manoshi

शाम – चाँद – भोर (हाइकु – मानोशी) – अंक – 1

मानोशी

ड भारत – छत्तीसगढ़ के कोरबा शहर में जन्म
ड बंगला भाषी परिवार में लालन-पालन होने के कारण बंगला साहित्य से गहरा लगाव किंतु हिन्दी वातावरण में रहने से हिन्दी व उर्दू के प्रति प्रेम।
ड घर में साहित्य व संगीत का वातावरण होने के कारण बचपन से ही इनके प्रति गहरा लगाव। विद्यार्थी जीवन से ही मौलिक लेखन का आरंभ।
ड अनेकों पत्र पत्रिकाओं में लेखों कविताओं व गज़लों का प्रकाशन। नार्थ अमेरिका व यू.के. के हिन्दी काव्य संकलनों मे रचनायें प्रकाशित
ड कनाडा के हिन्दी साहित्य समूहों जैसे साहित्य सभा, हिन्दी राइटर्स गिल्ड में सक्रिय योगदान व प्रवास में रहकर हिन्दी का प्रचार प्रसार करने में अहम भूमिका
ड स्नातकोत्तर शिक्षा (रसायन शास्त्र) बिलासपुर, छत्तीसगढ़से, व बी.एड. की उपाधि वर्धमान, प. बंगालसे।
ड वर्तमान में कनाडा में शिक्षिका
ड गायन में रुचि होने के कारण संगीत विशारद की उपाधि पं. विष्णु दिगम्बर पलुस्कर महाविद्यालय, बंबई से
ड आकाशवाणी से गज़लों का प्रसारण
ड भारतीय पर्यटन विभाग, टोरांटो की ओर से विभिन्न हिन्दी सांस्कृतिक उत्सवों की मनोनीत संचालिका

शाम

सोन गुलाल
आसमान में होली
शाम के संग

सिंदूरी साज
कत्थई शामियाना
दुल्हन शाम

हंसों का झुंड
प्रतिदिन की सैर
क्षितिज पार

चाँद

टेढ़ी मुस्कान
गहरी काली स्लेट
क्या मोनालीसा?

डाल से टंगी
बस अभी टपकी
झुलसी रोटी

फागुनी चाँद
चाँदनी उबटन
गोरा आसमां

गोल पत्थर
बादल का फ़ासिल
प्रदर्श चाँद

चरखी घूमी
चिपकी चिंगारियाँ
गगन सजा

उफ़नती लहरें
चूमती उठ कर
चाँद के होंठ

भोर

नीले में लाल
बादलों की नक्काशी
नभ आँचल

मटकी फूटी
बह गया कंचन
रंगा जगत

सूरज कैंची
रजनी ताना-बाना
जग उजला

रात शर्माई
नटखट सूरज
स्वप्न भागा

भोरागमन
उतार स्वप्न वस्त्र
जीवनचर्या

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