gulab singh

सात गीत – गुलाब सिंह (अंक – 3)

५ जनवरी, १९४० को इलाहाबाद जनपद के बिगहनी गांव में जन्म हुआ। जन्मतिथि के द्वन्द्व के कारण जन्म कुण्डली से भी अपरिचित ही रह गये। नौकरी के कारण ५ जनवरी, १९४० का दिन ही सनद हो गया और वक्त पर काम आ रहा है। यहां-वहां गये लेकिन गांव के ही होकर रह गये। किसी ने ’’ग्राम्य जीवन का विशिष्ट नवगीत‘‘ कहा तो गांव के और भी आभारी हुए।
संपर्क सूत्र : ग्राम – बिगहनी, पो. – बिगहना,
इलाहाबाद – 212305
मोबाइल – 9936379937

मैं गुलाब हूँ
मैं गुलाब हूँ
घिरा हुआ काँटों से
सद्भावी सुगन्ध पैâलाता।
मेरा रंग
रक्त से मिलता
देशज हूँ
मिट्टी में खिलता
शब्दों की
सपुटित कली से
अर्थों की पंखड़ी बिछाता।

आरेदार पत्तियाँ
व्यंजित
गुलदस्ते भावों की
प्रस्तुति
गजरों का
सत्यम् शिव सुन्दर
हर सहृदय का
कण्ठ सजाता।

पत्तों पंखड़ियों
के रेशे
गुण प्रभाव
सुरभित संदेशे
कविता की क्यारी
उपवन से
पूâले अनपूâले का नाता।
शोख सुघर
अथवा मुरझाया
व्यक्त हुआ
कुछ रहा अगाया
हरी जड़ों से
पुनर्पल्लवित
रचनाक्रम अटूट रह जाता।

ज्योति की उद्भावना
स्वाति बरसे
या न बरसे
टेरता रहता पपीहा
पी कहाँ !

सच नहीं मरता
कभी मिटती नहीं संभावना
घुप अंधेरे में ही होती
ज्योति की उद्भावना
जो स्वयं से दूर रहता
छानता सारा जहाँ।

सुन के पारस की कहानी
जुटा कर लोहा रखा
स्वाद िंपजरे का सदा
सोने की चिड़िया ने चखा
चमक का पीछा न छूटा
कुछ ने रोका बारहाँ।

सूर्य का रथ एक पहिए का
अर्हिनश चल रहा
सात घोड़ों की विषमता
पर सफर अविकल रहा
हम तो अंधी दौड़ में
दौड़े यहाँ भागे वहाँ।
चारों तरफ डायनासोर

मन चाहा
आकार न लेता
चाहे जितना
समय तराशो !
मनुष्यता की
ना़जुक डोर
चारों तरफ
डायनासोर
पैâला जबड़ा
आतंको का
अर्थहीन रामायण रासो।
इतिहासों का
पहने जामा
सुनते तुम
वास्को डिगामा
अन्तरीप
उत्तम आशा का
कहाँ खो गया
उसे तलाशो !
मानव अपना
स्वत्व न ढोता
केवल आकृति से
क्या होता
लिए तूलिका
आहें भरते
इन्हें देखते
अगर `पिकासो’।

कीमत आदमी की

मुर्ग की ़कीमत
दो सौ रूपये
और आदमी की
दो रोटी।

हर रोटी का बीच
खा गए रोटी वाले
सूखे हुए किनारे पेंâक के
बोले – अबे उठा ले साले
टुकड़ा-टुकड़ा बिखरा
जैसे उतरा
टेढ़े मुँह का चाँद
डेढ़हाथ आकाश
टूट कर गिरा
कि पैâली नीली धोती।

पुल के नीचे की बस्ती से
जब तक नदी दूर रहती है
थूथन घिसते सुअर
पास में औरत
बटलोई घिसती है
अगल-बगल
लटके रहते दो स्तनपायी
यह बस्ती अक्सर जन्माती
जुड़वाँ भाई
खुशहाली का ग्राफ
दौड़ता पुल के ऊपर
सुबह सुहानी
और शाम भी जगमग होती।

भीड़ ने कहा

चीकट की पर्तों में
रोटी का टुकड़ा
भीड़ ने कहा–
लेकिन है लजी़ज मुखड़ा।

ये आँखे सामाजिक
दृष्टिकोण हेतुक
तर्वâ या विचारों की
सरणियां अलौकिक
प्रतिमा भर पूजन
पहाड़ों भर दुख:।

चाहत का रम्य राग
प्यार की मोटी किताब
भरी गोद में भविष्य
चुनरी में लगा दाग
वंâधों पर बैठा घर
किस कारण उजड़ा !

जंजीरें खनकीं
उठ गिरती `मधुबाला’
प्रतिबन्धों पर लटका
और एक ताला
हाथ रहा बंधा सदा
पांव रहा उखड़ा
भीड़े ने कहा–
लेकिन है लजी़ज मुखड़ा।

वनवासी
महुए के पात चुने
पत्तलें बनार्इं
औरों को थाली दी
भूखी घर आई।

जात वनवासी की
जीवन वनवास का
अंगुली में दर्द सदा
गड़ी हुई फांस का
कितना तन ढक पाती
पेड़ की कमाई।

जंगल के महाराजा
फटे बांस का बाजा
पैर पटक पार पर
कहते बादल आजा
आँखों की नदिया से
रेत भरभराई।

पेड़ों से यारी
पहाड़ी रिश्तेदारी
जाने क्या चिल्लाता
भोंपू सरकारी
सुन सुन कर कान पके
समझ नहीं आई।

टिके पांव
महुए की गुठली-सी आँखें
धूल भरी काया पथराई
हाथों में लकड़ी के टुकड़े
पाँव लगी पोखर की काई

आधी जाँघें
आधा स्तन खुला हुआ
बसन दयामय दुनियां का
सभ्यता शिखर पर
धुला हुआ

हर फिसलन से पाँव बचाती
देती जाती राम दुहाई।
सूनी राह
साँझ का झुटपुट
कुत्ते पीछा करते
कण्ठीदार पुराने तोते
कच्चा आम कुतरते
रात ढले सीटियां बजाते
नवकुल धर्मी और कसाई।

 

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