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दुनिया के दरीचे से (नज़्म – प्रतिमा त्रिपाठी) अंक-1

प्रतिमा त्रिपाठी की ऩज्मों को पढ़ना अपने आप में एक उत्सव है। गर्दिश की स्याह सुरंगों में उम्मीदों के जुगनुओं की बरामदगी है ये ऩज्में। कहन में हवाओं का लोच, लहरों की रवानी, दरिया की जवानी और ह़जारहा पूâलों की शो़खी एक साथ ऱक्स करती सी दिखाई देती है। एक तिलिस्म तारी हो जाए दिलो-दिमाग में, एक बेकाबू बगावत के …