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तीन कविताएँ – अनिल कुमार सोनी – अंक -2

अनिल कुमार सोनी
anilsoni616561@gmail.com

 

खोज खोज में फर्क

ऊपर
वाले नीचे की खोज में,
नीचे
वाले ऊपर की खोज में,
अपनी अपनी
खोज में
लगे रहते है,
फर्क
इतना है
ऊपर वाले बिना पैसों के
खोज लेते है।
नीचे वाले
साम दाम दण्ड भेद
से भी नहीं
खोज पाते हैं ?

अब तो कुछ नया होना चाहिए

अब तो कुछ नया होना चाहिए,  खटिया छोड़ देना चाहिए
खटमल सताए अगर उन्हें फिर से खटिया
बुनना चाहिए
अब तो कुछ नया होना चाहिए, नये घोटाले अभी ताजे है
जांच समय रहते जांच लेना चाहिए,ये तत्काल होना चाहिए
अब तो कुछ नया होना चाहिए ,शेषों को विशेष बनाए
अविशेषों को बाहर कर आजादी देना चाहिए
अब तो कुछ नया होना चाहिए
तू तू मो मो नहीं अब तो ,जय श्री आम होना
होना चाहिए
अब तो कुछ नया होना चाहिए ।

अमर दाना माझी

बेटी को समझाया
आंसूओं को पी कर
अपने दोनों हाथों से
पत्नी का शव उठया
कंधे पर रख चल पड़ा
सती /शंभू की चाल 
आज के आदमी को
सरकार चलाती है
सिर्फ कगज पर ही
कलम चलाती है
उनकी नजरों में
गरीबों के आंसू नहीं होते
सब देख रहे थे मंजर
छुआछूत के असर से
साथ न आया कोई
ऐसी समाज को 
अरे धिक्कारों तो कोई! 

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