10390141_693487417416317_5546619809332635764_n

पांच ग़ज़लें (दिनेश कुमार दानिश) अंक – 2

दिनेश कुमार
जन्मतिथि — 25.10.1977
जन्मस्थान — पूंडरी, जिला- कैथल। हरियाणा।
स्थायी पता — नजदीक डाकघर। गाँव – पूंडरी। जिला – कैथल। हरियाणा। pin code — 136026
सम्पर्क सूत्र — dkdaanish77@gmail.com
09896755813

1

दिलों में प्यार का दरिया अगर सूखा नहीं होता
तो हरगिज़ भाइयों में घर का बँटवारा नहीं होता

बिना परखे हक़ीक़त का भी अंदाज़ा नहीं होता
समन्दर चश्म-ए-तर के दर्द से गहरा नहीं होता

पहाड़ों को भी इन्सां चीर कर रस्ता बनाता है
इरादा जब कोई मजबूत हो तो क्या नहीं होता

मैं रोज़ी के लिए परदेस में हूँ, याद रक्खो माँ
किसी भी चीज़ से दूरी, उसे खोना नहीं होता

वो अपने हौसले से आसमाँ भी नाप लेता है
परिन्दा बुज़दिली की कोख़ से पैदा नहीं होता

मुक़र्रर कर रखी है मैंने अपने आँसुओं की हद
मेरे दुख-दर्द का पैकर, मेरा चेहरा नहीं होता

मैं खुद को भी अधूरा, दोस्तो, महसूस करता हूँ
कोई इक शेर मुझसे जब कभी पूरा नहीं होता

2

दुनिया का ढब दुनिया जैसा होता है
जो भी होता है वो अच्छा होता है

शाम ढले जब चिड़िया अपने घर लौटे
चोंच में उसके यारों दाना होता है

बाद में तो समझौते होते हैं दिल के
प्यार तो केवल पहला पहला होता है

अपने दम पर अब तक़दीर सँवारो तुम
मेहनतकश हाथों में सोना होता है

कल के गंगू को हम …गंगाराम कहें
रुतबा ही …दौलत का…ऐसा होता है

सोच रहा है आँगन का बूढ़ा बरगद
घर का आखिर क्यों बँटवारा होता है

चूड़ी कंगन पायल सब बेमानी हैं
लज्जा ही औरत का गहना होता है

रिश्वत ली थी, रिश्वत देकर छूट गया
हर ताले की चाबी पैसा होता है

बारिश से टपके है कच्ची छत मेरी
कंगाली में आटा गीला होता है

खुशियाँ चाहोगे तो ग़म भी आयेंगे
फूलों पर काँटों का पहरा होता है

मैंने जिसको आईना दिखलाया था
वो मुझ पर क्यों आग बबूला होता है

ये दुनिया है एक मुसाफ़िर ख़ाने सी
जो आता है उसको जाना होता है

3

बा-वफ़ा थे बदल गए कैसे
दोस्त अपने ही छल गए कैसे

जब घनेरे शजर थे राहनुमा
धूप में ख़्वाब जल गए कैसे

ज़ाहिदों की ख़ता मुआफ़ मगर
रिन्द पी कर फिसल गए कैसे

वे जवानी के मोड़ वे मंज़र
बारहा हम सँभल गए कैसे

देखकर जिनको दिल धड़कता है
वो ही दिल से निकल गए कैसे

मीर ग़ालिब फ़राज़ फ़ैज़ ‘दिनेश’
देखो लफ़्ज़ों में ढल गए कैसे

4

बे-वफ़ा से वफ़ा करे कोई
ज़ह्र खाकर जिया करे कोई

ज़िन्दगी मौत से हो बदतर जब
न मरे गर तो क्या करे कोई

सूख जाएँ न अश्क आँखों से
ज़ख़्म-ए-दिल को हरा करे कोई

डूबती नब्ज़ लौट आती है
ज़िक्र जब आपका करे कोई

बेबसी की ज़ुबाँ नहीं होती
मेरा चेहरा पढ़ा करे कोई

अपनी रफ़्तार ही थी कम ‘दानिश’
वक़्त से क्या गिला करे कोई

5

पाँव के नीचे से धरती सर से छप्पर ले गया
ज़लज़ला कुछ बेबसों के सारे गौहर ले गया

ज़िन्दगी के खुशनुमा लम्हों से वो महरूम है
शाम को जो साथ अपने घर में दफ़्तर ले गया

हौसला, हिम्मत, ज़वानी, ख़्वाहिशें, बे-फिक्र दिल
वक़्त का दरिया मेरा सब कुछ बहा कर ले गया

सारी दुनिया जीत कर भी हाथ खाली ही रहे
वक़्त-ए-रुख़सत इस जहाँ से क्या सिकन्दर ले गया

छू न पाये हाथ उसके जब मेरी दस्तार को
तैश में आकर वो काँधे से मेरा सर ले गया

जब हुआ ससुराल में नव-ब्याहता का दिल उदास
इक हवा का झोंका उसको पल में पीहर ले गया

मुझको महफ़िल में दिखानी थी तख़य्युल की उड़ान
मैं बिना पर के परिन्दों को फ़लक़ पर ले गया

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *