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पांच ग़ज़लें – एहतराम इस्लाम – अंक-1

एहतराम इस्लाम हिन्दी और उर्दू  ज़बानों के बीच थरथराते एक ऐसे पुल का नाम है, जो बड़े स्तर पर हमारे समय और समाज को पिछले लगभग साढ़े तीन दशकों से जोड़ने का काम करता रहा है। भाषाई सौहाद्र्र, धर्म निरपेक्ष भंगिमा, हिन्दुस्तानी लबो-लहजा, निथरी हुयी पारदर्शी जीवन दृष्टि, कथ्य और शिल्प का सामन्जस्य सहेजते इस ग़ज़लकार ने समकालीन ग़ज़ल लेखन को जो चेहरा दिया है वह आज की कविता का वह चेहरा है जिसने जन संवाद स्थापित करते आम आदमी को वक्त के आईने में अपने आप को भली-भाँति पहचान लेने की सलाहियत अता की है। बड़ा रचनाकार वो ही नहीं होता जो बड़ी रचनाएँ देता है, बड़ा रचनाकार वो भी होता है जो रचनाकारों की एक पूरी की पूरी पीढ़ी तैयार कर देता है। एहतराम भाई ने ब़खूबी इन दोनों काम को अंजाम दिया है। आज देश भर में उन्हें मॉडल बना कर ग़ज़लें कहने वालों की एक अच्छी खासी तादाद दिखायी देती है। इस अर्थ में वह दुष्यंत कुमार के ही एक सहयात्री के रूप में मंज़रे-आम पर अपनी उपस्थिति द़र्ज कराते हैं। ‘साये में धूप’ की तरह ही उनके संग्रह ‘है तो है’ के अशआर भी एक मुहावरा बन चुके हैं, जिनमें हो रही जनभागीदीरी से सुखद विस्मय होता है।

1

कौन रखता सच को अक्षय सच को सच कहता तो कौन।
था सभी को मृत्यु को भय सच को सच कहता तो कौन।

थी निगाहों में सभी की वारदातें क़त्ल की,
सोचिए फिर होके निर्भय सच को सच कहता तो कौन।

छद्म लोगों को सुलभ था जिस जगह वैभव वहाँ,
कौन करता सच का निश्चय सच को सच कहता तो कौन।

लाख विश्वसनीयता की बात थी लब पर मगर,
छल-कपट था सबका आशय सच को कहता तो कौन।

जीत करनी थी सुनिश्चित ‘वाद’ के बल पर तो फिर,
मूर्खता का ले के निर्णय सच को सच कहता तो कौन।

था वहाँ ‘सु़करात’ ही कोई न ‘मीरा’ फिर भला,
लगता किसको सच हिरण्मय, सच को सच कहता तो कौन।

चाहिए था सच ही कहना सच को लेकिन ‘एहतराम’,
देखकर सच की पराजय सच को सच कहता तो कौन।

2

गै़ज का सूरज था सर पर, सच को सच कहता तो कौन।
रास आता किसको म़हशर, सच को सच कहता तो कौन।

सबने पढ़ रक्खा था सच की जीत होती है मगर,
था भरोसा किसको सच पर, सच को सच कहता तो कौन।

मान रखता कौन विष का कौन अपनाता सलीब,
कोई ईसा था न शंकर, सच को सच कहता तो कौन।

था किसी का भी न म़कसद सच को झुठलाना मगर,
मुँह में रखकर लु़क्म’-ए-तर, सच को सच कहता तो कौन।

आदमी तो ़खैर से बस्ती में मिलते ही न थे,
देवता थे सो थे पत्थर, सच को सच कहता तो कौन।
जब ह़की़कत में उभरता सच भी सच लगता न था,
ख़्वाब में होते उजागर सच को सच कहता तो कौन।

याद था सु़करात का क़िस्सा सभी को `ए़हतराम’,
सोचिए ऐसे में बढ़कर, सच को सच कहता तो कौन।

3

सर पे गो, ‘एहतराम’ ताज नहीं।
आपका किसके दिल पे राज नहीं।

दर्द का तो इलाज संभव है,
दिल का लेकिन कोई इलाज नहीं।

कल का मुँह कौन देख पाएगा,
चल दिए तुम तो कहके आज नहीं।

बैठे रहते हो पहरों एक जगह,
क्या तुम्हें कोई काम-काज नहीं।

मूल्य कोई नहीं समाज का अब,
या ये कहिए कि अब समाज नहीं।

पी गया ज़ह्र  कोई यह कहकर,
‘ज़िंदगी का कोई इलाज नहीं।’

मान पाएं बु़जुर्ग, छोटों से,
‘एहतराम’ आज यह रिवाज नहीं।

4

 

आइना क्या दिखा दिया तूने। 
मुझको मुझसे मिला दिया तूने।

की उजागर धरा की मर्यादा,
आसमां को झुका दिया तूने।

पीर मेरी है दृष्टि में तेरी,
मुस्कुरा कर जता दिया तू ने।

बुझ गए पिण्ड ज्योति के, ज्यों ही,
रु़ख से परदा उठा दिया तूने।

वैâसी उष्मा है तेरे लहजे में,
पत्थरों को रुला दिया तूने।

किसका साहस, कहे उसे पीतल,
जिसको सोना बता दिया तूने।

छवि उभरती है किसकी ऩजरों में,
किसका चेहरा सजा दिया तूने।

या मुझे रास आ गया कांटा,
या कोई गुल खिला दिया तूने।

रखके छाती पे मेरी अपना क़दम,
मेरा रुत्बा बढ़ा दिया तूने।

 

5

पात्र-पात्र में हाला देखो।
दाल में है कुछ काला देखो।

वापस लौटो गाँव की जानिब,
क्यों बे-शर्म उजाला देखो।

घर के कोने-अँतरे में भी,
क्यों मकड़ी का जाला देखो।

गंगा की जल-धार सहेजो,
या बरसाती नाला देखो।

तौ़क पड़े किसकी गर्दन में,
किसको मिले जय-माला देखो।

रह़जन से तो हो चौकन्ने,
लूट न ले रखवाला देखो।

समझो दूरी को ऩजदीकी,
मत पैरों का छाला देखो।

2 thoughts on “पांच ग़ज़लें – एहतराम इस्लाम – अंक-1

  1. बेहद खूबसूरत ग़ज़लें, सच में सच को सच कहता है कौन और झूठ वाले बड़े ताकतवर हैं , शायद इनकी ताकत को बताता है ये शे’र
    किसका साहस, कहे उसे पीतल,
    जिसको सोना बता दिया तूने।
    और ये तो आज के दौर का कड़वा सच है –
    रह़जन से तो हो चौकन्ने,
    लूट न ले रखवाला देखो।
    बधाई सुन्दर सृजन के लिए

  2. Ajeet Sharma 'Aakash' September 18, 2016 at 4:00 am

    एहतराम इस्लाम साहब की हर एक ग़ज़ल को सलाम…. अभी तक अनुसनी, अनपढ़ी ग़ज़लों को हम तक पहुँचाने के लिए हार्दिक आभार….
    पत्रिका के प्रगति-पथ पर निरन्तर अग्रसर होते जाने की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ !!!
    ‘आकाश’ -इलाहाबाद

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