल प्रसाद “सत्यम”) – अंक – 1

केवल प्रसाद ‘सत्यम’
जन्म तिथि – १०.०७.१९६३
जन्म स्थान – लखनऊ, उत्तर प्रदेश
पिता का नाम – स्व० राम फेर
माता का नाम – स्व० राम रती
शिक्षा – स्नातक

पता बी-5, कौशलपुरी, खरगापुर
गोमती नगर विस्तार, लखनऊ पिन-226010 
मोबाइल संख्या 9415541353

लखनऊ स्थित साहित्यिक संस्थाएँ ‘चेतना साहित्य परिषद’, ‘अखिल भारतीय नवोदित साहित्कार परिषद’, ‘लक्ष्य संस्था’, ‘अखिल भारतीय अगीत परिषद’ तथा ‘ओ०बी०ओ० लखनऊ चैप्टर’ आदि के द्वारा साहित्यिक गतिविधियों में संलग्न।
सृजन साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था, पति परिवार कल्याण समिति, स्व० दौलत देवी स्मृति संस्थान तथा अखिल भारतीय अगीत परिषद, द्वारा साहित्यिक सेवाओं के लिए सम्मानित ।
लखनऊ आकाशवाणी एवं लखनऊ दूरदर्शन के कार्यक्रमों में प्रतिभागिता। लखनऊ पुस्तक मेला व अन्य मंचों पर काव्य पाठ आदि।

1
बदरा बरसे हरषे धरती, नदिया-सर-खेत भरे जल से।
वन-बाग झकोर हवा पहिरे, फल जामुन-आम पके जल से।
हर ओर घटा घन घोर घिरी, मन-मोर-चकोर कहे जल से।
दहका मन नारि छली मचली, नहि प्यास बुझे बरसे जल से।

2
हर दास सदा सजदा करता, नहि नाम अनाम गिना करता।
हठ मान कमान नहीं धरता, कर जोड़ प्रणाम किया करता।
सत नाम जपा करता मरता, हरता भव-शाप दया करता।
हित नीति सदा कहता रहता, वह प्रीति सुनीति गुना करता।

3
हिमगंग तरंग छले शिव को, नभ मेघ तुरंग बढ़े रण में।
घन के रणबाँकुर इन्द्र अड़े, दृढ़ विद्युत चालक से रण में।
घर गाँव गली सड़कें सहमी, अति हीन समाज अकारण में।
शिव-शैल सुता सहतार्थ खड़े, असहाय धरा-जन तारण में।


इस वर्ष भयानक बारिश में, नुकसान नहीं कुछ देख रहे।
गर आफत है मजदूर दशा, जल प्रेम दिशा शुभ रेख रहे।
घर अन्दर बाहर नीर भरा, हर खेत सिवान विलेख रहे।
जल में नित मीन प्यासि मरें, गणतन्त्र मिटा अभिलेख रहे।

5
तन श्वेत सुवस्त्र सजे सँवरें, शिख केश सुगंध सुतैल लसे।
कटि भाल सुचन्दन लेप रहे, रज केसर मस्तक भान हँसे।
कर कर्म कुकर्म करे निश में, दिन में अबला पर ज्ञान कसे।
नित धर्म सुग्रन्थ रचें तप से, मन के अति नीच विचार डॅसे।

6
घन घोर घटा गरजे बरसे, वन मोर नचावहिं मोर जिया।
बिहँसे हरषे तन सींच गये, जगती तल शीतल मोर सिया।
बिजली घन बीच हँसी झट से, नभ-बादल से छल छन्द किया।
हिय जार गयी विष सौतन सी, नय अश्रु लिये बहकी नदिया।

7
बदरा बरसे असुऑ टपके, हिय शूल धँसे तन आग लगे।
जर जाइ समूल न आश बँधे, हर राह यहाँ बस नाग लगे।
घर द्वार सिवान सखी ननदी, सब बोलि सुनावत काग लगे।
वन-बाग बहार फले बतिया, सरिता सर सॉझ सुहाग लगे।

8

कहुं नीति अनीति सुनीति नहीं, पर प्रीति सुप्रीति सुभीति नहीं।
सपने अपने नहि मीत भले, बिन दुश्मन के रणनीति नहीं।
धरती जननी सम पीर सहे, जनता मन से परिणीति नहीं।
निज राज सुराज भले कह लो, पर दास उदास सुगीति नहीं।

9
चितचोर चकोर समान हुए, अब मेघ नहीं बस प्यास भली।
वन बाग कदम्ब तले बहके, तरु छाँह नहीं रतनार जली।
बड़का बड़वानल डूब जिए, नित नूतन लाल गुलाब कली।
रति रेशम जाल बिछी नभ में, रजनी कर क्रन्दन डूब चली।

10
नदिया जल घाट सभी डरते, बहते जलकुम्भ बनें प्रहरी।
यह जेठ तपाय रही धरती, मन खेत धरा चिटकी बिफरी।
जन-जीव-अजीव थके हँफते, नहि छाँव मिले तन प्यास भरी।
जब सूरज तीव्र चढ़ा नभ में, धधकी धरती तब आग झरी।

11
जन नायक ढ़ूू़ँढ रहे वन में, बस प्यास भरी मिलती तगरी।
अखियाँ पथराय गयी पथ में, अति शुष्क हवा पकड़े पतरी।
इक बालक नंग धड़ंग चले, रख हाथ घड़ा सिर पे गगरी।
धरती झट से पद चाप लिए, सिसके तन की पसली बिखरी।

12
नल कूप तड़ाग कुआँ सरिता, जल सूख गए नयना तन के।
नित काट रहे वन वृक्ष हरे, नहिं छाँव मिले गहना तन के।
खलिहान उड़े कण आँख पड़े, वन-बाग हुए तपना तन के।
ककड़ी तरबूज तरोइ घिया, खरबूज हुए रसना तन के।

13
मदिरा तन नाश करे इतना, सिगरेट अफीम नशा जितना।
अति पाय न पाय दुखी रहना, मन मार मरे नित सोच मना।
जब शंकर पाय हलाहल तो, जन जीव अजीव डरें कस ना।
सब देव कहें यह बात तभी, अब शंकर साथ रहे जग ना।

14
सब रोग ग्रसे अति दोष लगे, जब लोग कहें वह पाप करे।
अपनी बिटिया सपना ममता, असहाय सदा मन रोज डरे।
न शराब छुए नहि क्रोध करे, नहि भाँग धतूर नशा सगरे।
हटके बचके नित रोज तरे, अति पावन नाम जपे मन रे।

15
जब नीति प्रबन्ध सुनीति नहीं, फिर प्रीति कहाँ तक धीर रखे।
जन शक्ति समाज कहे समता, रणनीति वही शमसीर रखें।
सरकार सदा हित कार्य चुने, पर शासन ही लठवीर रखें।
हर ओर निसाचर रक्त पिएँ, जनमानस तो बस पीर रखें।

16

निज पुत्र कुपुत्र सुयोग्य नहीं, फिर भी हर मात दया करती।
खुद आद्र्र चुने सुत शुष्क फले, उपकार अपार किया करती।
तनया तन की प्रतिरूप भले, नित दान महान जपा करती।
जब पुत्र सुता कुछ भेद नहीं, तब भ्रूण अबोध वृथा करती।

17

मन मोह लिया मनमोहन का, तिय भूल गयीं वृषभान लली।
मुरलीधर राग अलाप रहे, हिय भूल गयीं वृषभान लली।
गउ-ग्वालिन भाव विभोर हुईं, प्रिय भूल गयीं वृषभान लली।
हरि रास करें सब झूम रहे, पिय भूल गयीं वृषभान लली।

18

चरणामृत जीव पिएँ मन से, तन का प्रतिबन्ध घटे जग में।
सब दोष वियोग प्रमाद मिटे, सुख के प्रतिबद्ध रटे जग में।
हर श्वांस जपे हरि नाम सदा, प्रतिमान सुगन्ध पटे जग में।
हरि के अभिनन्दन पूजन से, रवि का अनुबन्ध अटे जग में।

19

सुत ढूँढ़ रहे निज स्रोत सदा, कवितावलि में नित चूक रहे।
मन से अति कोमल काव्य रचें, रस भाव प्रभाव उलूक रहे।
तुम ज्योति शिखा पथ प्रेरक सी, भव जीवन में यश हूक रहें।
अब मात दया उपकार करें, रस काव्य प्रभाव अचूक रहे।

20

समिधा सम दुर्गति नष्ट करें, सत पुष्ट करें अति पावन हो।
मन उज्ज्वल हो कर दान सधे, तपनिष्ठ रहें मति पावन हो।
अति दीन मलीन कुलीन बनें, सुविचार दया गति पावन हो।
नर-नारि सदा सम ज्ञान रहें, हर काम-दिशा रति पावन हो।

2 thoughts on “तुम ज्योति शिखा पथ प्रेरक सी – (दुर्मिल सवैया – केवल प्रसाद “सत्यम”) – अंक – 1

  1. अनिल कुमार सोनी August 27, 2016 at 9:25 am

    “उम्दा “

  2. बहुत ही अच्छी रचनाएं

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