ajay kumar singh

चार गीत – अजय कुमार सिंह – अंक-1


अजय कुमार सिंह 

जन्मतिथि- 29 नवम्बर 1985 
जन्मस्थान- उत्तर-प्रदेश के गाज़ीपुर जिले के एक छोटे से सीमान्त गाँव का पैत्रिक घर।

माता श्रीमती उर्मिला प्रकाश सिंह और पिता श्री जय प्रकाश सिंह कालान्तर में लखनऊ में आकर बस गये। पिता लोक निर्माण विभाग में अवर-अभियन्ता के पद पर कार्यरत हैं; जिसके कारण आपको प्रारंभिक शिक्षा के दौरान कई स्कूल बदलने पड़े। आपकी अधिकांश प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा, बलिया में हुयी।
इण्टरमीडिएट की शिक्षा के लिए आपने इलाहाबाद के महर्षि पतंजलि विद्या मन्दिर में प्रवेश लिया। आपके मन पर इलाहाबाद का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा और विज्ञान का विद्यार्थी होने के बाद भी आपका झुकाव साहित्य और कला की ओर होने लगा। शैक्षणिक दृष्टि से शुरू से ही आपकी रूचि चिकित्सा-विज्ञान में थी; अतएव आपने लखनऊ के विख्यात किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय से स्नातक (श्ँँए) और परास्नातक (श्ए) की उपाधि अर्जित की।
दिसम्बर 2012 में आपका विवाह शिल्पा वर्मा के साथ हुआ, जो इलाहाबाद में अध्ययन काल के समय से ही आपकी मित्र भी रही हैं और काव्य-लेखन के लिये आपकी प्रेरणा भी। वर्तमान में आप गुडगाँव (हरियाणा) में नेत्र रोग विशेषज्ञ के रूप में समाज की सेवा कर रहे हैं।
आरम्भ में आपका रचना-कार्य मुख्यतः स्वान्तः सुखाय ही रहा, किन्तु मित्रों के विशेष अनुरोध पर आपने अपनी रचनायें प्रकाशनार्थ संकलित की। ‘कस्तूरी’ आपका पहला प्रकाशित काव्य-संग्रह है।

सम्पर्क : dr.ajay2911@gmail.com

 

1

मैं चलूँगा,
आज ले संकल्प प्रिय का, मैं चलूँगा…

राह को घेरे पड़े हैं यामिनी के केश काले,
और पथ के शूल भी मेरे कभी देखे न भाले,
एक तारे का उजाला भी न होगा साथ यद्यपि,
किन्तु, आशा का, हृदय में, मैं चलूँगा, दीप बाले.

जीतने पथ के तिमिर को, मैं न दूँगा…

 

कण्टकों ने, क्या हुआ, कोमल पदों को बेध डाला,
रक्त- रञ्जित पद बनेंगे, घोर तम् में आज ज्वाला,
भय तिमिर का, और पथ के कण्टकों का दर्द क्या, जब
साथ मेरे है, तुम्हारे अरुण अधरों का उजाला.

मैं मिटूँगा, किन्तु मैं फिर फिर बनूँगा…

जब कभी घिर घिर उठेंगे, आद्र्र दृग में मेघ श्यामल,
या कि जब क्रन्दन करेगा, वेदना से हृदय व्याकुल,
जानना तुम, ढूँढते हैं बस तुम्हें ही प्राण मेरे,
तुम सुधा रस बूँद बन, उर पर बरसना,

सजनि! प्रतिपल. ले तुम्हारे प्रेम का सम्बल चलूँगा…

 

प्राण मेरे लघु बनें यदि, घोर पीड़ा से किसी क्षण,
साथ तुम रहना सजनि, बनकर सदा चिर स्नेह बन्धन,
क्यों करूँ मैं दर्पमय रवि से निवेदन रश्मि का, यदि,
तुम रहो अवलम्ब, मेरे पन्थ की अनुगामिनी बन.
कल्पना मैं और किस निधि की करूँगा…

2

पीड़ा उर की, एक शिला,
रोक रही जल का प्रवाह,
अश्रु-तरंगिनी दग्ध-प्राय,
कैसी आज विवशता, आह!
प्रिय के कोमल दृष्टि-वाण,
अग्नि-जात ज्यों शीत-वात,
अश्रु-शैल का हृदय चीर,
बन जाते शीतल प्रवाह…

संगम मधुर अलभ्य समझ,
प्रेम-सुधा अप्राप्य मान,
क्यों न त्याग दे मोह-पाश,
कैसी भोली मन की चाह…
टूटे यह हिम-शैलखण्ड,
फूटे आँसू का अंकुर,
ओस हृदय की आज करे,
शान्त वेदना का उछाह…

3

जब ठहर न पाता नैनों में जल,
तो कविता बन जाता है …

मैंने तो सबसे किया प्यार,
लेकिन जीवन में गया हार,
सब स्वार्थ सिद्ध करके अपना
आगे निकले मुझको बिसार,

लेकिन जब अपना मन हो निश्छल,
तो कविता बन जाता है …
है किसको कष्ट नहीं होता ,
है किसका हृदय नहीं रोता,
किस पग में नहीं चुभे काँटे,
है कौन सदा सुख से सोता?

जब दर्द करे विचलित मन प्रतिपल,
तो कविता बन जाता है …
तुमने मेरे हँसने को ही,
मेरे मन का दर्पण समझा,
देखे न कभी आँसू मेरे
औ’ कभी न मेरा मन समझा,

जब मन को जग यूँ ही जाये छल,
तो कविता बन जाता है …
अपना तो है बस अपना मन,
बाकी है मन का पागलपन ।
मैं कहूँ किसे – दो साथ मेरा,
अवकाश यहाँ किसको दो क्षण?

जब हो जाये अपना मन पागल,
तो कविता बन जाता है …

4

देखता हूँ मैं तुम्हें…
कोयलों से हर सुबह आवाज़ सुनता हूँ तुम्हारी,
चन्द्रमा में, रात भर, हूँ देखता आँखें तुम्हारी,
लय सुबह की, शाम की, मानो तुम्हारे साथ से है,
देखता हूँ मैं तुम्हें, मिलता दिवस जब रात से है ।

 

ये घनेरे मेघ हैं या, हैं तुम्हारे केश काले,
चल रही शीतल पवन या, हो कहीं आँचल सम्भाले,
आगमन बरसात का होता तुम्हारी याद से है,
देखता हूँ मैं तुम्हें, जब बूँद गिरती पात से है ।

 

तुम गये तो दे गये, अपनी, मुझे क्यों, याद सारी,
इस प्रकृति की हर छटा में देखता हूँ छवि तुम्हारी,
प्रकृति में सञ्चार जीवन का तुम्हारी याद से है,
देखता हूँ मैं तुम्हें, जब बात चलती बात से है ।

 

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