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पांच ग़ज़लें – सज्जन धर्मेन्द्र – अंक – 1

सज्जन धर्मेन्द्र

अंतर्जाल पर ‘सज्जन’ धर्मेन्द्र एक जाना पहचाना नाम हैं। आपका पूरा नाम धर्मेन्द्र कुमार सिंह और ‘सज्जन’ उपनाम हैं। जन्म उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में 22 सितंबर, 1979 को हुआ, प्रारंभिक शिक्षा प्रतापगढ़ के राजकीय इंटर कालेज से प्राप्त करने के बाद इन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से प्रौद्योगिकी स्नातक और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की से प्रौद्योगिकी परास्नातक की उपाधियाँ प्राप्त कीं। वर्तमान में आप एनटीपीसी लिमिटेड की कोलडैम परियोजना में प्रबंधक (सिविल) के पद पर कार्यरत हैं।

‘सज्जन’ ने काव्य लेखन काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान शुरू किया । महामना मालवीय जी पर लिखी इनकी पहली कविता प्रौदयोगिकी संस्थान, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की पत्रिका में प्रकाशित हुई, परन्तु कुछ कविताएँ लिखने के बाद लेखन को विराम लग गया। सितंबर 2009 में ‘सज्जन’ कविता कोश से जुड़े और इनके निरंतर योगदान की वजह से इन्हें कविता कोश कार्यकारिणी का सदस्य बनाया गया, इस जुड़ाव के फलस्वरुप कुछ समय में ही लेखन कर्म पुन: शुरु हुआ तथा आप ग़ज़ल और नवगीत सहित अन्य विधाओं में लिखने लगे। ‘सज्जन’ धर्मेन्द्र की ग़ज़ल, गीत, नवगीत, कविता, दोहा, कहानी सहित अन्य विधाओं की सैकड़ों रचनाएँ पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। 

सम्मान : कविता कोश योगदानकर्ता सम्मान
मोबाइल : 9418004272
ई-मेल -dkspoet@gmail.com

जिस घड़ी बाजू मेरे चप्पू नज़र आने लगे

जिस घड़ी बाजू मेरे चप्पू नज़र आने लगे।
झील, सागर, ताल सब चुल्लू नज़र आने लगे।

जिंदगी के बोझ से हम झुक गये थे क्या जरा,
लाट साहब को निरे टट्टू नज़र आने लगे।

हर पुलिस वाला अहिंसक हो गया अब देश में,
पाँच सौ के नोट पे बापू नज़र आने लगे।

कल तलक तो ये नदी थी आज ऐसा क्या हुआ,
स्वर्ग जाने को यहाँ तंबू नज़र आने लगे।

भूख इतनी भी न बढ़ने दीजिए मेरे हुजूर,
सोन मछली आपको रोहू नज़र आने लगे।

पानी का सारा गुस्सा जब पी जाता है बाँध

पानी का सारा गुस्सा जब पी जाता है बाँध।
दरिया को बाँहों में लेकर बतियाता है बाँध।

नदी चीर देती चट्टानों का सीना लेकिन,
बँध जाती जब दिल माटी का दिखलाता है बाँध।

पत्थर सा तन, मिट्टी सा दिल, मन हो पानी सा,
तब जनता के हित में कोई बन पाता है बाँध।

जन्म, बचपना, यौवन इसका देखा इसीलिए,
सपनों में अक्सर मुझसे मिलने आता है बाँध।

मरते दम तक साथ नदी का देता है तू भी,
तेरी मेरी मिट्टी का कोई नाता है बाँध।

है मरना डूब के, मेरा मुकद्दर, भूल जाता हूँ

है मरना डूब के, मेरा मुकद्दर, भूल जाता हूँ।
तेरी आँखों में सागर है ये अक्सर भूल जाता हूँ।

ये द़फ्तर जादुई है या मेरी कुर्सी नशीली है,
मैं हूँ जनता का एक अदना सा नौकर भूल जाता हूँ।

हमारे प्यार में इतना तो नश्शा अब भी बाकी है,
पहुँचकर घर के दरवाजे पे द़फ्तर भूल जाता हूँ।

तुझे भी भूल जाऊँ ऐ ख़ुदा तो माफ़ कर देना,
मैं सब कुछ तोतली आवाज़ सुनकर भूल जाता हूँ।

न जीता हूँ न मरता हूँ तेरी आदत लगी ऐसी,
दवा हो जहर हो दोनों मैं लाकर भूल जाता हूँ।

सूरज हुआ है पस्त ये मौसम तो देखिए

सूरज हुआ है पस्त ये मौसम तो देखिए।
बादल हुए हैं मस्त ये मौसम तो देखिए।

कागज़ गया है फूल सियाही बिखर गई,
निब की हुई शिकस्त ये मौसम तो देखिए।

सूरज नहीं दिखा तो घने बादलों को सब,
जोड़े हैं आज हस्त ये मौसम तो देखिए।

गंगा की शुद्धता हो या मिट्टी का ठोसपन,
सब हो गए हैं ध्वस्त ये मौसम तो देखिए।

यूँ बादलों से हो गई जुगनू की साठ-गाँठ,
तारे हुए हैं अस्त ये मौसम तो देखिए।

ढहे मस्जिद कहीं, सच्चा पुजारी टूट जाता है

ढहे मस्जिद कहीं, सच्चा पुजारी टूट जाता है।
जले मंदिर कोई, पक्का नमाजी टूट जाता है।

यही सीखा है केवल आइने को देख इंसाँ ने,
यहाँ सच बोलता है जो, वो जल्दी टूट जाता है।

ये जूठन खा के पिंजरे में रहेगा उम्र भर लेकिन,
शिकारी पंख भी कतरे तो पंछी टूट जाता है।

दवा की और सेवा की जरूरत है इसे लेकिन,
दुआ करता न हो कोई तो रोगी टूट जाता है।

हजारों दुश्मनों को मार डाले बेहिचक लेकिन,
लड़े अपने ही लोगों से तो फौजी टूट जाता है।

ये मेरे देश की संसद या कोई घर है शीशे का,
जो बच्चों के भी पत्थर मारते ही टूट जाता है।

2 thoughts on “पांच ग़ज़लें – सज्जन धर्मेन्द्र – अंक – 1

  1. बेहतरीन ग़ज़लें , बधाई

  2. सत्यनारायण जीनगर August 29, 2016 at 8:38 am

    सामाजिक सरोकारों और बंधुत्व की भावना से औत-प्रोत गजलें ………

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