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तीन गीत – दीपक गोस्वामी “चिराग” (अंक -3)

दीपक गोस्वामी “चिराग”
शिक्षा- परास्नातक (गणित), शिक्षा-स्नातक
सम्प्रति-  सहायक अध्यापक – परिषदीय पूर्व माध्यमिक विद्यालय अलावलपुर, बहजोई (सम्भल) उ.प्र.
सम्पर्क सूत्र – शिव बाबा सदन,  कृष्णा कुंज बहजोई,  (सम्भल) उत्तर प्रदेश ,भारत,   पिन 244410
मो -9548812618
Email: deepakchirag.goswami@gmail.com

(1)

हूं मैं’ जननी तेरी, हूं मैं’ धरिणी धरा
दूं मैं’ भोजन वसन, रत्न सोना खरा॥

चीर लेती मैं’ छाती,क्षुदा के लिये
हूं बहाती’ मैं गंगा, तृषा के लिये
ये पहाड़ों की’ चोटीं ,पयोधर मे’री
इनमें’ ममता मे’री , प्यार करुणा भरा॥
हूं मैं’ जननी तेरी, हूं मैं’ धरिणी धरा॥

मेरे’ आंचल की’ मिट्टी, तू’ पैदा हुआ
इसमें’ घुटमन चला, खेला’ भागा फिरा
प्रीत तोड़ी थी’ सब, जगती’ छोड़ी थी’ जब
आ मुझी में मिला, आ मुझी में धरा॥
हूं मैं’ जननी तेरी, हूं मैं’ धरिणी धरा॥

मेरी’ छाती में’अनगिन,धमाके किये
इन धमाकों ने’ हिय मेरे’ गड्ढे किये
मेरा’ हृदय बमों से, ये’ दहले है’ जब
रहता’ खुद भी तो तू, कंपनों से डरा॥
हूं मैं’ जननी तेरी, हूं मैं’ धरिणी धरा॥

मेरी’ आँखें हैं’, कोंपल,  हुस्न औ जिगर
खींच डाले हैं’ सारे ये’ गेसूं मे’रे
खूब नौंचा है’ चेहरा मेरा रसभरा॥
हूं मैं’ जननी तेरी, हूं मैं’ धरिणी धरा॥

फेफड़ों को मे’रे संक्रमित है किया
विष भरी य़े हवाएँ व धूआं दिया
इन प्रदूषित बगीचों में’ बिचरे तू जब
सोच लगता है फिर क्यों तू यों अधमरा
हूं मैं’ जननी तेरी, हूं मैं’ धरिणी धरा॥

लिप्सा’अपनी मिटा ,धीर-संयम जगा
अगली’ पीढी बचा, खुद को’ दे ना दगा;
कर न दूषित वसन मेरे दुर्भाव से ।
जल औ’ जंगल बचा; कर मुझे उर्वरा॥
हूं मैं’ जननी तेरी, हूं मैं’ धरिणी धरा॥

मैं हूं जननी तेरी, हूं मैं धरिणी धरा
दूं मैं भोजन वसन, रत्न सोना खरा॥

(2)
माता उर बस जाओ,मन आज पुकारा है।
मतलब की दुनिया में, तू एक सहारा है।

जग के संबंधों ने, यह मन झुलसाया है।
पर तेरी ममता ने,मरहम ही लगाया है।
माँ माँ तेरा ये आँचल,जगती से न्यारा है।
मतलब की दुनिया में

ये मन मेरा दुखिया, मां! इत-उत डोले है।
तेरा रस्ता तक-तक कर, ये नैना बोले हैं।
माँ तेरा ये दर्शन,  सबसे ही  प्यारा है।
मतलब की दुनिया में

जीवन में सुख-दुख तो, दिन-रैन से’ आते हैं।
पर माँ तेरे सम्बल, मुझे पार लगाते हैं।
माँ  मेरा  ये जीवन, तू ने ही सँवारा  है।
मतलब की दुनिया में

(3)

होली के ये रंग देखिये
रह जाएंगे दंग देखिये॥

गली-गली में ध्वजा निकलती॥
जूता,पगड़ी खूब उछलती॥
ह़ँसी,ठिठोली, धूम-धड़ाका,
बजते ढोल-मृदंग देखिये॥
होली के ये रंग देखिये ।

तरह-तरह के भेष बने हैं॥
चेहरे सबके पुते सने हैं॥
इक-दूजे के कपड़े फाड़ें,
फिरते नंग-धड़ंग देखिये॥
होली के ये रंग देखिये॥

धूम रंग की मची हुई है॥
गोरी कोरी बची हुई है॥
देवर-भाभी,जीजा-साली,
साजन-सजनी संग देखिये॥
होली के ये रंग देखिये॥

हरिया ने ने फिर से भंग घोली॥
भर पिचकारी मारे कोली॥
रंगों में भीगी है चोली
भीगे-भीगेे अंग देखिये॥
होली के ये रंग देखिये।

जाएं नहीं चेहरे पहचाने
भीड़ में घुस कर कुछ मनमाने॥
मौका पाते और छेड़ते,
लुच्चे और लफंग देखिये॥
होली के ये रंग देखिये।

रंग-बिरंगी तितलीं उड़तीं॥
जींस-टाप पे कुर्ती धरतीं॥
कमसिन फिर फिर ले अँगड़ाई,
कुर्ती कितनी तंग देखिये॥
होली के ये रंग देखिये।

होली के पकवान घने हैं॥
तरह-तरह के थाल बने हैं॥

मूंग-पकौडे,भल्ले गुंझिया,
और घुटी है भंग देखिये॥
होली के ये रंग देखिये॥

दिन गिन-गिन के हारी भोली ॥
संग पिया के खेलूं होली ॥
रात कंत घर पे हैं आए,
छाय अंग अनंग देखिये॥
होली के ये रंग देखिये

रह जाएंगे दंग देखिये॥

 

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