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आलेख : हिंदी-ग़ज़ल की अस्मिता का प्रश्न – डॉ. गिरिराज शरण अग्रवाल (अंक – 3)

हिंदी ग़ज़ल की अस्मिता का प्रश्न। यानी हिंदी ग़ज़ल के अस्तित्व का प्रश्न। हिंदी ग़ज़ल की सत्ता का प्रश्न, उसके महत्त्व का प्रश्न। अस्मिता का अर्थ ही है वह भाव या मनोवृत्ति कि मेरी एक पृथक और विशिष्ट सत्ता है। इस प्रश्न पर मन में थोड़ा असमंजस रहा तो सोचा कि क्यों न फिर से अस्मिता के शाब्दिक अर्थों को देख लिया जाए। शब्दकोश में पाया ‘द्रष्टा और दर्शन शक्ति को एक मानना या पुरुष; आत्मा और बुद्धि में अभेद मानने की भ्रांति; योग, अहंकार, मोह, भ्रम आदि।’ समांतर कोश ने बताया ‘व्यक्तित्व, अपनत्व, अपना अनोखापन, अलग पहचान, असामान्यता, आपा, ख़ासियत, ख़ुसूसियत, निजी विशेषता, मौलिकता आदि।
हिंदी ग़ज़ल के साथ इन अर्थों को जोड़कर देखना चाहा तो सुई मूलतः ग़ज़ल पर ही जा अटकी। ग़ज़ल भले ही परंपरागत रूप से अरबी- फ़ारसी की देन रही हो, लेकिन हिंदी-साहित्य की एक सशक्त विधा के रूप में आज ग़ज़ल स्थापित हो चुकी है।
भारतीय काव्य की सभी विधाओं में आज ग़ज़ल पर्याप्त महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर चुकी है। वास्तव में ग़ज़ल ऐसी रसपूर्ण और कोमल काव्य- शैली है, जिसका सौंदर्य सभी प्रकार के पाठकों और श्रोताओं को अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। आज ग़ज़ल शोध-संगोष्ठियों से लेकर कवि-सम्मेलनों तक की शोभा बनी हुई है। विगत चार दशकों में हिंदी-काव्य में ग़ज़ल ने अपनी ख़ासी पहचान बनाई है। अभी तक यह धारणा बनी हुई थी कि ग़ज़ल का सृजन केवल उर्दू में ही संभव है, लेकिन हिंदी-ग़ज़लकारों ने हिंदी में ग़ज़ल लिखकर इस धारणा का खंडन कर दिया है। आज हिंदी-ग़ज़ल अपनी विकास-यात्रा में परिपक्वता प्राप्त कर चुकी है। हिंदी-ग़ज़ल अब समीक्षकों और लेखकों के लिए तर्क-वितर्क, आलोचना और प्रत्यालोचना का विषय बनी हुई है। हम भली प्रकार जानते हैं कि ग़ज़ल ने जन्म भले ही ईरान में लिया हो, किंतु पोषित हिंदुस्तान में ही हुई है।
अरबी भाषा से ग़ज़ल फ़ारसी में आई। फ़ारसी से ग़ज़ल उर्दू में आई। उर्दू के कवियों ने ग़ज़ल के फ़ारसी स्वरूप को स्वीकार किया। उर्दू की ग़ज़लों में सूक्ष्म तथा स्थूल दोनों प्रकार के प्रेम की अभिव्यक्ति हुई, इसी कारण उर्दू में ग़ज़ल ने फ़ारसी से अधिक लोकप्रियता प्राप्त की।
उर्दू से होती हुई ग़ज़ल हिंदी भाषा में आई। अमीर ख़ुसरो, कबीर तथा भारतेंदु हरिश्चंद्र आदि ने इस विधा में जो कुछ लिखा, उसे ग़ज़ल नाम ही दिया। भारतेन्दु युग मिर्ज़ा ़गालिब के तुरंत बाद का समय है। मि़र्जा ़गालिब का युग उर्दू-ग़ज़ल का स्वर्णयुग था।
अब ग़ज़ल धीरे-धीरे हिंदी में भी एक सशक्त विधा के रूप में स्थापित होती जा रही है। छांदिक दृष्टि से उर्दू-ग़ज़ल और हिंदी-ग़ज़ल का स्वरूप समान है, किंतु भाव की दृष्टि से दोनों में पर्याप्त अंतर है। हिंदी-ग़ज़ल समसामयिक विषयों को लेकर चली है और महफ़िलों से निकलकर जनचेतना से जुड़ी है। इसमें वर्तमान परिस्थितियों में जी रहे आदमी की पीड़ा और समस्याओं को स्वर मिला है। वस्तुत: हिंदी-ग़ज़ल आज के जन-जीवन को ठीक-ठीक अभिव्यक्त करने का माध्यम बन गई है। उसका शिल्प निरंतर सजता और सँवरता रहा है और उसमें परंपरागत ग़ज़ल की अपेक्षा अनेक नवीनताओं का प्रवेश हुआ है।
अस्तु, शिल्प-विधान की दृष्टि से हिंदी-ग़ज़ल, उर्दू-ग़ज़ल के काफ़ी निकट है। कथ्य की दृष्टि से इसने नवीन मार्ग का चयन कर आम आदमी के जीवन को अंगीकार किया है। समसामयिक परिवेश ने इसमें प्रमुखता प्राप्त की है।
हिंदी-ग़ज़ल ने भाव, भाषा, शिल्प आदि सभी दृष्टियों से अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं। प्रारंभ में हिंदी-ग़ज़लों की भाषा ब्रजभाषा से प्रभावित थी। धीरे-धीरे खड़ीबोली हिंदी मिश्रित भाषा में ग़ज़लें लिखी जाने लगीं। छायावादी युग में विशुद्ध हिंदी में ग़ज़लें लिखी गईं। वर्तमान में सामान्य बोलचाल की भाषा में ग़ज़लें रची जा रही हैं, फिर उसमें चाहे अरबी-फ़ारसी के शब्द हों या अँगे्रज़ी के। भाव और कथ्य की दृष्टि से भी हिंदी-ग़ज़ल में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं।
सन् १९६०ई. के बाद का समय हिंदी-ग़ज़ल के इतिहास में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इस कालखंड में हिंदी-ग़ज़लकारों ने व्यापकता और गहनता के साथ वर्तमान परिवेश का चित्रण किया है। हिंदी-ग़ज़लों में संपूर्ण सामाजिक, र्धािमक, र्आिथक, राजनीतिक परिवेश मुखरित हुआ है। उसमें बिखरते मानवीय मूल्यों, राजनीतिक विद्रूपताओं, सांप्रदायि-कता, अलगाववाद, आतंकवाद, संवेदनहीनता के साथ-साथ प्रेम की भी अभिव्यक्ति हुई है। इस प्रकार वर्तमान हिंदी-ग़ज़ल बहुआयामी हो गई है। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि हिंदी-ग़ज़लों में भी उन सब अनिवार्यताओं का निर्वाह किया गया है, जो उर्दू-फ़ारसी ग़ज़लों के लिए सुनिश्चित हैं।
आज ग़ज़ल के प्रति बढ़ती असाधारण रुचि ने न केवल हिंदी-ग़ज़लकारों वरन् ग़ज़ल के श्रोताओं और पाठकों की संख्या में भी वृद्धि की है। वैसे तो साठोत्तरी हिंदी-ग़ज़ल के प्रतिनिधि ग़ज़लकारों की बहुत लंबी सूची है, परंतु प्रमुख हिंदी-ग़ज़लकारों की चर्चा करें तो निम्नलिखित नामों का उल्लेख अनिवार्य होगा –
रामेश्वर शुक्ल अंचल, नरेंद्र शर्मा, हरिकृष्ण प्रेमी, जानकी वल्लभ शास्त्री, बलवीर सिंह रंग, बालस्वरूप राही, शिशुपाल सिंह शिशु, त्रिलोचन शास्त्री, दुष्यंत कुमार, गोपालदास नीरज, कुंअर बेचैन, उर्मिलेश, चंद्रसेन विराट, शेरजंग गर्ग, माधव कौशिक।
दुष्यंतकुमार त्यागी ने हिंदी-ग़ज़ल को रूमानियत से निकालकर आम आदमी के सुख-दुःख एवं मानवीय संवदेनाओं से जोड़ा। बिलखते भूखे बच्चों, ़गरीबों की पीड़ा, दूषित राजनीति, सामाजिक प्रदूषण, बढ़ती भीड़ के बावजूद अकेलापन, आतंकवाद और अलगाववाद, क्षीण होती मानवीय संवेदनाएँ, सिमटते मानवीय संबंध, हिंदी-ग़ज़ल के विषय बन गए। हिंदी-ग़ज़ल के व्यापक आयामों की चर्चा करते हुए मैंने कहा था-
‘हिंदी-ग़ज़ल का आँगन बहुत विस्तृत हुआ है, उसके विषयों में विविधता आई है और वह जीवन और समाज के अधिक-से-अधिक पहलुओं को समेटने में सफल हुई है। गाँव से लेकर नगर और नगर से लेकर महानगर तक सब कुछ उसके क्षेत्र में आ गया है। सामाजिक संदर्भों से लेकर राजनीतिक दृष्टिकोण तक तथा व्यक्तिगत रिश्तों से लेकर पारिवारिक संबंधों तक इसका दायरा विस्तृत हुआ है।’ २
ग़ज़ल को सामाजिक संदर्भों से जोड़ने का यह पहलू सकारात्मक रहा है, और उसी के कारण ग़ज़ल को प्रेम, वियोग, व्यक्तिगत पीड़ा, मिलन और जुदाई जैसे सीमित दायरे वाले विषयों से बाहर निकालकर, मानव-जीवन के व्यापक धरातल पर उतारा जा सका है। हिंदी-ग़ज़लकार यथार्थ के धरातल पर युग की पीड़ा को भोगकर ग़ज़ल कहता है। हिंदी-ग़ज़लों में मानवमूल्यों के विघटन का चित्रण इस उद्देश्य से किया गया है कि मनुष्य इन मूल्यों को विघटित होने से बचाए और मानवता को पुनस्र्थापित करने का प्रयास करे।
हिंदी के प्रतिनिधि ग़ज़लकारों ने व्यापकता और गहनता के साथ सामाजिक यथार्थ का चित्रण किया है। इन ग़ज़लकारों ने अपनी ग़ज़लों के माध्यम से संपूर्ण समाज की पीड़ा को वाणी प्रदान की।
हिंदी-ग़ज़लकारों ने अन्याय, अनैतिकता और शोषण के सामने अपना सिर नहीं झुकाया। उन्होंने जनता की आवाज़ और उसके विद्रोह को कविता के माध्यम से शासन-तंत्र तक पहुँचाया। अन्याय देखकर चुप रहना कवि को अपने कवि-धर्म के विपरीत लगता है। कवि दुष्यंत कुमार के शब्दों में यही सच्चाई व्यक्त हुई है-
मुझमें रहते हैं करोड़ों लोग चुप केसै रहूँ,
हर ग़ज़ल अब सल्तनत के नाम एक बयान है।
राजनीतिक भ्रष्टाचार के कारण समाज में व्याप्त अव्यवस्थाओं को देखकर हिंदी-ग़ज़लकारों ने पूरी ईमानदारी से कहा है कि यदि ऐसा ही रहा तो एक दिन फिर से क्रांति आएगी। इतिहास अपने आपको फिर दोहराएगा और इस विद्रोह के बाद सब-कुछ पुन: व्यवस्थित हो जाएगा। इस तथ्य को विभिन्न ग़ज़लकारों ने अपने तरीके से अभिव्यक्ति दी है। श्री माधव कौशिक कहते हैं –
जिस दिन सूरज बदला लेगा ख़ौफ़नाक अँधियारों से,
उस दिन चीख़ सुनाई देगी सत्ता की दीवारों से।
डॉ॰ कुँअर बेचैन कहते हैं-
जरा सोचो कि मुँह तक रोटियाँ क्यों आ नहीं पार्इं,
तुम्हारी ही कलाई में कहीं कुछ गड़बड़ी होगी।
आजादी के सात दशक पूरे होने को हैं, किंतु राजनीति इस स्तर पर पहँुच चुकी है कि राजनीतिज्ञों पर भरोसा नहीं किया जा सकता। बार-बार के कटु अनुभवों और नेताओं के बेनक़ाब चेहरे देखकर देशवासियों ने राष्ट्रोत्थान के सपने देखने छोड़ दिए हैं।
इसी कारण हिंदी ग़ज़लकारों ने राजनीतिक विसंगतियों, भारतीय लोकतंत्र के बिगड़ते स्वरूप, संसद में मर्यादा-हनन, चुनाव में अपराधियों के इशारे पर धनबल एवं बाहुबल के प्रयोग, राजनीतिज्ञों एवं नौकरशाही के स्वार्थपूर्ण संबंध तथा राजनीतिक भ्रष्टाचार को अपनी ग़ज़लों के माध्यम से सुंदरतम अभिव्यक्ति देने का प्रयास किया है। प्रतीकों के साथ-साथ लाक्षणिक अभिव्यंजना के द्वारा ग़ज़लकारों ने अनेक स्थानों पर राजनीतिक विषमताओं पर करारी चोट की है।
प्रारंभ में उर्दू-ग़ज़ल की भाँति हिंदी-ग़ज़ल का रुझान भी प्राय: सकारात्मक कम और नकारात्मक अधिक रहा है। उर्दू-ग़ज़ल के बारे में तो यह स्पष्ट है कि उसका पालन-पोषण जिन सामाजिक एवं राजनीतिक परिस्थितियों में हुआ, वे पतनशील सामंती संस्कृति का दबाव झेलने वाली परिस्थितियाँ थीं, किंतु हिंदी-ग़ज़ल का सर्वाधिक विकास स्वतंत्रता के बाद हुआ। प्रश्न उठना स्वाभाविक है तो फिर हिंदी-ग़ज़ल का रुझान उर्दू-ग़ज़ल की भाँति नकारात्मक क्यों है? यहाँ तक कि दुष्यंतकुमार की ग़ज़लों में व्यंग्य का तीखापन तो आया, किंतु उनकी सोच में भी उस हद तक सकारात्मकता नहीं आ पाई, जिस हद तक आनी चाहिए थी। इस स्थिति के पीछे यह तर्वâ दिया जाता रहा है कि आज वातावरण में निराशा, भय और शंका जैसे नकारात्मक तत्त्व विद्यमान हैं, इसीलिए हिंदी-ग़ज़लों में भी इन्हीं नकारात्मक तत्त्वों की अभिव्यक्ति अधिक हुई है। प्रश्न यह भी उठता है कि क्या रचनाकार का रचना-धर्म केवल इतना ही है कि वह अपनी रचना के माध्यम से युगीन निराशापूर्ण परिवेश की ओर इंगित करे? क्या इससे आगे बढ़कर उसे आशावादी दृष्टिकोण के माध्यम से समस्याओं से जूझने के लिए व्यक्ति को प्रेरित नहीं करना चाहिए? इस संदर्भ में मेरा मत है ‘यदि रचनाकार ऐसा अनुभव करता है कि उसके रचनात्मक दायित्व में समाज को सकारात्मक दिशा देने की भावना भी सम्मिलित है, तो निस्संदेह उसकी दृष्टि ऐसे दृश्यों एवं अनुभवों पर भी अवश्य पड़ेगी, जो पाठक की सोच को जीवन की बेहतर संभावनाओं की तरफ़ ले जाने वाले हों। यहाँ प्रश्न किसी रचनाकार पर विचारधारा को थोपने का नहीं है, जीवन के विशालतम क्षितिज पर छाए अंधकार और प्रकाश का समान रूप से अध्ययन करने और उसे अभिव्यक्ति देने का है।’
जीवन में चाहे जितने संकट आ जाएँ, परंतु मनुष्य को न तो निराश होना चहिए और न ही कभी हार स्वीकार करनी चाहिए। मनुष्य यदि हँसता-हँसाता रहे तो सारे मानसिक तनाव समाप्त हो जाते हैं। ज़रा-सी रोशनी के आगे घने-से-घना अँधेरा भी भाग खड़ा होता है। हिंदी-ग़ज़लकार माहेश्वर तिवारी की ग़ज़ल के इन शेरों में आशावादी दृष्टिकोण के दर्शन होते हैं –
यह तनावों की जमी चट्टान खिसकेगी ़जरूर
आप थोड़ी देर को ही खिलखिलाकर दोखिए
दुष्यंतकुमार की ग़ज़ल के ये शेर मजबूत इरादे वाले व्यक्ति को अँधेरी रात के बाद स्वह्वणम प्रभात का भरोसा दिलाते हैं
इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है
एक चिन्गारी कहीं से ढूँढ़ लाओ दोस्तों
इस दिये में तेल से भीगी हुई बाती तो है
एक चादर साँझ ने सारे नगर पर डाल दी
यह अँधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है
अकेले चलते-चलते रास्ते में यदि कोई विश्वस्त साथी मिल जाए, तो राह आसान हो जाती है। इतिहास गवाह है कि मिल-जुलकर आदमी ने बड़े-से-बड़े काम किए हैं। हिंदी-ग़ज़लकार चिरंजीत का निम्न शेर द्रष्टव्य है –
तुम्हारे ही लिए अब तक रुका हूँ राह में, साथी,
जहाँ मिल जाएॅँगे हम-तुम, वही मंज़िल हमारी है।
व्यक्ति को हर स्थिति में आशावादी होना चाहिए। सुनसान जंगल में भी प्रेम का एक आशियाँ बनाने की उसके अंदर हिम्मत होनी चाहिए और ईष्र्या, द्वेष तथा घृणा के सागर में भी उसे प्यार के मोती तलाशने के लिए तत्पर रहना चाहिए। विनोद तिवारी के निम्न शेर निराश व्यक्ति के मन में भी आशा का संचार करते हैं –
इस बियाबान में एक घर ढूँढिए,
घर की छत के लिए एक सर ढूँढिए।
प्यार का कोई नन्हा-सा मोती भी हो,
नफ़रतों के समुंदर में गर ढूँढिए।
‘हिंदी-ग़ज़ल में आशावाद के स्वरों को अनेक स्थानों पर सटीक अभिव्यक्ति मिली है। परिणाम के रूप में भले ही यह आशावाद बहुत अधिक नहीं हैं, किंतु जहाँ-जहाँ आशावादिता को स्थान मिला है, वहाँ-वहाँ यह पूरी परिपक्वता के साथ घनघोर निराशा में भी आशा की किरण जगाने और नकारात्मकता के स्थान पर सकारात्मक दृष्टिकोण को मजबूत करने में अत्यंत सफल रही है। यद्यपि साठोत्तरी हिंदी-ग़ज़लकारों ने अपने समय की विसंगतियों, विडंबनाओं, शोषण, अत्याचार, मूल्यहीनता, पाखंड, कुंठा, संत्रास और भय आदि सभी युग-प्रसंगों का समावेश किया है, तथापि इनमें अनेक ऐसे ग़ज़लकार हैं, जो अपनी ग़ज़लों के माध्यम से सभी विसंगतियों के ख़िलाफ़, मानव के अंदर छिपी शक्ति को जगाते हैं और सतत् संघर्ष करने को प्रेरित करते हैं।’
आशावाद की पोषक हिंदी की ग़ज़लें जीवन का मार्ग प्रशस्त करती हैं, नई राह पर चलना सिखाती हैं और भटकाव की स्थितियों से हटाकर सचेत भी करती हैं। ये ग़ज़लें सकारात्मक सोच की ग़ज़लें हैं। ये ग़ज़लें व्यक्ति को हौसला देती हैं, निराशा के क्षणों में आशा का संचार करती हैं, गहन अंधकार में एक नई रोशनी बनकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराती हैं और प्रगति के पथ पर गतिमान रहने की शक्ति एवं ऊर्जा देती हैं।
हिंदी-ग़ज़ल ने नैतिक और सांस्कृतिक स्तर पर आए हर उस परिवर्तन को अभिव्यक्ति प्रदान की है, जिसने मानव-जीवन एवं समाज को अत्यधिक प्रभावित किया है। हिंदी-ग़ज़लकारों ने नैतिक मूल्यों के हस और विसंगतियों को बहुत ही र्मािमकता के साथ अपनी ग़ज़लों में अभिव्यक्त किया है। इन ग़ज़लकारों ने मानव के नैतिक पतन की स्थिति को प्रत्येक दृष्टिकोण से जाँचा, परखा और अपने-अपने ढंग से उसे न केवल अभिव्यक्त किया, वरन् मिटते जा रहे सांस्कृतिक एवं नैतिक मूल्यों की पुनस्र्थापना के लिए प्रेरित भी किया है।

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