जश्न-ए-ग़ज़ल 2015 (प्रथम अंतरराष्ट्रीय ग़ज़ल संगोष्ठी) – इलाहाबाद

आयोजन रिपोर्ट

इलाहाबाद में पिछले दिनों, अक्तूबर 2015 के 10 से 12 तारीख के दरम्यान, ‘अंतरराष्ट्रीय ग़ज़ल अकादमी’ के तत्वावधान में अंजुमन प्रकाशन, इलाहाबाद के सौजन्य से हिन्दुस्तानी अकादमी में ग़ज़ल विधा पर केन्द्रित तीन दिवसीय आयोजन ’जश्न-ए-ग़ज़ल’ सम्पन्न हुआ. ग़ज़ल विधा से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण सिद्धान्तों, विभिन्न मंतव्यों तथा हिन्दी-उर्दू के साथ-साथ अन्य भाषाओं में लिखी जा रही ग़ज़लों के इतिहास, उनकी अवस्था एवं उनके स्वरूप पर विमर्श के लिए आहूत इस तरह का कोई आयोजन कई मायनों में अद्वितीय रहा. ज्ञातव्य है कि ग़ज़ल विधा को लेकर देश में इस तरह का कोई पहली बार प्रयास हो रहा था. ’अंतरराष्ट्रीय ग़ज़ल अकादमी’ में भारत के अलावा पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश तथा भूटान की साहित्यिक समितियाँ सहयोगी हैं जो विशेष रूप से ग़ज़ल विधा को लेकर अपने-अपने देश की भाषाओं में महत्त्वपूर्ण कार्य कर रही हैं. आयोजन में ग़ज़ल विधा के क्षेत्र में समालोचना तथा व्याकरण (अरूज़) के लिए देश के ख्याति प्राप्त राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर के विद्वानों के अलावा नेपाल देश का चार सदस्यीय प्रतिनिधि-मण्डल भी सम्मिलित हुआ. कई अपरिहार्य कारणों से अन्य देशों का प्रतिनिधि-मण्डल अपनी उपस्थिति दर्ज़ नहीं करा सका. ’अंतरराष्ट्रीय ग़ज़ल अकादमी’ की संस्थापना का उद्येश्य काव्य की एक विशिष्ट विधा ग़ज़ल को आवश्यक संरक्षण, संवर्धन एवं प्रोत्साहन देकर इसे सुप्रचारित करना एवं इस हेतु आवश्यक साहित्यिक माहौल बनाना है.

आयोजन का उद्घाटन मुख्य अतिथि उर्दू साहित्य के अंतरराष्ट्रीय स्तर के समालोचक एवं ग़ज़ल विधा के मर्मज्ञ पद्मश्री जनाब शम्सुर्र्हमान फ़ारुक़ी के हाथों सम्पन्न हुआ. दीप-प्रज्ज्वलन में आयोजन के अध्यक्ष जनाब एम.ए. क़दीर तथा मुख्य अतिथि के साथ विशिष्ट अतिथि नेपाली भाषा के मूर्धन्य ग़ज़लकार श्री ज्ञानुवाकर पौडेल तथा श्री आवाज शर्मा थे. इस सत्र में अंजुमन प्रकाशन की अर्द्धवार्षिक पत्रिका ‘अंजुमन’ के साथ-साथ ‘ग़ज़ल की बाबत’ (श्री वीनस केसरी), जा-नशीं अकबर का हूँ मैं (जनाब फ़रमूद इलाहाबादी), ज़िन्दग़ी के साथ चल कर देखिये (जनाब शिज्जू शक़ूर), लफ्ज़ पत्थर हो गये (श्री राकेश दिलबर), मौसम के हवाले से (श्री सुरेश कुमार शेष) तथा साहिल पर सीपियाँ (श्रीमती राजेश कुमारी) पुस्तकों का लोकार्पण मुख्य अतिथि के कर कमलों से हुआ. ‘कहते हैं ग़ज़ल जिसको’ शीर्षक पर गहन वक्तव्य देते हुए जनाब शम्सुर्र्हमान फ़ारुक़ी ने ग़ज़ल के विभिन्न पहलुओं तथा इसकी विशिष्टताओं से यह कहते हुए परिचय कराया कि ‘जिस भाषा में तुक का ख़ज़ाना होगा, तुकान्तता की परिपाटी होगी, उस भाषा में ग़ज़ल हो सकती है’. उन्होंने ग़ज़ल को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने तथा समझने पर बल दिया. इस सत्र का संचालन श्री यश मालवीय ने किया.

दूसरा सत्र जनाब फ़ाज़िल हाशमी के संचालन में प्रारम्भ हुआ. ’उर्दू ग़ज़लग़ोई’ पर जनाब एहतराम इस्लाम तथा डॉ. सुल्तान अहमद ने अपने वक्तव्य दिये. एहतराम साहब ने उर्दू ग़ज़ल के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए इस तथ्य पर ज़ोर दिया कि ग़ज़ल के कथ्य के लिए आज शायद ही कोई विषय अछूता है. हर तरह के कथ्य का शुमार शेर के माध्यम से ग़ज़लों में होता है. डॉ. सुल्तान अहमद ने ग़ज़लों में व्यंजना की संयमित आवश्यकता पर बल देते हुए, अन्यथा शाब्दिक कसरतों से ग़ज़लकारों को बचने की सलाह दी. दोनों विद्वानों ने नये ग़ज़लकारों के लिए ग़ज़ल के व्याकरण के प्रति दृढ़ और उत्तरदायी रहने की आवश्यकता को दुहराया.

तृतीय सत्र का संचालन अजामिल व्यास ने किया. यह सत्र मुख्य रूप से हिन्दी-उर्दू से इतर भाषाओं में हो रही ग़ज़लों पर संकेन्द्रित था. भोजपुरी भाषा में ग़ज़ल विधा के इतिहास एवं वर्तमान में वैधानिक स्थिति पर श्री सौरभ पाण्डेय ने अपना सारगर्भित पर्चा पढ़ा. नेपाली भाषा में ग़ज़ल के इतिहास तथा वर्तमान रूपरेखा पर श्री आवाज शर्मा ने विशद वक्तव्य दिया. पंजाबी भाषा में ग़ज़ल के इतिहास तथा इसके वर्तमान स्वरूप पर श्री योगराज प्रभाकर ने खुल कर प्रकाश डाला. ग़ज़ल विधा एवं इसके व्याकरण को लेकर इन भाषाओं में व्याप गयी अन्यमनस्कता तीनों ही वक्तव्यों का मूल थी. किन्तु, एक बात तीनों ही वक्तव्यों से उभर कर आयी कि इन तीनों ही भाषाओं में ग़ज़ल को लेकर नये-हस्ताक्षर कहीं अधिक सचेत तथा संवेदनशील हैं.

पहले दिन की समाप्ति चौथे सत्र में नशिस्त के आयोजन से हुई जिसमें सभा में उपस्थित ग़ज़लकारों में से कुल 28 ग़ज़लकारों ने ग़ज़ल पाठ किया. इस नशिस्त के अध्यक्ष श्री योगराज प्रभाकर जी थे तथा संचालन श्री राणा प्रताप सिंह ने किया.

आयोजन का पहला दिन जिस संयमित उत्साह से सम्पन्न हुआ वह अभूतपूर्व था. मुख्य अतिथि जनाब फ़ारुक़ी ने प्रथम सत्र में जिस तन्मयता के साथ अपना बीज-वक्तव्य प्रस्तुत किया वह इलाहाबाद के विद्वद्जनों, विशेषकर ग़ज़ल के अरूज़ से वाक़िफ़ श्रोताओं के बीच सुखद चर्चा का विषय रहा. सत्र के सफल समापन पर श्री सौरभ पाण्डेय ने धन्यवाद एवं आभार प्रकट किया.

दूसरे दिन का प्रथम सत्र श्री यश मालवीय के संचालन में प्रारम्भ हुआ. इस सत्र में मुख्य अतिथि सुप्रसिद्ध इतिहासकार तथा वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. लालबहादुर वर्मा थे. डॉ. वर्मा ने ’हिन्दी भाषा में ग़ज़ल की अस्मिता का प्रश्न’ विषय पर ’ग़ज़ल साझा तहज़ीब की नुमाइश करती है’ कहते हुए अपने गहन विचार प्रस्तुत किये. श्री विजय लोहार ने ’हिन्दी ग़ज़ल की पन्थीयधारा’ विषय पर अपना शोधपत्र पढ़ा. हिन्दी भाषाभाषियों के बीच प्रचलित हो रहे ग़ज़ल-विन्यास पर जनाब एहतराम इस्लाम, डॉ. अमिताभ त्रिपाठी तथा श्री धीरेन्द्र शुक्ला ने अपने-अपने विचार रखे. जनाब एहतराम इस्लाम ने इस तथ्य पर ज़ोर दे कर कहा कि ग़ज़ल वस्तुतः ग़ज़ल ही है, चाहे जिस भाषा में कही जाये. डॉ. अमिताभ त्रिपाठी ने भाषायी तौर उर्दू और हिन्दी के लिए कहा कि शाब्दिक अन्तर के अलावा इन दोनों में भाषा-व्याकरण के विचार से कोई अन्तर नहीं है. अतः उर्दू तथा हिन्दी ग़ज़लों के बीच मुख्य अन्तर ’प्रवृति’ का है. श्री धीरेन्द्र शुक्ला ने अपने सारगर्भित वक्तव्य में ग़ज़लकारों को ग़ज़ल की विधा और इसके मूल स्वरूप को स्पष्ट रूप से समझने पर ज़ोर दिया. मुख्य अतिथि डॉ. वर्मा ने प्रस्तुतीकरण में नैसर्गिक सोच को संतुष्ट करने का यह कहते हुए सुझाव दिया, कि, भाषा में दुराग्रह कत्तई आवश्यक नहीं है. अन्य तीनों विचारकों ने ग़ज़ल प्रयासों में अपनायी गयी भाषाओं में शुद्धता तथा स्पष्टता को बरतने को प्रमुख माना.

दूसरे सत्र का संचालन श्री नन्दल हितैषी ने किया. इस सत्र में मुख्य धारा से अलग विषयों पर चर्चा हुई. जहाँ डॉ. मो. आज़म ने मुशायरा के इतिहास पर ज्ञानवर्द्धक वक्तव्य दिया. वहीं जनाब फ़रमूद इलाहाबादी तथा डॉ. असीम पीरज़ादा ने हास्य-व्यंग्य प्रधान ग़ज़लों, जिन्हें ’हज़ल’ कहते हैं, के ऊपर समुचित रौशनी डाली. फ़रमूद इलाहाबादी ने अपने उद्बोधन में कहा कि ’सामाजिक विड़ंबनाओं के विरुद्ध आक्रोश का अतिरेक किसी संवेदनशील मनुष्य को व्यंग्यकार बना देता है’. डॉ. मो. आज़म ने अत्यंत प्रसिद्ध हो चले मुशायरों पर बोलते हुए कहा कि मुशायरों को ग़ज़ल-वाचन की परम्परा से जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिए. डॉ. आज़म के अनुसार मुशायरे का मूल स्वरूप ’कनिष्क’ के ज़माने से प्रचलित ’कवि-सम्मेलनों’ में है. इससे पूर्व डॉ. शहनवाज़ आलम ने ’ग़ज़ल के ग़ालिबतरीन मौजूआत’ विषय पर अपना शोध-पत्र प्रस्तुत किया.

दूसरे दिन की समाप्ति तीसरे सत्र में नशिस्त के आयोजन से हुई, जिसके अध्यक्ष श्री अजामिल व्यास थे तथा संचालन श्री श्लेष गौतम ने किया. कुल तीस ग़ज़लकरों ने अपनी ग़ज़लें प्रस्तुत कीं. आज के सत्रों के समापन पर श्री सौरभ पाण्डेय ने धन्यवाद एवं आभार प्रकट किया.

तीसरे दिन का प्रथम सत्र ६ ग़ज़ल-संग्रहों पर परिचर्चा का था. श्री दीपक रूहानी के संचालन तथा श्री अशोक कुमार सिंह एवं श्री विजय शंकर सिंह के आतिथ्य में दो ग़ज़ल संग्रहों ’मेरी मुट्ठी की रेत’ (श्री अशोक कुमार सिंह) तथा ’समरा’ (जनाब समर कबीर) का लोकार्पण हुआ. ग़ज़ल-संग्रहों पर परिचर्चा के क्रम में श्री यश मालवीय ने ’मेरी मुट्ठी की रेत (डॉ. अशोक कुमार सिंह) तथा ’लफ़्ज़ पत्थर हो गये (श्री राकेश दिलबर) पर अपने विचार रखे. डॉ. रविनन्दन सिंह ने ’ज़िन्दग़ी के साथ चलकर देखिये’ (जनाब शिज्जू शकूर) तथा ’जा-नशीं अकबर का हूँ मैं’ (जनाब फ़रमूद इलाहाबादी) ग़ज़ल-संग्रहों पर चर्चा की. श्री नन्दल हितैषी ने ’मौसम के हवाले से’ (श्री सुरेश कु. शेष) तथा ’साहिल पर सीपियाँ’ (श्रीमती राजेश कुमारी) पुस्तकों पर अपने विचार रखे.

दूसरे सत्र में फ़रहत एहसास तथा डॉ. अहमद महफ़ूज़ ने ’ग़ज़ल और आलोचना’ विषय पर अपने विचार प्रस्तुत किये. फ़रहत एहसास ने अपने सारगर्भित वक्तव्य के माध्यम से ग़ज़ल की बारीकियों की ओर श्रोताओं का ध्यान खींचा – ’इस सिम्फ़ में कोई जादू तो है. शाइर एक माहौल रचता है और अपने हिसाब से लफ़्ज़ चुन कर अपने ख़यालों को पन्नों पर उतार देता है.’ इस सत्र के संचालन का दायित्व भी श्री दीपक रूहानी पर था.

तीसरे सत्र में ’इल्मे अरूज़’ पर परिचर्चा हुई. जिसमें प्रो. अहमद महफ़ूज़, डॉ. सुल्तान अहमद तथा डॉ. मो. आज़म ने अपने विचार प्रस्तुत किये. सत्र का संचालन मारुफ़ रायबरेलवी ने किया. डॉ. अहमद महफ़ूज़ ने इस बात को विशेष तौरपर रेखांकित किया कि ग़ज़ल के व्याकरण को लेकर इस तरह का कोई आयोजन पहली बार सम्भव हो रहा है, जहाँ ग़ज़ल से सम्बन्धित लगभग हर विन्दु पर इतनी खुल कर चर्चा हुई है. डॉ. आज़म ने कहा कि अरूज़ और ग़ज़ल की भाषा को लेकर हुआ इतना गंभीर प्रयास हर तरह से श्लाघनीय है. डॉ. आज़म ने इस तरह के आयोजन-प्रयास के परिप्रेक्ष्य में ’उस्ताद-शाग़िर्द’ की परम्परा को आज के संदर्भ में पुनः संभव हुआ महसूस किया. तीसरे दिन का आयोजन चौथे सत्र की नशिस्त से सम्पन्न हुआ जिसमें लगभग तीस ग़ज़लकारों ने अपनी-अपनी ग़ज़लें प्रस्तुत कीं. नशिस्त की सदारत कर रहे जनाब फ़रहत अहसास की ग़ज़लों से श्रोता और विद्वद्जन अश-अश कर उठे. फ़रहत साहब रूह और जिस्म के अंतरसम्बन्धों के माध्यम से आज के संदर्भों को अपनी ग़ज़लों में सफलतापूर्वक रूपायित करते हैं. ग़ज़लकारों की मधुर प्रस्तुतियों की फुहारों से सुधी-श्रोता देर रात गये तर-ब-तर होते रहे.

तीन दिनों तक अंतरराष्ट्रीय स्तर के माहौल में इस अत्यंत विशिष्ट आयोजन का क्रियान्वयन एवं संचालन स्पष्टतः विन्दुवत प्रयास की मांग करता था. अपने उद्येश्य में सफल तीन दिवसीय आयोजन ’जश्न-ए-ग़ज़ल’ को ग़ज़ल के अरूज़ और ग़ज़ल-समालोचना पर गंभीर परिचर्चा की परम्परा को प्रारम्भ करने का श्रेय तो जाता ही है, इस आयोजन का शुमार ग़ज़ल के इतिहास में एक विशिष्ट घटना के रूप में भी दर्ज़ होगा, इसमें शक़ नहीं है. संगोष्ठी में सम्मिलित सदस्यों व अतिथियों को प्रतीक चिन्ह व प्रमाण पत्र प्रदान किया गया. स्वादिष्ट भोजन तथा ट्रांसपोर्टेशन की सुव्यवस्था तथा अंजुमन प्रकाशन की पुस्तकों का उत्साहजनक विक्रय इस आयोजन की सफलता का एक अलग ही स्वरूप प्रस्तुत करता है. ’अंतरराष्ट्रीय ग़ज़ल अकादमी’ के तत्त्वाधान में सम्पन्न हुआ ग़ज़ल की विधा और शिल्प को ले कर यह गंभीर प्रयास आने वाले दिनों के लिए महती आशाएँ जगाता है. ग़ज़ल की विधा और इसके व्याकरण को ले कर हुए इस सद्प्रयास के लिए आयोजक अंजुमन प्रकाशन के प्रोपराईटर श्री वीनस केसरी तथा उनकी टीम को उपस्थित विद्वद्वक्ताओं तथा भारत के विभिन्न शहरों से आये सुधी-श्रोताओं ने मुखर बधाइयाँ तथा शुभकामनाएँ दीं. टीम के सभी सदस्यों को उनके तत्पर योगदान के लिए जनाब फ़रहत एहसास के हाथों विशेष तौर पर सम्मानित किया गया.

प्रस्तुति -सौरभ पाण्डेय

एम-2/ ए-17, ए.डी.ए. कॉलोनी, नैनी, इलाहाबाद-211008 (उप्र)  सम्पर्क : +91-9919889911

आयोजन के बारे में अधिक जानने के लिए जश्ने-ग़ज़ल की वेबसाईट देखें – www.jashneghazal.com