408388_184923268271360_632682615_n

आठ कविताएँ – अजामिल (अंक -3)

अजामिल 

मूलनाम : आर्य रत्न व्यास
मोबाइल नं० : 9889722209
ब्लॉग : samkaalinmuktibodh.blogspot.com

 

जूते

लाखोँ-करोड़ों बेमतलब की चीजों के बीच
कहीं न कहीं है सब के मतलब की
कोई न कोई चीज़

परम्पराओं के इतिहास में
घटती-बढती रही है पैरों की नाप
लेकिन जूते जहाँ थे
वहीँ हैं आज भी

जूते कहीं भी रहें
कभी नहीं भूलते अपनी औकात को
चाल से चाल चलन तक
अकड़ नहीं छोड़ते जूते
अमीरों के पैरों में जूते प्रतिष्ठा हैं
बेहिसाब लतियाए जाते है गरीबों के पैरों में
लाजबाब निष्ठा के प्रतीक जूते
कितने भी बदरंगे क्यों न हो जायें
साथ नहीं छोड़ते पैरों का
सिलाई खुले या फट जाए
जूते ढीठ की तरह
मुँह खोलकर हँसते है ज़माने पर

आरक्षणजीवी है दलित जूते
जूते लामबंद हो रहे है टोपियों के खिलाफ
जूते चरमरा रहे हैं
चूं-चूं कर रहे हैं जूते
जूते काटने लगे हैं
पैरों में गड़ रहे हैं जूतों के पैने दाँत
जूते बदल रहे हैं अपनी चाल
राजनीति में दामाद की तरह पूजे
जा रहे हैं जूते
वह वक्त जल्द आयेगा जब
दुनिया देखेगी जूतों का कमीनापन
तब कोई नहीं जुतिया पायेगा जूतों को

शब्द शब्द सच

शब्द सन्यास नहीं लेते
शब्द समय प्रवाह के प्रतिनिधि होते हैं
शब्द सच होते हैं झूठ के खिलाफ
शब्द बचा लो तो बहुत कुछ बच जाता है
काली किताबों में

जब साथ छोड़ रही होती हैं चीजें
देह केचुल बदलने को बेताब होती है
ख़ामोशी की चादर ओढ़े
लोग इशारों इशारों में
अनुपस्थित का उपस्थित-दर्शन
खंगाल रहे होते है

एक दूसरे के डरे– सहमे
चेहरे को देखते हुए
शब्द तब भी साँस लेते है हमारे बीच
यकीन करो जब कुछ भी शेष नहीं होगा
शब्द होगें हमारी स्मृतियों की अपार
संपदा को सहेजे हुए,
शब्द कभी नहीं मरते

शब्द सतत जीवन का अर्थपूर्ण संगीत है
शब्द हवा है -शब्द दवा है
शब्द शक्ति है शब्द प्रेम है शब्द भक्ति है
कोई भी अविष्कार शब्द से बड़ा नहीं

शब्द हाशिए पर है इन दिनों
और मैं सबसे ज्यादा परेशान हूँ
शब्दों को मुकम्मल करने के लिए
बार-बार हाशिए पर फेंक दिया जाना ही तो
सुबूत है शब्दों के जिन्दा होने का

रिश्ते

इस सच के साथ कि
रिश्ते परिंदों की तरह होते हैं-
उड़ान भरते हैं भरोसे के
खुले आकाश में

सुकोमल तितलियों की तरह
प्रेम पराग के दीवाने रिश्ते
मंडराते हैं एक फूल से दूसरे फूल के
आलिंगन के लिए

जल की तरह मर्मस्पर्शी
आकार खोजते आयतन हैं रिश्ते

हवा की तरह पारदर्शी होते हैं रिश्ते
हथेलियों की गर्माहट में
अंकुरित होते हैं रिश्ते
पलभर में कहा-अनकहा
कह देता है जैसे कोई
आँखों से आँखों में उतर जाते हैं
बस देखते-देखते.

रिश्ते उंगली पकड़ लेते हैं
तो सुरक्षित हो जाते हैं
बच्चों की तरह

प्यार से सींचे जाने पर
बीज़ से वृक्ष बन जाते हैं रिश्ते,
कब ? ये पता ही नहीं चलता

रिश्ते चूजों की तरह हैं
इन्हें हौले से पकड़ना
न छोड़ना, न दबाना
चाकू की धार से तो बहुत दूर रखना
रिश्तों को

कोई कितना भी करीब क्यों न हो
ब्रीदिंग स्पेस चाहिए हर रिश्ते को
अकालमौत से बचाने के लिए.
अहंकार

काली आंधी –
एक ऐसा बवंडर
जो हर पलतोड़ता है .
भीतर का पवित्र मौन,
मन का मखमली कौशल,
संवादों की समाधि पर
दुष्ट आत्माओं का नंगा नाच,
पीछे से वार करने वाला
प्रेम का दुश्मन
झूठों का सरताज,
बरगलाने वाली अंतहीन यात्रा,
एक साजिश
खुद को खो देने की,
ज़बान लड़ाने वाला बिगड़ा बच्चा,
खुशबू के बीच असहनीय दुर्गन्ध,
समुद्री तूफान में किनारा
खोजता जहाज़
एक धक्का जो गिरा देता है
सपनों का महल,
कंप्यूटर में छिप कर बैठा वाइरस
सार्थक फाइलों के विरुद्ध-
सॉफ्टवेयर के लिए खतरा
जीवन के इस महाभारत में
इस जानवर से बचने की
प्रार्थना करो पार्थ

ताला – चाभी

पतित नैतिकता और सूक्ति वाक्यों
के मद्धिम पड़ते उजाले की
अवैध संतान हैं ताला-चाभी

ताले भ्रम है एकनिष्ठा के
जबकि चाभियाँ छल छंद है
ताजी हवा को समर्पित
खुशबू की तरह

गुच्छों में खिलखिलाती हैं
कमर पर लटकी तो
जेवर हो जाती है चाभियाँ

घूमती-फिरती है यहाँ- वहाँ
इस जेब से उस जेब तक
एकनिष्ठ ताले इंतज़ार करते हैं उम्र भर
अपनी-अपनी चाभियों का

जीवन के महारास में
श्रीकृष्ण की तरह बहुरूपाकार हैं चाभियाँ

राजे-रजवाड़ों की तरह कई-कई
बीवियाँ बन जाती हैं चाभियाँ

सुरक्षा में तैनात ताले
लटके रहते हैं बेताल की तरह
दरवाज़े तिजोरियों की छाती पर
शैतानों की नाक में नकेल है ताले

चाभियाँ मेनका है
ऋषि की तपस्या भंग करने वाली
सुमार्ग से कुमार्ग तक
महापुरुषों को ले जाती हैं चाभियाँ

चाभियों के पास सुरक्षित है
मालिकाना हक़
ताले तो चौकीदार हैं
रहस्यों की हिफाज़त करनेवाले

ताले आधे-अधूरे है
चाभियाँ के बिना

चाभियाँ अगर राह भटक जाए
तो कभी नहीं लौटती
अपने तालों के पास

हर उम्र के ताले
खुशी-खुशी रह लेते हैं
चाभियों के साथ

तालों को संभालना है
तो सीखना होगा सबसे पहले
चाभियों को संभालना
परिंदे

उड़ान पर हैं परिन्दे …

कांपती-ठिठुरती हवा की ताल-लय पर
परिंदे गा रहे हैं आज़ादी के गीत
क्या देस-क्या परदेस

जल की सतह से बूंद-बूंद पानी चुगते परिंदे-
एक कुल एक कुटुंब हैं पृथ्वी के
भूगोल को नापते हुए

कभी नष्ट नहीं होगा उनका संघर्ष
इच्छाओं के अनंत आकाश में
शब्दातीत हैं उनकी उड़ान
नदियों की अतल गहराई में प्रतिबिम्बित
होती है उनकी गूंज
मासूम पारदर्शी परिंदे लिखेगें-
उगते सूरज की कहानी
अँधेरा बरसने से पहले-दूर कहीं
अदृश्य में गायब हो जायेगे परिंदे
भोर में उनके लौटने की उम्मीद
तैरती रहेगी पानी पर-पूरी रात

घने कोहरे में कहाँ चले जाते हैं परिंदे ?
कोई नहीं जानता
जैसे कोई नहीं जानता कि
लंबी नींद में जाने के बाद
देह छोड़कर कहाँ चली जाती हैं आत्माएं
कोई नहीं जानता

उड़ान पर हैं देह परिंदे
जीवन की नाव पल-प्रतिपल
बढ़ रही है धीरे-धीरे
परिंदे चीख रहे है और
कोई ताकत उनके साथ खेल रही है
मन बहलानेवाला खेल।
एक नाव किनारे पर

दुःख-सुख के भवसागर
में हिचकोले खाने के बाद
मेरे जीवन की नाव इस घाट आ लगी है

जर्जर देह कामनाओं की मांस-मज्जा को
छोड़ते हुए

मोह की डोर से बंधी है मेरी आखिरी सांसें
मेरे पैरों के नीचे स्मृतियों का जल
मुझे हिला रहा है धीरे-धीरे

कोई कह रहा है इस घाट पर
यह देह मुझे छोडनी होगी और जाना होगा
उस सत्ता के पास जहाँ से नहीं लौटता
कोई कभी

काली स्लेट

समय एक खाली स्लेट की तरह था
और वर्तमान के अय्याश
रंग भोगते कुछ भोथरे लोग
अपनी गलीज आकांक्षा के प्रेâम में उसे कस रहे थे
तभी तपती दोपहर के सनसनाते एकांत में
मैंने उस पर एक शब्द लिखा- भूख

उस क्षण आसपास चुभती शक्लें
मुखौटों के पीछे आँखें चलाने लगी
वे अपने जमे पैरों पर आतंकित हो गये
स्थिति संतुलन के लिए
मैं कोई रोचक झूठ तलाशने लगा
तभी, बिलकुल तभी
कुछ समझदार लोग मेरे नाबालिग बेटे को
मर्दानी कमजोरी का भेद समझाने लगे

मैं समझता था मैं समझ गया हूँ –
दूर डूब गये कल और एक रूग्ण आज के बीच
इतिहास ने जो कुछ हमें दिया है
वह संवेदना के स्तर पर दिमाग पर
फौजी बूटों का दबाव झेलता रहा है

अब तुम आईने के सामने
इस तरह बागी दिखते हो कि वक्त तुमसे पूछे –
तुम्हारी प्राथमिक आवश्यकता
तो तुम कहोगे-एक बदजात औरत और
मुझमें से मेरा ‘मैं’ निचोड़ देने के लिए
कोई पुरानी शराब

मैं जानता हूँ मेरा बेटा
काल की छाती पर लिखा ‘भूख’ शब्द नहीं काटेगा,
शिकारी कुत्तों के दस्ते में शामिल होकर
वह बारूद के खतरनाक खेल करेगा
कभी न कभी भूख को नई परिभाषा देगा

भूख: शरीर में होने वाली ऐसी उत्तेजनात्मक कार्रवाई है
जो आदमी को दुश्मन के खिलाफ खड़ा करती है
मुझे नहीं भूलना चाहिए कि कल
इन सुगबुगाते लोगों के बीच होगी ताज़ी हवा

 

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *