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चार हजल – फ़रमूद इलाहाबादी (अंक – 3)

 फ़रमूद इलाहाबादी
जन्म – १० फरवरी १९५६

शिक्षा – इंजीनिरिंग इन इलेक्ट्रानिक्स
सम्प्रति दूरदर्शन केन्द्र में इंजीनियर
संपर्क – ७४/१, नया पुरा, करेली, इलाहाबाद – २११०१६
मोबाइल ९४१५९६६४९७


का़ग़ज

थोबड़ा पोंछ के उसने जो गिराया का़ग़ज
हमने सौ बार वो आँखों से लगाया का़ग़ज'

सि़र्फ रिश्वत के न मिलने से बड़े बाबू ने
यार द़फ्तर में कई रो़ज घुमाया का़ग़ज

हाए, जितने भी ऱकीबों को लिखे खत उसने
‘पैड’ से मेरे ही हर बार चुराया का़ग़ज

अपनी तऩख्वाह बचाती है, मेरी खर्च करे
उसका पैसा हो तो पैसा है, पराया का़ग़ज

इसकी ईजाद कहाँ, किसने करी पहली पहल
चीन वालों ने, सुना है कि बनाया का़ग़ज

आर.टी.आई. में सौ बार जमा की अ़र्जी
आज तक लौट के इक बार न आया का़ग़ज

रात कमरे में पड़ोसन के, जो कल पेंâका था
सुब्ह, कमब़ख्त ने बेगम को दिखाया का़ग़़ज

अब के

पड़ी वो लात कि टेढ़ी हुई कमर अब के
कुछ और स़ख्त हुआ दर्द का स़फर अब के

करी जो रात में तू ने खटर-पटर अब के
तो हस्पताल में होगी तेरी सहर अब के

अवाम हो गए दंगों से बा-़खबर अब के
चली न मुल्क में पहली सी वो लहर अब के

भ्रष्टाचार हो, मँहगाई हो कि कालाधन
ये हूल पैतरे सारे थे बे-असर अब के

पटी-पटाई ने आख़िर मुझे ही पीट दिया
लगी ऱकीब की शायद बुरी ऩजर अब के

न जाने कौन से रस्ते से आ गया था अदू
हर एक राह मै खोलवाऊँगा गटर अब के

झटक ले कौन कुड़ी कब ये ऐतबार नहीं
करूँगा अ़क्द मैं ़फौरन से पेशतर अब के

य़कीन कीजिए फरमूद लव जेहादी है
तभी तो नाम है ‘प्रमोद’ ‘कार्ड’ पर अब के

न मैं कर सका न वो

डरपोकियों सा प्यार न मैं कर सका न वो
छुप कर कभी शिकार, न मैं कर सका न वो

कुछ भी किया कभी भी किया, सामने किया
पीछे से कोई वार न मैं कर सका न वो

फौरन हिसाब सा़फ किया टालते नहीं
बोसा कभी उधार न मैं कर सका न वो

मंगनी हुई फरार हुए एक साथ हम
शादी का इन्ते़जार न मैं कर सका न वो

पकड़े गये पिटायी हुई दर्द सह लिया
इमदाद की गुहार न मैं कर सका न वो

पारा तो एक सौ से ़िजयादा चढ़ा रहा
कम इश़्क का बु़खार न मैं कर सका न वो

हम लोग वा़कई में किसी काम में नहीं
कहते हैं बार-बार न मैं कर सका न वो

फरमूद खाँ सुनो ये हँसाने की बात है
अपनी हदों को पार न मैं कर सका न वो

कुछ नहीं हुआ

फरयाद का हमारी, असर कुछ नहीं हुआ
चिल्लाए थे, बचाव, मगर कुछ नहीं हुआ

बोली मुहल्ले वालों से कल रात अहलिया 
पीछे की सम्त जाओ, इधर कुछ नहीं हुआ

पट्टी बँधी है आँख पे कोल्हू के बैल सी
‘रस्ते हुए तमाम, स़फर कुछ नहीं हुआ’

बरसों से कह रही हो कि अब्बा बनाओगी
अब  खैरियत नहीं है, अगर कुछ नहीं हुआ

पूछा, बताओ चोट कहाँ किस तरह लगी
कहने लगी घुमा के ऩजर, कुछ नही हुआ

भागी थी अहलिया तो रपट भी लिखाई थी
अ़खबार में छपाई खबर कुछ नहीं हुआ

अब भी अदालतों में हैं लाखों मु़कद्दमें
निकले ये `फास्ट ट्रैक' लचर कुछ नहीं हुआ

होना तो यह था शह्र भी होते हरे-भरे
क़ाग़ज पे ही लगाए शजर कुछ नहीं हुआ

 

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