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कहानी : बंद कमरे का धुँआ – अर्चना ठाकुर (अंक-3)

मैं उसे जानती थी ये तो उसको देखते मेरी स्मृतियों ने तय कर लिया। पर नाम, नाम क्यों नहीं याद आ रहा। वो चेहरा जाना पहचाना तो है। उसके चेहरे के भाव भी कितने जाने पहचाने से है जैसे आज वह क्लान्त, मलिन भाव से मेडिकल कॉलेज के क्लिनिकल विभाग के एक केबिन के बाहर खड़ा था। क्यों? इसका तो सहज ही उत्तर है पर किसलिए? क्या खुद के लिए! वह कितना थका हुआ दिख रहा है। बार बार केबिन के दरवाज़े को फिर अपनी कलाई घड़ी को वह देखता है। उसमें इतना उतावलापन है कि उसे तो होश ही नहीं है कि उसके कुछ पीछे मैं खड़ी हूँ। मैं जो तब से अपने सूक्ष्मदर्शी चक्षुओं से उसके हृदय की परतों को खोलने का प्रयास करती जा रही हूँ। तभी एक आवाज़ आई। एक नर्स का चेहरा उस केबिन से बाहर झाँका और बिना देखे ही वह मानों हवा में आवाज़ देती है तब वह अपना नाम सुन झट से उठ जाता है।
‘ओह याद आया शेखर… शेखर ही हो।’ नाम सुन अतीत के सभी चलचित्र साफ़ हो गए।
उस दिन अल्पना का इंतज़ार करते तुम कॉलेज के बाहर खड़े थे। मैं ज्योंही गेट से बाहर आई तुम्हारे सीने में बंधे हाथ खुल कर मेरे सामने फ़ैल गए।
तुम अल्पना को लेने आए थे। अल्पना तुम्हारी पत्नी और मेरी पक्की सहेली जो अपने परास्नातक के दूसरे वर्ष में थी। मुझसे जल्दी से अल्पना के बारे में पूछ कर तुम फिर वहीं खड़े अल्पना का इंतज़ार करते रहे। मैं वहीं के चौराहे से बस पकड़ कर चली गई फिर उसके दूसरे, तीसरे और फिर किसी दिन भी अल्पना कॉलेज नहीं आई। मैं अपनी सहेली से मिलना चाहती थी पर कैसे मिल पाती। मुझे तब उसका घर ही कहाँ पता था। फिर इतने मौन अंतराल के बाद शेखर को देख मैं फिर से अपनी सहेली से मिलने उसके जीवन के बारे में जानने को व्यग्र हो उठी।
उसके केबिन से बाहर आते मैं इसी व्यग्रता से उसे पुकार बैठी। संशय में पड़ी उसकी आंखें मेरी ओर मुड़ गई। पर उसके जमे कदम वहां से कहीं के लिए भी नहीं हिले, न मेरी ओर और न बाहर जाने की ओर।
मैं ही उसके पास चली गई।
‘पहचाना मैं नीलम अल्पना की सहेली…कॉलेज में हम साथ थे, आप रोज़ उसे लेने आते थे।’
उसके चेहरे के भावों ने बता दिया कि वह उसे पहचान गया था।
‘मैं भी यही बैठती हूँ….मेरा केबिन उधर है….पर आप यहाँ क्यों आए?’
उसने कहा और मैं चौंक गई। हैरत से उसकी उलझी आंखें और बुझे चेहरे को देखने लगी।
शेखर वापस बाहर निकल गया। बाहर खुले आसमान में निकल कर अपनी बाइक स्टार्ट कर तेज़ी से वह सड़क की भीड़ में गुम हो गया।

स्स्स्

घर के मुख्य गेट पर एक चिर्र की आवाज़ से उसकी बाइक रूकती है। घर पहुँचते उसके कदम जमीन को छूते जैसे शिथिल हो जाते है अब वह धीरे धीरे दरवाज़े की ओर बढ़ता है। दरवाज़ा बिन खटखटाए ही स्वतः खुल जाता है। सामने उसका तेरह वर्षीय बेटा राहुल खड़ा था।
शेखर एकदम से चौंक कर उसे देखता है फिर गर्मियों की झुलसी शाम में बोझिल आंखें राहुल को उसके हाथ में पकड़े बैट के साथ देखती है और एकाएक गर्मी जैसे पूरे शरीर से खिंच कर उसके मस्तिक में केंद्रित हो कर विस्फोट कर बैठती है।
‘फिर चल दिए पढ़ाई वढ़ाई से कोई मतलब नहीं है।’
‘प….’ राहुल पिता के तेवर देख अपने मुंह तक आए सारे शब्द समेट कर चुपचाप समय की सरगर्मी को समझ वापस घर में चल देता है।
दरवाज़े के पार खुला आँगन, आँगन के किनारे लगे कुछ कनेर, गुडहल, मीठी नीम के बड़े बड़े झाड़ और उनके नीचे हवा से फैले ढ़ेरों पीले, भूरे पत्तों का संसार। पैर पड़ते ही वे जैसे चित्कार उठते हों। शेखर अन्दर आकर एक नज़र घर का परिवर्तन देख सब समझ जाता है। सब कोनों में पानी के ठहरे होने के प्रमाण मौजूद थे, आँगन धोया गया था। शेखर धीरे धीरे आगे वाले कमरे के अधखुले दरवाज़े की ओर देखता हुआ आगे बढ़ रहा था। आगे बढ़ने के उपक्रम में उसके मानसिक क्षेत्र में चलचित्र का जमाव भी क्रमवत खुलता जाता है।
आज से उन्नीस साल पहले यही आँगन कितना सजा था। रंगोली से, फूलों से, लोगों के हँसते मुस्कराते चेहरों से। एक कदम चलता नहीं कि किसी से टकरा जाता, बच्चे मैदान समझ आँगन में दौड़ लगा रहे थे। बड़ी भाभी पल्ला सँभाले कभी पूड़ी की भरी थाली लिए आँगन से गुज़र रही थी तो कभी कामवाली रत्ना को जोर जोर से चिल्ला कर आँगन में खड़ी आवाज़ दे रही थी।
रत्ना कम सुनती थी, उसे बुलाने के लिये हमेशा सबको चीखना पड़ता था। पर कोई ये नहीं समझ पाया कि तनख्वाह के दिन एक धीमी आवाज़ में भी वह सब कैसे सुन लेती थी। उस दिन उसकी चेतना देखने लायक होती।
शेखर की छोटी भाभी, बहनें तारा, मीरा सब साथ बैठी सब्जियां काट रही थी। सब्जियां काटते काटते वे कभी तेज़ कभी धीमे किसी न किसी की खिचाई भी करती जा रही थीं, उनके ठहाको और मुस्कानों के बीच ढेरों किस्से उगते, ढहते नज़र आ रहे थे।
चारों ओर व्यस्तता थी। शेखर की शादी के बाद आज सात सुहागनें खिलाई जानी थी। सारा परिवार, कुनबा इकट्ठा था। हँसी मजाक, छेड़ छाड़ के बीच सारी रस्में अदा हो गई। धीरे धीरे कर सारे रिश्तेदार अपने घर जाने लगे, अब आखिर में उसकी दोनों शादी शुदा बहनों के जाने के बाद घर फिर उसी यथावत् रूप में आ गया।
आँगन और आँगन पर खुलते सात दरवाज़े जैसे सात समंदर जैसे विभक्त थे। उन सात दरवाज़ों में से एक बैठक में खुलता था जहाँ बाबू जी अपनी वकालत की किताबों पर से धूल झाड़ते रहते, दूसरा छोटा बैठक जहाँ टेप रिकार्डर पर बच्चे गाने सुनते रहते, तीसरा, चौथा दोनों कमरा बड़ी भाभी के पास था, उनका कहना था उनकी बेटी बड़ी है सो उसे भी एक कमरा देना होगा। दूसरी भाभी के पास पांचवा और छटा कमरा था, उनके पास भी ठोस वज़ह थी, उनकी लाई कामवाली रानी को एक कमरा जो देना था। छोटी भाभी किसी सरकारी स्कूल में पढ़ाती थी, इसलिए उनके जुड़वाँ बच्चों की देखरेख के लिए भाभी ने नौकरानी रखी थी। बचा किनारे का आखिरी सातवां दरवाज़ा जो अब शेखर और उसकी पत्नी अल्पना का नेपथ्य था।
शेखर कमरे में आता है। आते ही कमरा बंद कर वह कमरे की मधिम रौशनी में कमरे को खंगालता है। वह देखता है कमरे की एक मात्र खिड़की जो बाहर की गली में खुलती थी और जिसे शेखर हमेशा बंद रखता था वो आज खुली थी। वह देखता है अल्पना को जो बिस्तर पर अधलेटी शायद इंतज़ार करती सो गई थी या शायद आंखें बंद किए लेटी थी।
शेखर अहिस्ता क़दमों से पलंग के पैताने बैठ जाता है। अल्पना फिर भी नहीं हिली। शेखर जान जाता है कि अल्पना सचमुच सो गई थी। शेखर एक नज़र भर कर अल्पना को देखता है, उसका दुधिया सफ़ेद दाग रहित चेहरा, चेहरे पर दमकती अंगारे सी बिंदी उसके जेहन में भी प्रेमाग्नि भड़का देती है। वह धीरे से उसकी साड़ी के छोर पर झांकते तलवों पर अपनी हथेली रख देता है। इससे वह सहसा जाग बैठती है।
फिर ऐसी कितनी सुनहरी रातें शेखर और अल्पना की थी जिनमें सिर्फ वे थे और उनका प्रेम। वे संयुक्त परिवार में दिखने वाले खुशहाल मोहक जोड़े के रूप में दमकते रहते। पर उस घर आँगन के जुड़ते हर दरवाज़े की शामें अलग अलग थी। उस संयुक्त परिवार की रातें भी लम्बी होती थी। दोनों भाभियाँ खाना साथ बनाती पर छोटी भाभी जल्दी खा कर सो जाती। उनकी रात दस बजे शुरू हो जाती। पर बड़ी भाभी पति के आने पर ही खाती। नौकरीपेशा की पत्नी अल्पना जल्दी खा कर सोना चाहती पर नई नवेली होने से बड़ी भाभी उसे अपने साथ काम में लगाए रहती थी उनका मानना था कि अल्पना को किताबी ज्ञान से हट कर अभी बहुत कुछ सीखना है।
बड़ी भाभी दिन भर घर पर रहती इसलिए सारी व्यवस्था उनके हाथों से हो कर गुज़रती थी। घर पर प्रभाव भी उन्हीं का था। ससुर तो बस आगे की बैठक का एक अनचाहा सामान भर थे। अल्पना देखती बच्चे उनको कभी भी झिड़क देते, कभी चिढ़ाते। उसे लगता ये सारे दरवाज़े नहीं जैसे रहस्यों की सुरंगे थी। जो दिखता था उससे कुछ अलग घर था। इसी घर की सुरंगों से बचने के लिये पति की रज़ामंदी से अल्पना ने अपनी पढ़ाई फिर शुरू की। मनोविज्ञान से परास्नातक के प्रथम वर्ष में थी। पति रोज़ छोड़ते हुए जाते, लेने भी पहुँच जाते। उसकी सारी सहेलियां जल उठती थी ये देख, तब अल्पना के चेहरे पर एक चहक भरी मुस्कान आ जाती।
नीलम से दोस्ती भी वहीं शुरू हुई। उनकी नई दोस्ती एक सपने की शुरुआत भर थी। नीलम की अभी शादी नहीं हुई थी इसलिए उसके सपने भी बन्धनमुक्त थे उसी हवाई किले में कब एक छोटा कमरा बना कर अल्पना रहने लगी वो खुद नहीं जान पाई। वो मनोविज्ञान जीने लगी थी। उससे अपना कैरियर बनाने की वह सोचने लगी थी।
शादी के पांच सालों में गोद में बेटा आते उसके जीवन के साथ साथ घर उसके सामने परत दर परत खुलने लगा।
‘शेखर जरा अपनी बीवी को समझा कर रखो आस पास का मुहल्ला हमारी बराबरी का नहीं है सबसे मुंह खोले बोलती रहती है।’
‘शेखर, तुम्हारी बहू तो बड़ी ऐंठ वाली है माना हमसे ज्यादा पढ़ी है पर क्या हमसे बात करने से भी छोटी हो जाएगी।’
बड़ी भाभी ने शेखर के ऑफिस से आते ही अपनी कह कर रसोई की तरफ मुड़ गई।
अल्पना मायके गई थी इसलिए छोटी भाभी शेखर के आते ही रानी के हाथों उसके कमरे में नाश्ता भेजती है। फिर कुछ देर बाद कमरे में खुद आती है।
‘शेखर तुम तो जानते ही हो तुम्हारे भईया के गुजरने के बाद से अब ये नौकरी मेरे जीवन का आधार है जीवन की नीरसता को मिटाने कभी कोई स्कूल से आ जाता है तब कभी अल्पना से जरा चाय बनाने को कह दिया तो अपने कमरे में बैठ गई जा के निकली नहीं, ऐसे भी कोई करता है भला।’
नाश्ता गले में फ़ांस की तरह अटक गया। शेखर न उगल सका न निगल सका।
सुबह नहाने को जाते बाबू जी मिल गए। सर्दियों की धूप खाने आँगन में खाट पर लेटे लेटे वो बड़ी बहू को झिड़क रहे थे और वो बडबडाती रसोई में घुस जाती है।
‘सब नालायक है मुझ बूढ़े पर किसी को तरस नहीं आता अरे शेखर तेरी बहू भी कम नहीं कभी झाँकने नहीं आती अरे बुढ़ापा सभी पर आता है।’ आगे और भी देर तक शेखर सुनता पर बाथरूम में घुसते ही वो तेज़ी से नल खोल कर उसके नीचे खाली बाल्टी रख कर उसी शोर में बाहर की सारी आवाज़े गडमड कर देता है।
‘अल्पना समझती क्यों नहीं मेरी इतनी हैसियत नहीं कि अलग कमरा लेकर अपना परिवार चला सकूँ, अभी हमारी भलाई इसी पैत्रृक घर में परिवार संग रहने में ही है।’
रसोई से आती अपने गीले हाथों को आंचल में पोछती वह सहसा रुक जाती है।
‘दोनों भाभियों से थोड़ी बना कर चलो अभी घर का कोई बंटवारा नहीं हुआ है सभी तुम्हारा ध्यान रखेगी और कभी कभी बाबू जी के पास चली जाया करो बूढ़े है, माना थोड़ा बोलते ज्यादा है पर तुम्हें तो समझना चाहिए आखिर तुमने मनोविज्ञान पढ़ा है तुमसे मैं कुछ उम्मीदे रखता हूँ।’
अल्पना समझ गई कि उसके मायके जाते सभी के मुंह शिकायतों की आग उगलते रहे होंगे। उसके जी में आया कि वो भी मन की भड़ास निकाल दे कैसा मनोविज्ञान ..जीवन के मनोविज्ञान ने शैक्षिक मनोविज्ञान को धता पढ़ा दिया है। वो किताबी ज्ञान घरेलू संघर्षाे में होम हो गया। वह मन मसोस के रह गई वो जानती थी कभी बड़े भाईयों, भाभियों के सामने न बोलने वाले, हमेशा शांत गंभीर रहने वाले शेखर अपने परिवार के खिलाफ कुछ नहीं सुन पाएंगे।
शेखर अल्पना की निशब्दता से बोलने को और मुखर हो उठा’ और देखो आस पास का मुहल्ला ज्यादा अच्छा नहीं है तुम जानती नहीं हो ये सब छोटे मोटे कामगार लोग है जिन्हें मेरे दादाजी ने बसाया था आज उसी जमीन पर घर बना कर कब्ज़ा किए बैठे है उनसे जरा दूर रहा करो वैसे बोलने को तुमको घर के लोग कम पड़ते है क्या।’
अल्पना अन्दर ही अन्दर सुलग उठी। प्रत्युत्तर न दे पाने से उसके सारे शब्द उसके दिमाग को मथते रहे वो खुद से ही मन ही मन बडबडाती रही अबकि मायके गई तो उसकी पुरानी सखी मिली उसने भी उसे कुरेदा’ तू कितनी गुमसुम हो गई है कहाँ कितनी हंसमुख, चंचल हिरनी सी फुदकती रहती थी तू क्या बात है क्या जीजू बहुत गुस्से वाले है या तेरा परिवार!’
उसने उसकी बात पूरी सुनी भी नहीं और आती हूँ कह कर यूँही बाहर चली गई। तब से अब तक उसका दिमाग शब्दों की गूंज से भर गया था। लगता था जैसे फट पड़ेगा पर नहीं वो मूक मायके से ससुराल आ गई। यहाँ भी प्रश्न मुंह बाए खड़े उसे ही घूर रहे थे।
‘शेखर सब तरह से अच्छे है शांत है, गंभीर है, परिवार प्रेमी है और उसका बहुत ध्यान भी रखते है पर शिकायतें उन्हें अन्दर तक मसल देती हैं और वे चीख पड़ते है फिर उसे समझाते समझाते उसी पर आरोप लगाने लगते है तब वह अन्दर ही अन्दर सुलग उठती है कि क्या सारा समझौता उसे ही करना होगा बड़ी भाभी उन्हें तो रसोई में आटे की परात रखने की जगह भी अपनी ही पसंद आती है वो चूल्हे के बाई ओर रख कर रोटी सेंकती तो बड़ी भाभी को दार्इं ओर भाता सो उसमें भी झक झक होती सारा दिन तो खुद धोबिन से लेकर जमादारनी से खड़ी एक एक घंटे तक हँसती बोलती रहती हैं पर मैं बात करूँ तो मुझे मेरे संस्कारों तक पहुंचा देती। अगर अकेली कमरे में बैठी रहूँ तो पढ़ाई का ताना मारती है आखिर अपने तानों से मेरी पढ़ाई छुडवा कर ही मानी। पर इन्हें उनका ऐब दिखता ही कहाँ है खीज उठती हूँ कि कोई राहुल को उठाने, लेने वाला नहीं, कहने को भरा परिवार है नहाने जाना होता तो राहुल के सोने का इंतजार करती क्योंकि उनकी बेटी तो दिन भर फ़ोन पर मुस्कराती चहकती रहेगी पर एक मदद कह दूँ तो अपनी पढ़ाई का कह कर फुर्र हो जाती है। शेखर ये समझते नहीं, उन्हें तो ये घर की छोटी-मोटी बातें लगती है गैरजरुरी, निरर्थक, अर्थहीन पर मैं तो इसी से बंधी हूँ पूरा दिन ये सब मुझे सालता रहता है छोटी भाभी तो खैर नौकरी वाली है बड़ी भाभी के लिए आए दिन कुछ न कुछ लाती रहती है तभी तो बड़ी भाभी आंख बंद किए सब जब्त कर लेती है उनका शाम को कभी किसी की बाइक से आना कभी किसी की कार से उतरना फिर उसकी चाय बनाने मुझे कहना… रानी तो है वो उन्ही की तो सुनती है बाकि सब तो उसके लिए दीवार पर टंगी तस्वीर है गला फाड़ के रह जाती हूँ राहुल रोता रहता है तब भी उसे गोद में लिए कई बार चाय बनाई पर एक दिन नहीं बनाई बस उसी का रोना हरदम रोती है सब अपनी अपनी कह देते है पर मेरी कौन सुनेगा। मैं तो परिवार का अनादृत प्राणी हूँ। बाबू जी, उन्हें तो सब स्टोर का पड़ा बेकार सामान से ज्यादा बेकार समझते है वे लेटे लेटे ही अक्सर पखाना, पेशाब बिस्तर में कर देते है मुझसे नहीं देखा जाता उनके कमरे में जाते उबकाई सी आती है कैसे कहूँ उन्हें तो अपने कपड़ों की भी सुध नहीं रहती इसीलिए हिचकती हूँ शेखर इस बात को नहीं समझते मैं कहती भी हूँ तो कहते है कैसी इंसान हो एक आदमी की बेबसी नहीं समझती बस शिकायत करती रहती हो बस सहती जाऊं पर एक आवाज़ भी न निकालूं। पूछती हूँ खुद कितनी बार जाते है अपने पिता के पास सब के लिए तो सबसे नरम चारा मैं ही हूँ सब चबा चबा कर उगलते रहते है।’
किसी दिन तो होना ही था, बड़ी भाभी छोटी भाभी अलग हुई तो आँगन में उनके लिए भी दीवार खड़ी हो गई फिर दीवार के उस पार सब गुम हो गए। अब वो सच में दैहिक रूप से अकेली रह गई। इस दीवार के साथ उसके हिस्से आखिरी वाला बड़ा कमरा और साथ का एक छोटा कमरा और आँगन का एक टुकड़ा आया, छोटा कमरा रसोई बन गया। बिन खिड़की वाली रसोई का दरवाज़ा उसे हर दम खुला रखना पड़ता था धुँआ निकलने के लिए।
शेखर वहीं आँगन में खड़े उस रसोई की तरफ देख रहा था। आज उसका दरवाज़ा पूरा बंद था। पर रसोई से ख़ट पट की आवाज़े आ रही थी, अल्पना अन्दर थी। शेखर उस ओर बढ़ रहा था, धीरे निस्तेज कदमों से। रसोई का दरवाज़ा धीरे से खोलता है। दरवाज़े की मिश्रित आवाज़ में अल्पना की आवाज़ गूंजती है।
‘अरे आ गए, नहाया नहीं दरवाज़ा छू लिया अभी तो धोया था।’ फिर कहते कहते गीले रसोई की फर्श पर भीगी साड़ी समेटे वो जल्दी से दरवाज़े पर हाथ में पकड़ी आधी बाल्टी उलट देती है। शेखर वहीं बुत बना देख रहा था कि अल्पना कितनी तन्मयता से दरवाज़ा धो रही थी। शेखर बिन कुछ कहे वापस आ जाता है।

शेखर नीलम के सामने था। नीलम खड़ी थी शेखर कह रहा था ‘नीलम आप मिलना चाहती हैं अल्पना से अच्छा है जरूर आइए।’
‘इस सन्डे।’
‘ठीक है।’ उसको कुछ आगे भी कहना था पर चुसे शब्द गले में ही अटक के रह गए।
वह कमरे में जाए बगैर तार से तौलिया ले कर गुसलखाने में चला जाता है। नहा कर वो गुसलखाने से बाहर निकलता है तो उसकी नज़र कमरे के अधखुले दरवाज़े की ओर जाती है। अल्पना बिस्तर पर लेटी थी, उसकी साड़ी बदली थी शायद हमेशा की तरह वो रसोई के किनारे कुछ ऊँचे चौखटे पर जहाँ अक्सर बर्तन धुलते थे वो नहा ली थी। दिन में कितनी बार नहाती थी वो, अक्सर घर धोती रहती थी। कभी परदे, कभी बिस्तर का सिरहाना, पैताना, दिन भर कपड़े धोती, डोरी से भीगे कपड़े जैसे हटते ही नहीं थे। शेखर दबे पैर अन्दर आता है। वह अपनी सरसरी निगाह में देखता है कमरे की एक मात्र खिड़की जो बंद थी। फिर वह अल्पना की ओर देखता है, वो श्रांत चेहरा जिस पर से दुधिया रंगत धुल चुकी थी, उस चेहरे पर फैला शून्य भाव शेखर गौर से देखता है। इन गुज़रे उन्नीस सालों ने उस पर समय की कितनी परत जमा कर दी थी।
द्रुतगामी समय अपनी ऱफ्तार में बहुत सा समय बहा ले गया था।
एक दिन अचानक भरी दुपहरी को कॉलबैल बजी। अल्पना नहीं समझ पाई कि दुपहर के एकांत समय जब बेटा स्कूल, पति ऑफिस गए थे तब कौन आया होगा।
‘मैं हूँ।’
वो सकपका गई। झट दरवाज़ा खोलकर देखती है दरवाज़े के पार बड़े जेठ खड़े थे।
जेठानी मायके गई थी खाने की दिक्कत हो रही थी बेटी बाहर पढ़ती थी घर पर अकेले रहते सोचा मिल आउँâ।
फिर उस दिन का खुले दरवाज़े की क्रमवत अनुवृति होती गई।
एक दिन जेठ उसके लिए चाँदी की पायल लाए। एक दिन साड़ी फिर किसी दिन दोने में गरम मंगोरियां। बिना सोचे वो जीवन के इस पल का आनंद लेती रही। शेखर को तो नुक्कड़ की चीज़े पसंद नहीं थी, गिफ्ट पर तो खैर वे बिलीव ही नहीं करते थे। कहते थे जरूरत हो जो चाहे खरीदो पर गिफ्ट के नाम पर सामान इकट्ठा मत करो। आज वो अकस्मात् मिले उपहार से उन्मत्त मन में उठती तरंगो का आनंद उठा रही थी। उसका अकेलापन भर गया था। जो हँसी शेखर की चुप्पी निगल गई थी अब बरबस ही होठों पर आ जाती थी।
पर उस एक दिन सब पलट गया। शेखर दफ्तर से आया और राहुल जो हमेशा गली में क्रिकेट खेलने उसके आने से पहले वापस आ जाता पर उस दिन आने पर शेखर ने उसे फिर भेज दिया। वो चौंकी राहुल भी चौंका पर फायदा देख बिन सोचे वापस चल दिया। उस दिन शेखर शेखर था पर शब्द बड़ी भाभी के थे। शादी के इतने साल में जिसने थप्पड़ नहीं मारा वो बेल्ट से उसे पीट रहा था। वो उस बंद कमरे में हाय हाय कर चीख रही थी। शेखर का चेहरा आक्रोश से गर्म तवे की भांति तमतमाया हुआ था। वो रोती रही। कहाँ कहाँ बेल्ट पड़ी कितना चीखी शेखर ने कुछ नहीं देखा न सुना, वो भी चीखी पर गिड़गिड़ाई नहीं, जी भर मार चुकने के बाद कमरा खोलकर शेखर छत पर निकल गया।
बिस्तर के कोने पर सिमटी अल्पना रोती रही।’ उसके जी में आ रहा था कि जा कर शेखर का गिरेबान पकड़े और पूछे’ बड़े हिमायती बनते हो न भाभी के उनका खसम खुद मेरे पास आया था मैंने तो उनका सम्मान रखा सो चुप रही थोड़ी हँसी बोली तो क्या गजब हो गया क्या स्त्री पुरुष का सम्बन्ध बंद कमरे में एक ही होता है? जाए जरा पूछे बड़ी भाभी से जब भरी दुपहरी पूरा घर कमरों के अन्दर सिमटा था और अचानक जब मैंने उनका दरवाज़ा खटखटाया तो बाहर आती अपनी उलझी साड़ी के साथ कैसी सकपकाई थी मुझे देख मुझे अपने कमरे में आने भी नहीं दिया था जेठ तो बाहर गए हुए थे तब बड़े चरित्र वाली बनती है।’ वो रो कर रह गई।
जीवन की नियमितता बदलती गई। उस मुहल्ले में रहते दिन कट रहे थे। बेटा बड़ा हो गया उसके पास अपने व्यस्त रहने के ढेरों कारण थे, माँ खाने की और पिता पैसों की जरूरते पूरी करने के रूप में थे। शेखर का भी अब अपने परिवार से कोई संपर्क नहीं रह गया था। राहुल अपनी पढ़ाई, खेल में, शेखर ऑफिस में और बाकी समय टी वी में और अल्पना अपने दिनचर्या के कामों में घुल मिल गई।
उस रात शेखर से समागम के बाद रात के दो बजे वो नहाने गई। शेखर ने मना भी किया पर नहीं मानी। फिर अक्सर ही ऐसा करती। अब जब शेखर ऑफिस से आता तो ज़िद्द करती की नहा ले। राहुल भी स्कूल से आता तो उसके भी नहाने के पीछे पड़ जाती, नहाने से पहले अगर दरवाज़ा छू लिया कमरे तक आ गए तो कमरा धोने लगती, दरवाज़ा पोछने लगती। अब कोई भी घर आ जाता तो बात नहीं करती और जाने के बाद कमरे की हर चीज़ धोती, साफ़ करने में लग जाती। बार बार घर धोने, खुद नहाने से अक्सर बीमार रहने लगी कभी सिर दर्द, कभी हाथ सूज जाता तो कभी कहीं दर्द, शेखर परेशान हो उठा। उसे डॉक्टर के पास ले गया फिर उसके बाद उसने कोई इलाज नहीं छोड़ा लेकिन असर नदारत रहा।
शेखर अभी भी अल्पना का चेहरा देख रहा था फिर दबे पैर चलता खिड़की के पास पहुँच जाता है और खिड़की की चिटकनी खोलता है। खिड़की अपनी घुटी आवाज़ में चर्र से खुलने लगती है।
‘अरे क्यों खोल दी खिड़की बंद करो बंद करो।’ वो लगभग पलंग से कूद पड़ी।
खिड़की बंद कर शेखर किनारे खड़े अल्पना की तरफ मुड़ जाता है। अल्पना जो अब बिस्तर से उठ कर बाहर जाने को कदम बढ़ा दी थी ये देख शेखर जल्दी से कहता है ‘आज नीलम मिली।’
‘नीलम!’ वो वहीं रुक जाती है।
‘कौन नीलम?’
‘तुम्हारे साथ पढ़ती थी याद नहीं!’
‘नहीं याद ओह ये सिर दर्द।’ फिर दोनों हाथों से अपना सिर थामे वो बाहर निकल जाती है।
शेखर वहीं खड़ा सोचता रह जाता है’ रोज़ रोज़ कोई दर्द आज सिर में दर्द है अभी दो तीन दिन पहले दायाँ हाथ सूज गया था जाने क्या हुआ है उसे हरदम कोई शारीरिक तकलीफ फिर उस पर रात दिन घर धोना, सामान धोना वो समझ नहीं पा रहा था आखिर अल्पना को हुआ क्या है कितना डॉक्टरों के चौखट नापे होमोपैथी, आयुर्वेदी सब इलाज करा कर हार गया कोई कहता है मानसिक रोग है आज वहां भी अपॉइंटमेंट ले आया।’ बेचैनी में शेखर अपना माथा मसलने लगता है।
सन्डे का दिन ग्यारह बजते नीलम उसके दरवाज़े पर खड़ी थी। क्या सचमुच वो अल्पना से मिलने को इतनी व्यग्र थी, वो भी यही चाहता था। अल्पना अब साइकोलोजिस्ट थी। शायद कहीं वो उसकी मदद कर सके।
‘आपने अल्पना के बारे में जो कहा उसके बाद मेरा रुक पाना मुश्किल हो गया।’
शेखर दरवाज़ा खोलता है नीलम आँगन तक आती कह रही थी। शेखर चाहता था कि नीलम अल्पना से मिले अब वे दोनों कमरे की ओर बढ़ते है।
अल्पना अपनी सरसरी दृष्टि से देखती है एक बड़ा कमरा उसके बगल का एक छोटा कमरा पर उसकी निगाहें तो अल्पना को खोज़ रही थी। वे दोनों कमरे की ओर बढ़ रहे थे कि एक तेज़ खांसी की आवाज़ उनका ध्यान बगल के कमरे की ओर ले जाती है।
उसके शब्द नहीं पूछते पर प्रश्नात्मक निगाहें उस ओर उठ जाती है।
‘अल्पना है वो रसोई में है।’
‘तो रसोई का दरवाज़ा बंद क्यों है धुँआ अन्दर फ़ैल रहा होगा।’
शेखर मौन रह गया।
नीलम विचारों में गुम हो गई। सहसा कॉलेज वाली अल्पना की याद आ गई।
स्स्स्

क्लास चल रही थी और वो दोनो छुपी हँसी हँस रही थी।
‘ओ सी डी ओब्सेसिव कम्पल्सिव डिसओडर मतलब वो डिसओडर इसका कारण मानसिक होता है पर दोष शारीरिक दिखता है एक सर्वे के अनुसार अधिकांशत घरेलू महिलाओं के इससे प्रभावित होने का अधिकतम प्रतिशत रहता है।’ नीलम अल्पना को कोहनी मार कर इशारा कर रही थी।
अल्पना फिर धीरे से हँस दी।

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