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पांच कविताएँ – दिलबाग सिंह विर्क – अंक-1


दिलबाग विर्क का जन्म २३ अक्तूबर १९७६ को हरियाणा के गाँव मसीतां (जिला – सिरसा) में हुआ। आपने हिंदी और इतिहास में स्नातकोत्तर की उपाधि हासिल की और हिंदी में यू.जी.सी. की राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण की। शिक्षण में आपने डिप्लोमा और डिग्री हासिल करके पहले प्राथमिक शिक्षक के रूप में कार्य किया और अब आप हिंदी के लेक्चरार पद पर कार्यरत हैं। अन्य भाषाओं के ज्ञान के लिए आपने उर्दू में सर्टिफिकेट कोर्स और पंजाबी में ज्ञानी की। अध्यापन कार्य के साथ-साथ आप अब भी अध्ययनरत हैं।

लेखन के क्षेत्र में आपने शुरुआत कॉलेज के दिनों में ही की। शुरुआत में छंद रहित लिखा लेकिन अंतर्जाल से जुड़कर छंदबद्ध लेखन में सुधार किया। ओपन बुक्स ऑनलाइन के तरही मुशायरों में हिस्सेदारी की और चित्र से काव्य प्रतियोगिता में दो बार पुरस्कार प्राप्त किया। अंजुमन प्रकाशन के संकलन ‘ग़ज़ल के फलक पर-१’ में उनकी तीन ़गज़लें शामिल हैं। इसके अतिरिक्त हिंदी-पंजाबी के चौदह काव्य संकलनों में उनकी रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। उनके पाँच एकल काव्य संग्रह भी प्रकाशित हो चुके हैं, जिनमें से तीन पांडुलिपियाँ हरियाणा साहित्य अकादमी की अनुदान योजना के अंतर्गत चयनित हैं। कविता के साथ-साथ आप गद्य लेखन से भी जुड़े हुए हैं। आपके खेल सम्बन्धित आलेख, व्यंग्य तथा लघु कथाएँ देश भर के पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। वर्ष २०१२ में आपकी कहानी को विश्व हिंदी सचिवालय मारीशस द्वारा आयोजित अंतर्राष्ट्रीय कहानी प्रतियोगिता में सांत्वना पुरस्कार (१०० डॉलर) मिला। अंतर्जाल पर आप फेसबुक, ब्लॉग और ऑनलाइन वेब पत्रिकाओं में लिख रहे हैं।

1 – गांधारी-सा दर्शन

देखना
खुद से होता है
सुना
दूसरों को जाता है

दूसरे क्या सुनाते हैं आपको
क्या सुनने को
करते हैं विवश
यह हाथ में नहीं आपके

बहुत से शकुनि
बहुत से दुर्योधन
बहुत से धृतराष्ट्र
अक्सर इतना शोर मचाते हैं
कि दब जाती है आवाज़
न सिर्फ़
भीष्मों की
विदुरों की
पांडवों की
अपितु
कृष्ण तक की

कानून की देवी भी
चूक जाती है न्याय से
धोखा खा जाती है
दलीलों से
दरअसल
गांधारी-सा दर्शन है उसका
बाँध रखी है उसने भी
आँख पर पट्टी
देखने से परहे़ज है उसे
वह सि़र्फ सुनती है
उसे य़कीन है
कानों सुने उस सच पर
जो सदैव कमतर होता है
आँखों देखे सच से।

2 – चीरहरण

कुछ-न-कुछ तर्क तो
रहते ही हैं
सबके पास
अपनी बात को
सत्य सिद्ध करने के लिए

ये तर्क
अवश्य रहे होंगे
सिंहासन के प्रति निष्ठावान
भीष्म पितामह के पास
ये तर्क
अवश्य रहे होंगे
कुलगुरु कृपाचार्य के पास
ये तर्क
अवश्य रहे होंगे
कौरवों-पांडवों के गुरु
और माननीय सभासद
द्रोणाचार्य के पास
ये तर्क
अवश्य रहे होंगे
महान नीतिविद
विदुर के पास
तभी तो
वे सभी
न सि़र्फ ़खामोश रहे
द्रोपदी चीरहरण पर
अपितु
इसके बाद भी
चिपके रहे अपने-अपने पदों से

इन तर्कों के कवच
मौजूद हैं आज भी
हम सबके पास
तभी तो
मुट्ठी भर दु:शासन
चंद दुर्याेधनों के कहने पर
आज भी सफल हो रहे हैं
द्रोपदी चीरहरण करने को
बहुत सारे
भीष्म पितामहों
द्रोणाचार्यों
कृपाचार्यों
और
विदुरों के रहते हुए।

3 – दोषी

माना कि तुम
उस दुर्याेधन से नहीं हो
जिसने छीन लिया था
भाइयों का राज-पाट

माना कि तुम
उस दु:शासन से नहीं हो
जिसने भरी सभा में
निर्वस्त्र करना चाहा था
कुलवधू को

माना कि तुम
उस कर्ण से नहीं हो
जो अहसानों के बोझ तले दबा
अंध समर्थन करता रहा
अन्याय और कपट का

माना कि तुम
उस शकुनि से नहीं हो
जो उत्तरदायी था
लाक्षागृह और द्युत जैसी
कपटी योजनाओं का

माना कि तुम
उस धृतराष्ट्र से नहीं हो
जो अंधा हो गया था
पुत्र प्रेम में
इतना होने पर भी
यह न कहो
कि दोषी नहीं हो तुम
बुरे हालातों के लिए
क्योंकि तुम
चुप बैठे हो
भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य की तरह
क्योंकि तुम
प्रतिज्ञा नहीं ले रहे
भीम की तरह
क्योंकि तुम
प्रेरित नहीं कर रहे
अर्जुन को
गांडीव उठाने के लिए
कृष्ण की तरह

यही दोष है तुम्हारा
इसीलिए तुम
उत्तरदायी हो सबसे ज्यादा
इन बुरे हालातों के लिए।

 

4 – अर्जुनों की मौत

कोई भी द्रोणाचार्य
किसी को
अर्जुन नहीं बना सकता
हाँ
कोई अर्जुन
किसी द्रोणाचार्य को
अमर ़जरूर कर सकता है

यह प्रश्नचिह्न नहीं
किसी द्रोणाचार्य की योग्यता पर
किसी द्रोणाचार्य के ज्ञान पर
यह तो वास्तविकता है
दरअसल
ज्ञान देने की चीज़ नहीं
ज्ञान लेने की चीज़ है
अर्जुन बनाया नहीं जाता
अर्जुन बना जाता है
अगर बनाया जा सकता अर्जुन
तो भीड़ होती अर्जुनों की
आ़िखर कौरव भी
सहपाठी थे अर्जुन के

अर्जुन बनने के लिए
जरूरी होता है
अर्जुन का एकलव्य होना
हर अर्जुन में
एकलव्य होता है
हर एकलव्य
अर्जुन बन सकता है
यह निर्भर करता है द्रोणाचार्य पर
वो एकलव्य को
अर्जुन बनने देता है
या फिर अर्जुन को
बना देता है एकलव्य

आज कमी नहीं द्रोणाचार्याें की
हाँ, एकलव्य अब नहीं मिलते
आज अँगूठा नहीं कटवाते शिष्य
आँख दिखाते हैं
एकलव्यों का मर जाना
अर्जुनों का मर जाना है।

 

5 – महाभारत जारी है

छीनकर
अपनी ही सन्तान के ह़क
अपने सुखों में लीन हैं
आज भी कई पिता
शांतनु की तरह

तलवार की नोक पर
आज भी ताकतवर पुरुष
भीष्म की तरह
अपहरण कर रहे हैं
अम्बा, अम्बिका, अम्बालिका का

पुत्र के मोह में उलझ
बहुत से पिता
आज भी तिलांजली दे रहे हैं
सब नियमों को
अंधे धृतराष्ट्र की तरह

चाल को समझने के बावजूद
नहीं न कह पाने की झिझक
युधिष्ठिर की तरह
आज भी जकड़े हुए है
कई ज्ञानियों और विद्वजनों को

दूसरों को ढाल बनाकर
निजी बदला लेने में
निजी स्वार्थ सिद्धि में
लीन हैं लोग आज भी
शकुनि की तरह

औचित्य-अनौचित्य की
परवाह किए बगैर
कर्ण की तरह आज भी
जारी है अंध समर्थन
दोस्त का, दोस्ती का

भाई का ह़क छीनने
भाइयों के ख़िलाफ़
षड्यंत्र रचने के कुकृत्य
आज भी जारी हैं
दुर्योधन की तरह

आज भी छूटी नहीं
मर्म पर प्रहार करने की आदत
द्रोपदी की तरह
भले ही उसकी उक्ति सिद्ध हो
आग में घी की तरह

अबला नारी के
पाक आँचल तक
पहुँच रहे हैं
आज भी कई हाथ
दु:शासन की तरह

हालात बदलने में सामथ्र्यवान
बहुत से लोग आज भी
भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य की तरह
चुप्पी साधे हुए हैं
खोखली निष्ठा और प्रतिज्ञा की ़खातिर

बेकसूर सेनाएँ
सत्ता लोलुप राजाओं के लिए
आज भी युद्ध के मैदान में
खड़ी हैं आमने-सामने
कुरुक्षेत्र की तरह

फिर कैसे कहूँ
महाभारत सि़र्फ एक घटना है
द्वापुर युग की
महाभारत तो जारी है आज भी
पहले से कहीं विकराल रूप में।

3 thoughts on “पांच कविताएँ – दिलबाग सिंह विर्क – अंक-1

  1. हार्दिक धन्यवाद

  2. क्‍या बात हार्दिक बधाइयां विर्क जी

  3. सभी एक से बढ़ कर एक । गांधारी के दर्शन ने तो सोचने पर विवश कर दिया । बहुत अच्छे दिलबाग भाई

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