IMG_20160827_075707

पांच ग़ज़लें – अब्बास क़मर “फैज़ी” – अंक-2

अब्बास क़मर “फैज़ी” जौनपुर उत्तर प्रदेश के निवासी हैं| साहित्यिक जगत में दिलचस्पी तो बहोत पुरानी है पर क़लम हाल ही में उठाई है! कई ग़ज़लें कही हैं पर अभी तक प्रकाशित नहीं हुई हैं!  ग़ज़लों का मेयार क्या है आप ख़ुद देखें – 

ग़ज़ल – 1

मेरी ख्वाहिश है मैं ऐसा मकान हो जाऊँ|
रहूँ ज़मीं पे मगर आसमान हो जाऊँ|

हुआ जो सच तो ज़लालत दबोच लेगी मुझे;
मै सोचता हूँ कि झूठा बयान हो जाऊँ!

मैं इज़तराब हूँ बंदिश है बंदगी मेरी;
ख़ुदा करे मैं तेरा इत्मिनान हो जाऊँ!

चराग बन के हवाओं से जंग हो मेरी;
मैं हार जाऊँ मगर कामरान हो जाऊँ!

मेरे हबीब कुछ ऐसा हो तअल्लुक अपना;
कि तीर आप बनो मैं कमान हो जाऊँ!

हकीकतों के सफ़र दिल-ख़राश होते हैं;
मैं मख़मली सी कोई दास्तान हो जाऊँ!

ग़ज़ल -2

आँखों की खिड़कियों पे फ़कत इंतज़ार हो;
क्या कीजिये कभी जो मोहब्बत सवार हो!

तस्वीर से निकल के कभी सामने तो आ;
इस हुस्ने -इम्तियाज़ पे तब ऐतबार हो!

दीवानापन कुबूल है दरिया बनूंगा मैं;
सागर सा हमजलीस मगर ग़मगुसार हो!

बादल कि तर्ह टूट के बरसूं मैं एक रोज़;
वो भी अगर जमीं कि तरह बेकरार हो!

मौसम है बे-बहार तबीयत उदास है;
बेरंग ज़िंदगी है ज़रा ज़िक्रे-यार हो!

इस पूरी कायनात में तुम-सा हसीं नहीं;
गुलनाज़ गुलबदन हो मगर सोगवार हो!

दूरी जो दरमियां है करे आप खुदकुशी;
ये हिज्र खुद-ब-खुद ही कभी तार-तार हो!

मुर्शिद बता मैं कैसे न मानूं उसे खुदा;
जब जिस्मो-जां पे उसका ही बस इख्तियार हो!

ग़ज़ल – 3

तीरगी को रात भर ऐसे सताता कौन है;
चाँद तो बाहों मे है फ़िर जगमगाता कौन है!

आपसे बिछड़े हुए तो एक अरसा हो गया;
फ़िर शबे-फ़ुर्कत हमारा दिल जलाता कौन है!

मुफलिसी पहुँची है दौरे इंतेहा पर आज फ़िर;
दिल के टुकडों को भला भूखा सुलाता कौन है!

आप आए छा गईं हर सम्त जैसे शोखियां;
आपके अंदाज़ को क़ातिल बनाता कौन है!

गाँव मे बैठा हुआ इस सोच मे गुम है किसान;
मैं नही.. तो प्याज़ की कीमत बढ़ाता कौन है!

गोशए-दिल फ़िर मुतस्सिफ है तुम्हारी याद में;
धड़कने मजरूह हैं, नज़रें चुराता कौन है!

झूठ लेकर फिर रहा हूँ अपने चेहरे पर “क़मर”
होंठ हिलते हैं फ़कत अब मुस्कराता कौन है!

ग़ज़ल – 4

इक ऐसे वक़्त में हम सब खड़े हैं;
जहाँ हर सिम्त केवल चीथड़े हैं!

हमारे सर पे कोई सींग है क्या;
वो हमको देख कर क्यों हँस पड़े हैं!

हकीक़त और भी मायूस-तर है;
हमारे पास तो बस आंकड़े हैं!

चरागों के अमानत-दार हैं हम;
हवाओं से अकेले लड़ पड़े हैं!

तुझे देखा तो साँसें थम गई थीं;
तेरे ही दिल के अंदर जा गड़े हैं!

कराची हो गया है दिल हमारा;
यहाँ बस चीथड़े ही चीथड़े हैं!

हमें है देर तक सोने की आदत;
हमारे ख्वाब कुछ ज़्यादा बड़े हैं!

भला कैसे खरीदोगे मुझे तुम;
तुम्हारे पास केवल रोकड़े हैं!

वहाँ ग़म में नहाई है हवेली;
यहाँ खुशियों में डूबे झोंपड़े हैं!
ग़ज़ल – 5

जो सुन सको तो सुनो, ये मेरी कहानी है;
मैं ज़ार ज़ार हूँ, मजरूह ज़िन्दगानी है!

है होंठ खुश्क तवाज़ुन है खाकसार मगर;
किसी नदी कि तरह, आँख पानी पानी है!

ये इन्तज़ार क़यामत तलक रहेगा हुज़ूर;
इस इंतज़ार की आदत हमे पुरानी है!

सुकूत ओढ़ के आई है, शाम जाने क्यों;
ये सादगी है खुदारा कि नातवानी है!

मैं आफ़ताब हूँ, वो माहताब है मेरा;
मैं बादशाह हूँ दिन का, वो रात रानी है!

समंदरों कि सखावत मैं देख आया हूँ;
मैं पुर-सुकून हूँ मेरा, कोई तो सानी है!

वो जानती है गरजना है बस गरीबों पर;
ज़बान बैठी है मुँह में, बड़ी सयानी है!

नहीं है वक़्त के दामन में और गुंजाइश;
तवील उम्र है पर, मौत भी तो आनी है!

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *